Saturday, May 6, 2017

अरब के मुसलमान – जंगली फिर कातिल और फिर बुजदिल गुलाम !


काश दुनिया भर के मुसलमान इस्लाम की सादगी और आज की साइंस को अपना कर सच्चे मुसलमान बन पाते !
कुरान के वे सूरे जो मदीने में उतरे वे 28 सूरे हैं और अगर उनको उनके क्रम में पढ़ा जाए तो ज़ाहिर हो जाएगा कि उस वक़्त के मुसलमान कितने जंगली और एहसान फरामोश थे और इनमें कुछ बुलंद मर्तबा सहाबा को छोड़ कर ज्यादातर शामिल थे I
माले गनीमत की हिस्सा बाँट में रसूल से झगड़ते रहे और एक जगह तो उन पर खयानत का इलज़ाम भी लगाया I जब तक जीतते रहे ईमान पर रहे – जब ऊहद में हुक्म न माना माले गनीमत झपटने में हट गए पीछे से हमला हुआ शिकस्त हासिल हुयी तो ईमान छोड़ बैठे और तब से एक बड़ा तबका मुनाफ़िक़ हो गया I उम्मुल मोमिनीन तक पर तोहमत लगा दी I एहसान फरामोशी और बेशर्मी की इंतिहा कर दी I फिर ज़कात से आई आमदनी पर झगडा किया I रसूल ने आखिरी वक़्त में लश्करे ओसामा में जाने की ताकीद की और उसमें नहीं गए , जब कागज़ कलम माँगा तो नहीं दिया और एक ने कहा ‘यह मर्द हिज्यान बक रहा है’ I
रसूल के बाद आस पास के मुल्कों पर हमले किये – दौलत आई, औरतें मिलीं और गुलाम मिले I
दूसरे खलीफा ने एक दीवान बनाया जिसके हिसाब से खानदानों को आमदनी से उनकी हैसियत और अहमियत के हिसाब से हिस्सा मिलता था I तीसरे खलीफा ने अपनों को फायेदा पहुंचाया तो उन्हें घेर लिया गया और क़त्ल कर दिया गया I
तब मजबूरन अमन लाने के लिए अली को खलीफा बनाया पर वह कहाँ बेवजह हमले कराते – दौलत, गुलाम , कनीज़ सब से मजबूरी हो गयी – पहले उनके खिलाफ जंगे जमल हुयी फिर सिफ्फीन I वह लड़ने की तलकीन करते रहे पर लोग टस से मस न हुए सुलह के लिए ज़ोर डालते रहे I आखिर जब हुक्म के लिए राज़ी हुए तो एक तबक़े – खारिजी- ने उन पर इस बात पर कुफ्र का इल्जाम लगाया और वे मस्जिदे कूफा में नमाज़ में शहीद कर दिए गए I
मुआविया ने वही किया जो यह जंगली चाहते थे – दूसरे मुल्कों पर हमला हो और दौलत आये और बंटे – पर उसने अपनी सल्तनत कायम की और इनको बुजदिल गुलाम बना दिया I यह दौर चलता रहा और एक बार फिर इन बुजदिल गुलामों ने सोचा अगर हुकूमत वापस अली की नस्ल में चली जाए तो कम से कम आज़ादी तो मिल जायेगी और इस तरह उमैय्या हुकूमत ख़त्म हुयी पर अब्बासी आ कर खलीफा बन गए और सब कुछ वैसा ही रहा I
हुकूमत अरब से हट कर मिस्र पहुंची और फिर टर्की I मक्का मदीने का इंतज़ाम शरीफ खानदान के हाथ रहा बाकी अरब गरीब होते गए I
18 वीं मोहम्मद इब्ने अब्दुल वहाब ने एक कट्टर इस्लाम की तालीम देना शुरू की – अरब के देहातियों को खुशहाल लोगों से बदला लेने का मौक़ा दिखा वे उसके शागिर्द हो गए I दरिया के हाकिम इब्ने सऊद से दोस्ती और मुआहिदा हुआ दोनों ने लश्कर तैयार कर के आस पास के इलाकों को जीता – जो साथ लड़ाई में साथी थे वे इखवान (भाई) कहलाये I तीन बार उभरे और दबाये गए I चौथी बार उस वक़्त प्रथम विश्व युद्ध में 1914 में सल्तनते उस्मानिया बिखर गयी I टर्की में खिलाफत ख़त्म कर दी गयी I अरब पर ब्रिटेन का क़ब्ज़ा था पर उसे वहाँ कोई रगबत न थी छोड़ना था – यहूदियों को बसाने के लिए इस्राएल का मंसूबा बनाया था – मक्का मदीना ( हिजाज़) के शरीफ राज़ी न हुए उधर देहात (नज्द) के सऊद ने हामी भर दी – ब्रिटेन ने उसे बादशाह बना दिया और इस तरह से सऊदी अरब और सऊदी हुकूमत बनी – 1920 में I
रसूल और पहले और दूसरे खलीफा की क़ब्रों को पिंजरा बना दिया I जन्नतुल बाकी को मिस्मार कर दिया जिसमें तीसरे खलीफा और इमाम हसन , इमाम जैनुल आबिदीन , इमाम बाक़र और इमाम जाफ़र सादिक की क़ब्रों को मिस्मार कर दिया I सफा और मरवा को काट कर कुछ बचे हिस्सों को शीशे में बंद कर दिया I
बुजदिल मुसलमान कुछ नहीं कर सकते जो हुकूमत कहती करती है उस पर राज़ी हैं I बुजदिलों सोचो तुम्हारा इस्लाम क्या है और तुम्हारा ईमान क्या है ?

अब भी वक़्त है – मदीने में रसूल के वक़्त जो इस्लाम था उस पर आ जाओ – अहलेबैत की मुहब्बत ही उसकी पहचान थी और रसूल यही पहचान करवाते रहे I मुबाहिला को समझो I मवद्दतुल करबा की उजरत दो I नजात के रास्ते पर आओ I                   

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