Wednesday, May 3, 2017

खिलाफ़ते (जानशीनी) रसूल और मॉडर्न शिया ख़यालात

खिलाफ़ते (जानशीनी) रसूल और मॉडर्न शिया ख़यालात
1 हर कौम की आज़माइश के लिए एक मखसूस हुक्म होता है और उस कौम का जो फर्द उस हुक्म को नहीं मानता तो वह भले ही अपने को कितना ही तौहीद का अलमबरदार समझे या जितना भी इबादत गुज़ार समझे वह भटक गया और उसकी निजात नहीं हो सकती जैसे कि बनी इस्राएल में अगर कोई बछड़े की परस्तिश की हो या कौमे सालेह में जिसने ऊंटनी की कोंचें काटी हों या कौमे लूत में जिसने मर्दों मर्दों में रिश्ता बनाया हो वह अपने को कितना ही तौहीद का अलमबरदार समझे या जितना भी इबादत गुज़ार समझे वह भटक गया और उसकी निजात नहीं हो सकती I
2 उम्मते मोहम्मदिया में ‘ क़राबतदारों से मवद्दत’ ऐसा ही हुक्म है I वाकिया मुबाहिला भी तस्दीक करता है I सलवात भेजने का हुक्म भी इसी की ट्रेनिंग है I रसूल की हदीसें हैं – फातिमा जिगर का टुकड़ा है ......., हुसैन मुझ से है मैं हुसैन से हूँ , फातिमा दोनों आलम की औरतों की जन्नत में सरदार हैं , अली मर्दों में जन्नत के सरदार हैं , हसन और हुसैन जन्नत के जवानों के सरदार हैं I
3 अब इनको तकलीफ देने वाला और इनके हक को गस्ब करने वाला अपने को कितना ही तौहीद का अलमबरदार समझे या जितना भी इबादत गुज़ार समझे वह भटक गया और उसकी निजात नहीं हो सकती I         
4 अली रसूल के अज़ल से अबद तक वजीर हैं I रसूल के बाद वह खलीफा क्यों न बन सके ? क्या अबू बकर और उमर की कोशिशें अल्लाह की तकदीर से ज्यादा कामयाब हो गयीं ?
5 ग़दीर में रसूल ने कहा ‘मन कुन्तो मौला अलीउन  मौला’ और उमर ने मुबारकबाद दी ज़ाहिर है कि यह जानशीन का ही ऐलान था I
6 यह दुनिया आज़माइश की जगह है और रसूल की जानशीनी और फिर फिदक का मामला कौम के उन बड़ों की आज़माइश का जरिया बन गया I
7 खिलाफत हड़पने की साजिशें पहले से ही चल रही होंगी पर जैसे ही उम्मुल मोनिनीन के ज़रिये यह खबर पहुंची कि हज के दौरान रसूल अली की जानशीनी का एलान करने वाले हैं  तो हज के दौरान ही रसूल पर जान लेवा हमला हुआ एक पत्थर ऊपर से गिराया गया , बिजली चमकी , चेहरे पहचाने गए रसूल बच गए I
8 गमजदा  रसूल पासोपेश में पड़ गए तब आयत आई ‘ अगर आप ने यह न पहुंचाया तो कुछ न पहुंचाया’ I
9 तब गदीर का एलान हुआ I
10 मदीने आ कर रसूल बीमार पड़े – लश्करे ओसामा में जाने की उन बड़ों को ताकीद की पर छींका टूटने के इंतज़ार में उन्होंने हुक्म न माना I
11 आखिरी वक़्त था चाहा लिख कर वसीयत कर दें तो उमर ने कहा ‘यह मर्द हिज्यान बक रहा है’ I
12 जिब्राइल ने रसूल को आगाह किया ‘ अली फिलहाल खलीफा नहीं बनेंगे’ रसूल ने अली को बताया I
13 रसूल का इन्तेकाल हुआ – अबू बकर खलीफा बने फिर उमर और फिर उस्मान और उसके बाद मुसलामानों ने अली को खलीफा बनने के लिए जोर डाला तब वह खलीफा बने – पहले आयेशा ने जंग की फिर मुआविया ने और फिर अली मस्जिदे कूफा में शहीद कर दिए गए I
14 अब बताइये आज़माइश का नतीजा क्या निकला ? अबु बकर उमर उस्मान आयशा माविया ने क्या इन एह्कामों को माना :    
           ‘ क़राबतदारों से मवद्दत’ ऐसा ही हुक्म है I वाकिया मुबाहिला भी तस्दीक करता है I सलवात भेजने का हुक्म भी इसी की ट्रेनिंग है I रसूल की हदीसें हैं – फातिमा जिगर का टुकड़ा है ......., हुसैन मुझ से है मैं हुसैन से हूँ , फातिमा दोनों आलम की औरतों की जन्नत में सरदार हैं , अली मर्दों में जन्नत के सरदार हैं , हसन और हुसैन जन्नत के जवानों के सरदार हैं I
15 बात अली के खलीफा होने न होने की नहीं थी बात थी आज़माइश की और अल्लाह इसी के हिसाब से तकदीर बनाता है I
16 अली का अगर पहले ही खलीफा हो जाते और अगर कुछ साल बाद शहीद हो जाते तो एक तो उम्मत में बहुत बड़ा फसाद हो जाता जैसे अली पर क़त्ले उस्मान का इलज़ाम लगा वैसे ही उन तीनों पर क़त्ले अली का इलज़ाम लगता I हसन हुसैन बहुत छोटे होते उस वक़्त और कर्बला मुरत्तिब न हो पाती I वह तीनों जो कानून में रद्दोबदल करते उनका रसूल के कानून पर वापसी न हो पाती जो अली ने उनके बाद सही किया और उनके शिया सही कानून जान सके I मुआविया ने बाद में कानून को फिर शैखीन की सुन्नत पर ला दिया पर शिया सुन्नते रसूल पर कायम हो सके I
17 मुआविया ने मस्जिदों से अली पर तबर्रा शुरू किया I
18 बाद के सही अमल खलीफा उमर बिन अब्दुल अज़ीज़ ने अली पर तबर्रा रुकवाया और बाग फिदक अहलेबैत को वापस किया I
18 खिलाफत और बागे फिदक जरिया बने उन तीनों और उन उम्मुल मोमिनीन की आज़माइश का जरिया जिसमें वे चारों ज़ालिमून में आ गए I
19 एक ने कहा कि अगर अली को मालूम था कि वह फ़ौरन खलीफा नहीं बनेंगे तो उन्होंने बार बार अपने हक की बात क्यों करते रहे ? या जनाब फातिमा एक बाग़ के लिए क्यों दरबार में गयीं ?
20 क्योंकि दुनिया आज़माइश है और आखिरत में मौक़ा मिलेगा हर एक को अपने दिफ़ाअ का तो उसके पहले हुज्जत तमाम होनी ज़रूरी है I
21 हश्र में शैखीन कहते कि या अल्लाह हम ने तो अली को परेशानियों जिम्मेदारियों से बचाने के लिए उनकी मवद्दत में खिलाफत ली थी अगर वह एक बार भी कहते तो हम खिलाफत उनके क़दमों पर रख देते I या अल्लाह अगर फातिमा एक बार भी कहतीं तो फिदक क्या पूरा मदीना ही उनके क़दमों में रख देते I
22 उमैय्या और अब्बासी खलीफाओं के दौर में आम मुसलमान जो सुन्नी कहलाते हैं उनके लिए हक समझना मुमकिन नहीं था पर अब उन्हें सही रास्ता पहचान लेना चाहिए I
23 सहबा और उम्मुल मोमिनीन का मक़ाम है पर मकामे मवद्दत नहीं है
न तो हम अल्लाह की वहदानियत में शिर्क कर सकते हैं
न हम रसूल की रिसालत में किसी को शामिल कर सकते हैं
न हम अह्लेबैत की मवद्दत में किसी को उनसे बहतर समझ सकते हैं I
24 आज मुसलमान मवाद्दते अहलेबैत पर आ जाएँ तो इस्लाम के नाम से दहशतगर्दी ख़त्म हो जाए I
25 वे न शिया हैं और न सुन्नी वे मुनाफ़िक़ हैं जिन्होनें इस्लाम पर और मक्का मदीने पर क़ब्ज़ा कर रखा है – उनके दिल मोहम्मद और आले मोहम्मद की नफरत से भरे हुए हैं उन्हें पहचानों मुसलामानों !

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