Friday, June 30, 2017

मेरे साथ 1400 वर्ष पूर्व मदीने का सफ़र कीजिये और सच्चे इस्लाम और मोमिनों को पहचानिए – 3

मेरे साथ 1400 वर्ष पूर्व मदीने का सफ़र कीजिये और सच्चे इस्लाम और मोमिनों को पहचानिए – 3
सूरह अल बक़र
101 और जब उनके पास अल्लाह  की तरफ से रसूल आया और उस किताब  की जो उनके पास है तसदीक़ भी करता है तो उन अहले किताब के एक गिरोह ने किताबे अल्लाह  को अपने बस पुश्त फेंक दिया गोया वह लोग कुछ जानते ही नहीं और उस मंत्र के पीछे पड़ गए
102 जिसको सुलेमान के ज़माने की सलतनत में शयातीन जपा करते थे हालाँकि सुलेमान ने कुफ्र नहीं इख़तेयार किया लेकिन शैतानों ने कुफ्र एख़तेयार किया कि वह लोगों को जादू सिखाया करते थे और वह चीज़ें जो हारूत और मारूत दोनों फ़रिश्तों पर बाइबिल में नाजि़ल की गई थी हालाँकि ये दोनों फ़रिश्ते किसी को सिखाते न थे जब तक ये न कह देते थे कि हम दोनों तो फ़क़त आज़माइश है बस तो  बेइमान न हो जाना इस पर भी उनसे वह सीखते थे जिनकी वजह से मिया बीवी में तफ़रक़ा डालते हालाँकि बग़ैर अज़्ने अल्लाह  बन्दी वह अपनी इन बातों से किसी को ज़रर नहीं पहुँचा सकते थे और ये लोग ऐसी बातें सीखते थे जो खु़द उन्हें नुक़सान पहुँचाती थी बावजूद कि वह यक़ीनन जान चुके थे कि जो शख़्स इन  का ख़रीदार हुआ वह आखि़रत में बेनसीब हैं और बेशुबह बहुत ही बड़ा है जिसके बदले उन्होंने अपनी जानों को बेचा काश सोचे समझे होते
103 और अगर वह ईमान लाते और जादू वग़ैरह से बचकर परहेज़गार बनते तो अल्लाह  की बारगाह से जो सवाब मिलता वह उससे कहीं बेहतर होता काश ये लोग समझते”
क़ुरान के चैलेंज के सामने कुछ को जब कोई रास्ता नहीं दिखा तो तौरैत छोड़ कर मुसलामानों के खिलाफ जादू टोने में लग गए I 
104 ऐ ईमानवालों तुम रआना (हमारी रिआयत कर) न कहा करो बल्कि उनज़ुरना (हम पर नज़रे तवज्जो रख) कहा करो और सुनते रहो और काफिरों के लिए दर्दनाक अज़ाब है
105 ऐ रसूल अहले किताब में से जिन लोगों ने कुफ्र इख़तेयार किया वह और मुशरेकीन ये नहीं चाहते हैं कि तुम पर तुम्हारे रब की तरफ से भलाई  नाजि़ल की जाए और  अल्लाह  जिसको चाहता है अपनी रहमत के लिए ख़ास कर लेता है और अल्लाह  बड़ा फज़ल वाला है”
मुसलामानों पर जो मुनाफ़िक़ हुक्मरान हैं या जो वक़्त वक़्त पर तशद्दुद के लिए खड़े होते हैं और दरअसल मुसलामानों और इस्लाम के दुश्मन हैं उन्होंने एक फतवा दे रखा है कि कुरान ज्यों का त्यों है और जो कहे कुरान में तब्दीली हुयी है वह काफिर है और वाजिबे क़त्ल है – यहाँ कुरान खुद बता रहा है कि नजूल के दौरान ही आयतें भुला दी गयीं थीं :
“106 हम जब कोई आयत मन्सूख़ करते हैं या तुम्हारे ज़ेहन से मिटा देते हैं तो उससे बेहतर या वैसी ही  नाजि़ल भी कर देते हैं क्या तुम नहीं जानते कि बेशुबहा अल्लाह  हर चीज़ पर क़ादिर है
कौन नहीं जानता मौजूदा कुरान में सूरों की तरतीब नुजूल की तरतीब से बदली हुयी है I   
107 “क्या तुम नहीं जानते कि आसमान की सलतनत बेशुबहा ख़ास अल्लाह  ही के लिए है और अल्लाह  के सिवा तुम्हारा न कोई सरपरस्त है न मददगार
108 क्या तुम चाहते हो कि तुम भी अपने रसूल से वैसै ही सवालात करो जिस तरह साबिक़ ज़माने में मूसा से सवालात किए गए थे और जिस शख़्स ने इमान के बदले कुफ्र एख़तेयार किया वह तो यक़ीनी सीधे रास्ते से भटक गया
जो लोग उम्माह में शामिल हो गए थे उन पर भी दूसरे लोग- काफिर, मुशरिक , यहूदी और ईसाई बहकाने की कोशिश में लगे रहते थे कि ये वापस पलट आयें – यहाँ अहले किताब – यहूदियों और ईसाइयों का ज़िक्र है I    
109 अहले किताब में से अक्सर लोग अपने दिली हसद की वजह से ये ख़्वाहिश रखते हैं कि तुमको ईमान लाने के बाद फिर काफि़र बना दें  उन पर हक़ ज़ाहिर हो चुका है उसके बाद भी बस तुम माफ करो और दरगुज़र करो यहाँ तक कि अल्लाह  अपना  हुक्म भेजे बेशक अल्लाह  हर चीज़ पर क़ादिर है
110 और नमाज़ पढ़ते रहो और ज़कात दिये जाओ और जो कुछ भलाई अपने लिए पहले से भेज दोगे उस  को मौजूद पाआगे जो कुछ तुम करते हो उसे अल्लाह  ज़रूर देख रहा है”
111 और कहते हैं कि यहूद और नसारा के सिवा कोई बेहिश्त में जाने ही न पाएगा ये उनके ख़्याली पुलाव है तुम उन से कहो कि भला अगर तुम सच्चे हो कि हम ही बेहिश्त में जाएँगे तो अपनी दलील पेश करो
मज़हब के ठेकेदारों को सीधा सच्चा जवाब जो आज भी सच है:  
“112 हाँ अलबत्ता जिस शख़्स ने अल्लाह  के आगे अपना सर झुका दिया और अच्छे काम भी करता है तो उसके लिए उसके रब के यहाँ उसका बदला है और  ऐसे लोगों पर न किसी तरह का ख़ौफ़ होगा और न ऐसे लोग ग़मग़ीन होगे
अहले किताब की आपस में नफरत और हकारत:
“113 और यहूद कहते हैं कि नसारा का मज़हब कुछ नहीं और नसारा कहते हैं कि यहूद का मज़हब कुछ नहीं हालाँकि ये दोनों फरीक़ किताबे पढ़ते रहते हैं इसी तरह उन्हीं जैसी बातें वह भी किया करते हैं जो कुछ नहीं जानते तो जिस बात में ये लोग पड़े झगड़ते हैं  क़यामत के दिन अल्लाह  उनके दरमियान ठीक फैसला कर देगा
114 और उससे बढ़कर ज़ालिम कौन होगा जो अल्लाह  की मसजिदों में उसका नाम लिए जाने से रोके और उनकी बरबादी के दर पे हो, ऐसों ही को उसमें जाना मुनासिब नहीं मगर सहमे हुए ऐसे ही लोगों के लिए दुनिया में रूसवाई है और ऐसे ही लोगों के लिए आख़ेरत में बड़ा भारी अज़ाब है
115 अल्लाह  ही की है पूरब पच्छिम बस जहाँ कहीं कि़ब्ले की तरफ रूख़ करो वही अल्लाह  का सामना है बेशक अल्लाह  बड़ी गुन्जाइश वाला और खू़ब वाकि़फ है
116 और यहूद कहने लगे कि अल्लाह  औलाद रखता है हालाँकि वह  पाक है बल्कि जो कुछ ज़मीन व आसमान में है सब उसी का है और सब उसी के फ़रमाबरदार हैं
117 आसमान व ज़मीन का फैलाने वाला है और जब किसी काम का करना ठान लेता है तो उसकी निसबत सिर्फ कह देता है कि हो जाबस वह हो जाता है
118 और जो कुछ नहीं जानते कहते हैं कि अल्लाह  हमसे कलाम क्यों नहीं करता, या हमारे पास कोई निशानी क्यों नहीं आती, इसी तरह उन्हीं की सी बाते वह कर चुके हैं जो उनसे पहले थे इन सब के दिल आपस में मिलते जुलते हैं जो लोग यक़ीन रखते हैं उनको तो अपनी निशानियाँ क्यों साफतौर पर दिखा चुके
119 हमने तुमको दीने हक़ के साथ  खु़शख़बरी देने वाला और डराने वाला बनाकर भेजा है और जहन्नम वासियों के बारे में तुमसे कुछ न पूछा जाएगा
बस हदें तय हो गयीं –अहले किताब तुम से राज़ी नहीं होंगे और अगर तुम कुरान आने के बाद उनसे समझौता चाहो तो तुम्हें अल्लाह से बचाने वाला कोई न होगा !
“120 और न तो यहूदी कभी तुमसे रज़ामंद होगे न नसारा यहाँ तक कि तुम उनके मज़हब की पैरवी करो कह दो कि बस अल्लाह  ही की हिदायत तो हिदायत है  और अगर तुम इसके बाद भी कि तुम्हारे पास इल्म आ चुका है उनकी ख़्वाहिशों पर चले तो तुमको अल्लाह  से बचाने वाला न कोई सरपरस्त होगा न मददगार
121 जिन लोगों को हमने किताब दी है वह लोग उसे इस तरह पढ़ते रहते हैं जो उसके पढ़ने का हक़ है यही लोग उस पर ईमान लाते हैं और जो उससे इनकार करते हैं वही लोग घाटे में हैं”
फिर एक कोशिश :
“122 बनी इसराईल मेरी उन नेअमतों को याद करो जो मैंनं तुम को दी हैं और ये कि मैंने तुमको सारे जहाँन पर फज़ीलत दी
123 और उस दिन से डरो जिस दिन कोई शख़्स किसी की तरफ से न फिदया हो सकेगा और न उसकी तरफ से कोई मुआवेज़ा क़ुबूल किया जाएगा और न कोई सिफारिश ही फायदा पहुचाँ सकेगी, और न लोग मदद दिए जाएँगे
124 बनी इसराईल को वह वक़्त भी याद दिलाओ जब इबराहीम को उनके रब ने चन्द बातों में आज़माया और उन्होंने पूरा कर दिया तो अल्लाह  ने फरमाया मैं तुमको इमाम बनाने वाला हूँ कहा ‘और मेरी औलाद में से फरमाया  मेरे इस ओहदे पर ज़ालिमों में से कोई शख़्स फ़ायज़ नहीं हो सकता
125 जब हमने ख़ानए काबा को लोगों के सवाब और पनाह की जगह क़रार दी और हुक्म दिया गया कि इबराहीम की जगह को नमाज़ की जगह बनाओ और इबराहीम व इसमाइल से अहद व पैमान लिया कि मेरे घर को तवाफ़ और एतक़ाफ़ और रूकू और सजदा करने वालों के वास्ते साफ सुथरा रखो
126 और जब इबराहीम ने दुआ माँगी कि ऐ मेरे रब इस को पनाह व अमन का शहर बना, और उसके रहने वालों में से जो अल्लाह  और रोज़े आखि़रत पर ईमान लाए उसको तरह-तरह के फल खाने को दें अल्लाह  ने फरमाया जो कुफ्र इख़तेयार करेगा उसकी दुनिया में चन्द रोज़ फायदा उठाने दूँगा फिर उसको मजबूर करके जहन्नम   की तरफ खींच ले जाऊँगा और वह बहुत बुरा ठिकाना है
127 और जब इबराहीम व इसमाईल ख़ानाए काबा की बुनियादें बुलन्द कर रहे थे माँगते जाते थे कि ऐ हमारे रब हमारी कु़बूल कर बेशक तू ही सुनने वाला जानने वाला है
128 ऐ हमारे पालने वाले तू हमें अपना फरमाबरदार बन्दा बना और हमारी औलाद से एक गिरोह जो तेरा फरमाबरदार हो, और हमको हमारे हज की जगहों दिखा दे और हमारी तौबा क़ुबूल कर, बेशक तू ही बड़ा तौबा कु़बूल करने वाला मेहरबान है”
उम्माह को अपने माज़ी और उससे सिलसिले का शऊर हासिल हो रहा है – सारी कड़ियाँ इब्राहीम , इस्माइल , उनकी दुआओं , काबा की तामीर और मक्का में अमन और फलों की बहुतात से जुड़ी हुयी हैं I
129 “ऐ हमारे पालने वाले मक्के वालों में उन्हीं में से एक रसूल को भेज जो उनको तेरी आयतें पढ़कर सुनाए और आसमानी किताब और अक़्ल की बातें सिखाए और उन के पाकीज़ा कर दें बेशक तू ही ग़ालिब और साहिबे तदबीर है
यह रसूल उन्हीं दुआओं का हासिल है और यहूदी और ईसाई अपने जिन रसूलों – मूसा और ईसा की तालीमों का गलत मतलब निकाल रहे हैं उनके जद्द तो इब्राहीम हैं :
“130 और कौन है जो इबराहीम के तरीक़े से नफरत करे मगर जो अपने को अहमक़ बनाए और बेशक हमने उनको दुनिया में भी मुन्तखब कर लिया और वह ज़रूर आख़ेरत में भी अच्छों ही में से होगे
“ 131 जब उनसे उनके रब ने कहा इस्लाम कु़बूल करो तो अर्ज़  में की सारे जहाँ के रब पर इस्लाम लाया
132 और इसी तरीके़ की इबराहीम ने अपनी औलाद से वसीयत की और याकू़ब ने  कि ऐ फरज़न्दों अल्लाह  ने तुम्हारे वास्ते इस दीन को पसन्द फरमाया है बस तुम हरगिज़ न मरना मगर मुसलमान ही होकर
133 क्या तुम उस वक़्त मौजूद थे जब याकू़ब के सर पर मौत आ खड़ी हुई उस वक़्त उन्होंने अपने बेटों से कहा कि मेरे बाद किसी की इबादत करोगे कहने लगे हम आप के माबूद और आप के बाप दादाओं इबराहीम व इस्माइल व इसहाक़ के माबूद व यकता अल्लाह  की इबादत करेंगे और हम उसके फरमाबरदार हैं
134 वह लोग थे जो चल बसे जो उन्होंने कमाया उनके आगे आया और जो तुम कमाओगे तुम्हारे आगे आएगा और जो कुछ भी वह करते थे उसकी पूछगछ तुमसे नहीं होगी
मजहब के ठेकेदारों को करार जवाब : हम तो इब्राहीम के रास्ते पर हैं और इसी तरह से जो मुनाफ़िक़ मुसलामानों को शिया सुन्नी में बाँट कर नफरत बढ़ाना चाहते हैं उनको भी यह जवाब मिलना चाहिए कि हम तो मदीने में रसूल के वक़्त जो इस्लाम था उस पर हैं – सहाबा उम्मुल मोमिनीन का एहतराम और अहलेबैत से मवद्दत I   
“135 कहते हैं कि यहूद या नसारानी हो जाओ तो राहे रास्त पर आ जाओगे  कह दो कि हम इबराहीम के तरीक़े पर हैं जो बातिल से कतरा कर चलते थे और मुशरेकीन से न थे
136 कहो कि हम तो अल्लाह  पर ईमान लाए हैं और उस पर जो हम पर नाजि़ल किया गया और जो सहीफ़े इबराहीम व इसमाइल व इसहाक़ व याकू़ब और औलादे याकू़ब पर नाजि़ल हुए थे और जो किताब मूसा व ईसा को दी गई और जो और पैग़म्बरों को उनके रब की तरफ से उन्हें दिया गया हम तो उनमें से किसी  में भी तफरीक़ नहीं करते और हम तो अल्लाह  ही के फरमाबरदार हैं
137 बस अगर ये लोग भी उसी तरह ईमान लाए हैं जिस तरह तुम तो अलबत्ता राहे रास्त पर आ गए और अगर वह इस तरीके़ से मुँह फेर लें तो बस वह सिर्फ तुम्हारी ही जि़द पर है तो उन से तुम्हारे लिए अल्लाह  काफ़ी होगा और वह खू़ब जानता सुनता है
आज रसूल की उम्मत दुबारा शर से घिर गयी है और शरारतियों को यही दो टूक जवाब देना होगा हम तो रसूल के वक़्त के इस्लाम को मानते हैं I   
“138 रंग तो अल्लाह  ही का रंग है जिसमें तुम रंगे गए और अल्लाह के रंग से बेहतर कौन रंग होगा और हम तो उसी की इबादत करते हैं
139 तुम उनसे पूछो कि क्या तुम हम से अल्लाह  के बारे झगड़ते हो हालाँकि वही हमारा रब है तुम्हारा भी हमारे लिए है हमारी कारगुज़ारियाँ और तुम्हारे लिए तुम्हारी कारसतानियाँ और हम तो निरेखरे उसी के हैं
140 क्या तुम कहते हो कि इबराहीम व इसमाइल व इसहाक़ व आलौदें याकू़ब सब के सब यहूदी या नसारानी थे पूछो तो कि तुम ज़्यादा वाकि़फ़ हो या अल्लाह  और उससे बढ़कर कौन ज़ालिम होगा जिसके पास अल्लाह  की तरफ से गवाही  हो और फिर वह छिपाए और जो कुछ तुम करते हो अल्लाह  उससे बेख़बर नहीं
141 ये वह लोग थे जो सिधार चुके जो कुछ कमा गए उनके लिए था और जो कुछ तुम कमाओगे तुम्हारे लिए होगा और जो कुछ वह कर गुज़रे उसकी पूछगछ तुमसे न होगी
उम्माह को पहले ही बता दिया गया था कि पूरब पश्चिम सब अल्लाह का है और काबा ही पहला इबादत घर है और इब्राहीम का दीन खालिस दीन है यहूदियों ईसाइयों का दीन , नबी और किताबें बाद में आयीं I
यहूदियों ईसाइयों को साथ लेने की गरज़ से किबला येरुशलम था पर अब जब उनकी ज़िद ज़ाहिर थी तो मुसलामानों को पहले किबले की तरफ मुंह करने का हुक्म आ गया I 
“142 बाज़ अहमक़ लोग ये कह बैठेगें कि मुसलमान जिस कि़बले बैतुल मुक़द्दस की तरफ पहले से सजदा करते थे उस से दूसरे कि़बले की तरफ मुड़ जाने का क्या बाइस हुआ। ऐ रसूल तुम उनके जवाब में कहो कि पूरब पश्चिम सब अल्लाह का है जिसे चाहता है सीधे रास्ते की तरफ हिदायत करता है
143 और जिस तरह तुम्हारे कि़बले के बारे में हिदायत की उसी तरह तुम को आदिल उम्मत बनाया ताकि और लोगों के मुक़ाबले में तुम गवाह बनो और रसूल मोहम्मद तुम्हारे मुक़ाबले में गवाह बनें और जिस कि़बले की तरफ़ तुम पहले सज़दा करते थे हम ने उसको सिर्फ़ इस वजह से कि़बला क़रार दिया था कि जब कि़बला बदला जाए तो हम उन लोगों को जो रसूल की पैरवी करते हैं हम उन लोगों से अलग देख लें जो उलटे पाव फिरते हैं अगरचे ये उलट फेर सिवा उन लोगों के जिन की अल्लाह ने हिदायत की है सब पर शाक़ ज़रुर है और अल्लाह ऐसा नहीं है कि तुम्हारे ईमान नमाज़ को जो बैतुलमुक़द्दस की तरफ पढ़ चुके हो बरबाद कर दे बेशक अल्लाह लोगों पर बड़ा ही रफ़ीक व मेहरबान है।
यह जो आज झूठी तौहीद के अलमबरदार मुनाफ़िक़ खड़े हो गए हैं बताएं कि जब रसूल और मुसलामानों ने काबे की तरफ रुख किया तो उस वक़्त काबा बुतखाना था कि नहीं ? झूठी तौहीद का अलमबरदार तो इब्लीस भी था जो उसने आदम को सजदा करने से इनकार कर दिया था !  बहरहाल किबला बदलना अव्वल तरजीह थी फतह मक्का और काबे से बुतों का हटाना मुस्तकबिल के लिए तय हुआ !
“ 144 ऐ रसूल कि़बला बदलने के वास्ते बेशक तुम्हारा बार बार आसमान की तरफ मुँह करना हम देख रहे हैं तो हम ज़रुर तुमको ऐसे कि़बले की तरफ फेर देगें कि तुम नेहाल हो जाओ अच्छा तो नमाज़ ही में तुम मस्जिदिल हराम  काबे की तरफ मुँह कर लो और ऐ मुसलमानों तुम जहाँ कही भी हो उसी की तरफ़ अपना मुँह कर लिया करो और जिन लोगों को किताब तौरेत वगै़रह दी गयी है वह बख़ूबी जानते हैं कि ये तबदील कि़बले बहुत बजा व दुरुस्त है और उस के रब की तरफ़ से है और जो कुछ वह लोग करते हैं उस से अल्लाह बेख़बर नही
145 और अगर एहले किताब के सामने दुनिया की सारी दलीले पेश कर दोगे तो भी वह तुम्हारे कि़बले को न मानेंगें और न तुम ही उनके कि़बले को मानने वाले हो और ख़ुद एहले किताब भी एक दूसरे के कि़बले को नहीं मानते और जो इल्म (क़ुरान) तुम्हारे पास आ चुका है उसके बाद भी अगर तुम उनकी ख़्वाहिश पर चले तो अलबत्ता तुम नाफ़रमान हो जाओगे
146 जिन लोगों को हमने किताब दी है वह जिस तरह अपने बेटों को पहचानते है उसी तरह तरह वह उस पैग़म्बर को भी पहचानते हैं और उन में कुछ लोग तो ऐसे भी हैं जो दीदए व दानिस्ता हक़ बात को छिपाते हैं
147 ऐ रसूल तबदीले कि़बला तुम्हारे रब की तरफ से हक़ है बस तुम कहीं शक  करने वालों में से न हो जाना
शक तो इंसान के मन में आता रहता ही दूसरों के ईमान पर तलवार ले कर खड़े होने वाले इन्कुईजीशन inquisition कायम करने वाले अल्लाह के रास्ते पर नहीं हैं इंसानियत के दुश्मन हैं I    
“ 148 और हर फरीक़ के वास्ते एक सिम्त है उसी की तरफ वह नमाज़ में अपना मुँह कर लेता है बस तुम ऐ मुसलमानों झगड़े को छोड़ दो और नेकियों मे उन से लपक के आगे बढ़ जाओ तुम जहाँ कहीं होगे अल्लाह तुम सबको अपनी तरफ ले आऐगा बेशक अल्लाह हर चीज़ पर क़ादिर है”
सारे झगड़ों से बचो नेकियों की तरफ लपक कर बढ़ो यही इस्लाम है I
149 और तुम जहाँ से जाओ तो भी नमाज़ मे तुम अपना मुँह मस्जिदिल हराम   की तरफ़ कर लिया करो और बेषक ये नया कि़बला तुम्हारे रब की तरफ से हक़ है
150 और तुम्हारे कामों से अल्लाह ग़ाफिल नही है और तुम जहाँ से जाओ  तुम  अपना मुँह मस्जि़दे हराम की तरफ कर लिया करो और तुम जहाँ कही हुआ करो तो नमाज़ में अपना मुँह उसी काबा की तरफ़ कर लिया करो तो तुम लोग उनसे डरो नहीं और सिर्फ़ मुझसे डरो और ताकि तुम पर अपनी नेअमत पूरी कर दूँ
151 और तीसरा फायदा ये है ताकि तुम हिदायत पाओ मुसलमानों ये एहसान भी वैसा ही है जैसे हम ने तुम में तुमही में का एक रसूल भेजा जो तुमको हमारी आयतें पढ़ कर सुनाए और तुम्हारे नफ़्स को पाकीज़ा करे और तुम्हें किताब क़ुरान और अक़्ल की बातें सिखाए और तुम को वह बातें बतांए जिन की तुम्हें पहले से खबर भी न थी
152 बस तुम हमारी याद रखो तो मै भी तुम्हारा जि़क्र किया करुगाँ और मेरा शुक्रिया अदा करते रहो और नाशुक्री न करो
153 ऐ ईमान लाने वालों  मुसीबत के वक़्त सब्र और नमाज़ के ज़रिए से अल्लाह की मदद माँगों बेशक अल्लाह सब्र करने वालों ही का साथी है
154 और जो लोग अल्लाह की राह में मारे गए उन्हें कभी मुर्दा न कहना बल्कि वह लोग जि़न्दा हैं मगर तुम उनकी जि़न्दगी की हक़ीकत का कुछ भी शऊर नहीं रखते
उस वक़्त तक जंग शुरू नहीं हुयी थी पर शुरू के कुछ मुसलमान ज़ुल्म का शिकार हुए थे और शहीद किये गए थे I  
“ 155 और हम तुम्हें कुछ खौफ़ और भूख से और मालों और जानों और फलों की कमी से ज़रुर आज़माएगें और ऐसे सब्र करने वालों को खुशख़बरी दे दो
156 कि जब उन पर कोई मुसीबत आ पड़ी तो वह बोल उठे हम तो अल्लाह ही के हैं और हम उसी की तरफ लौट कर जाने वाले हैं
दुनियावी ज़िन्दगी की यह हकीकत है और हर एक की ज़िन्दगी में कड़ा वक़्त आता है और उस वक़्त सब्र लाजिम होता है I
“157 उन्हीं लोगों पर उनके रब की तरफ से इनायतें हैं और रहमत और यही लोग हिदायत याफ़्ता है
158 बेशक सफ़ा और मरवा अल्लाह की निशानियों में से हैं बस जो शख़्स ख़ानए काबा का हज या उमरा करे उस पर उन दोनो के तवाफ़  करने में कुछ गुनाह नहीं और जो शख़्स खुश खुश नेक काम करे तो फिर अल्लाह भी क़द्रदान  वाकि़फ़कार है
सऊदी अरब की मुनाफ़िक़ हुकूमत ने इन पहाड़ियों को कटवा दिया है और बस एक छोटा सा टुकड़ा गिलास में बंद करा दिया है I 
“ 159 बेशक जो लोग हमारी इन रौशन दलीलों और हिदायतों को जिन्हें हमने नाजि़ल किया उसके बाद छिपाते हैं जबकि हम किताब तौरैत में लोगों के सामने साफ़ साफ़ बयान कर चुके हैं तो यही लोग हैं जिन पर अल्लाह भी लानत करता है और लानत करने वाले भी लानत करते हैं
160 मगर जिन लोगों ने तौबा की और अपनी ख़राबी की इसलाह कर ली और जो किताबे अल्लाह में है साफ़ साफ़ बयान कर दिया बस उन की तौबा मै क़ुबूल करता हूँ और मै तो बड़ा तौबा क़ुबूल करने वाला मेहरबान हूँ”
अब भी वक़्त है मुनाफ़िक़ तौबा कर लें और मवाद्दते रसूल और आले रसूल की तरफ पलट आयें I
“ 161 बेक जिन लोगों नें कुफ्र एख़्तेयार किया और कुफ्र ही की हालत में मर गए उन्ही पर अल्लाह की और फरिश्तो की और तमाम लोगों की लानत है हमेशा इसी फटकार में रहेंगे
162 न तो उनके अज़ाब ही में तख़्फ़ीफ़ की जाएगी
163 और न उनको अज़ाब से मोहलत दी जाएगी और तुम्हारा माबूद तो वही यकता अल्लाह है उस के सिवा कोई माबूद नहीं जो बड़ा मेहरबान रहम वाला है
164 बेशक आसमान व ज़मीन की पैदाइश और रात दिन के रद्दो बदल कश्तियों  में जो लोगों के नफे़ की चीज़े में ले कर चलते हैं और पानी में जो अल्लाह ने आसमान से बरसाया फिर उस से ज़मीन को मुर्दा होने के बाद जिला दिया  और उस में हर कि़स्म के जानवर फैला दिये और हवाओं के चलाने में और अब्र में जो आसमान व ज़मीन के दरमियान अल्लाह के हुक्म से घिरा रहता है  अक़्ल वालों के लिए बड़ी बड़ी निशनियाँ हैं
165 और बाज़ लोग ऐसे भी हैं जो अल्लाह के सिवा औरों को भी अल्लाह का मिसल व शरीक बनाते हैं जैसी मोहब्बत अल्लाह से रखनी चाहिए वैसी ही उन से रखते हैं और जो लोग ईमानदार हैं वह उन से कहीं बढ़ कर अल्लाह की उलफ़त रखते हैं और काश ज़ालिमों को वह बात सूझती जो अज़ाब देखने के बाद सूझेगी कि यक़ीनन हर तरह की क़ूवत अल्लाह ही को है और ये कि बेशक अल्लाह बड़ा सख़्त अज़ाब वाला है
166 जब पेशवा लोग अपने पैरवो से अपना पीछा छुड़ाएगे और अपनी आखों से  अज़ाब को देखेगें और उनके बाहमी ताल्लुक़ात टूट जाएँगे
167 और पैरव कहने लगेंगे कि अगर हमें कहीं फिर पलटना मिले तो हम भी उन से इसी तरह अलग हो जायेंगे जिस तरह एैन वक़्त पर ये लोग हम से अलग हो गए यूँ ही अल्लाह उन के आमाल को दिखाएगा जो उन्हें पास दिखाई देंगें और फिर भला कब वह जहन्नम से निकल सकतें हैं
168 ऐ लोगों जो कुछ ज़मीन में हैं उस में से हलाल व पाकीज़ा चीज़ खाओ और शैतान के क़दम ब क़दम न चलो वह तो तुम्हारा ज़ाहिर ब ज़ाहिर दुश्मन है
169 वह तो तुम्हें बुराई और बदकारी ही का हुक्म करेगा और ये चाहेगा कि तुम बे जाने बूझे अल्लाह पर बोहतान बाँधों
170 और जब उन से कहा जाता है कि जो हुक्म अल्लाह की तरफ से नाजि़ल हुआ है उस को मानो तो कहते हैं कि नहीं बल्कि हम तो उसी तरीक़े पर चलेंगे जिस पर हमने अपने बाप दादाओं को पाया अगरचे उन के बाप दादा कुछ भी न समझते हों और न राहे रास्त ही पर चलते रहे हों
171 और जिन लोगों ने कुफ्र एख़्तेयार किया उन की मिसाल तो उस शख्स की मिसाल है जो ऐसे जानवर को पुकार के अपना हलक़ फाड़े जो आवाज़ और पुकार के सिवा सुनता न हो ये लोग बहरे गूँगे अन्धें हैं कि ख़ाक नहीं समझते
172 ऐ ईमान लाने वालों  जो कुछ हम ने तुम्हें दिया है उस में से सुथरी चीज़ें  खाओं और अगर अल्लाह ही की इबादत करते हो तो उसी का शुक्र करो
173 उसने तो तुम पर बस मुर्दा जानवर और खू़न और सूअर का गोश्त और वह जानवर जिस पर ज़िबह के वक़्त अल्लाह के सिवा और किसी का नाम लिया गया हो हराम किया है बस जो शख्स मजबूर हो और सरकशी करने वाला और ज़्यादती करने वाला न हो तो उसपर गुनाह नहीं है बेशक अल्लाह बड़ा बख़्शने वाला मेहरबान है
174 बेशक जो लोग इन बातों को जो अल्लाह ने किताब में नाजि़ल की है छुपाते हैं और उसके बदले थोड़ी सी क़ीमत ले लेतें है ये लोग बस अँगारों से अपने पेट भरते हैं और क़यामत के दिन अल्लाह उन से बात तक तो करेगा नहीं और न उन्हें पाक करेगा और उन्हीं के लिए दर्दनाक अज़ाब है
175 यही लोग वह हैं जिन्होंने हिदायत के बदले गुमराही मोल ली और बख्शिश  के बदले अज़ाब बस वह लोग जहन्नम की आग को क्योंकर बरदाश्त करेंगे
176 ये इसलिए कि अल्लाह ने बरहक़ किताब नाजि़ल की और बेशक जिन लोगों ने किताबे अल्लाह में रद्दो बदल की वह लोग बड़े पल्ले दरजे की मुख़ालफत में हैं
नेकी क्या है ?
“177 नेकी कुछ यही थोड़ी है कि नमाज़ में अपने मुँह पूरब या पश्चिम की तरफ़ कर लो बल्कि नेकी तो उसकी है जो अल्लाह और रोज़े आखि़रत और फरिश्तों और अल्लाह की किताबों और पैग़म्बरों पर ईमान लाए और उसकी उलफ़त में अपना माल क़राबत दारों और यतीमों और मोहताजो और परदेसियों और माँगने वालों और लौन्डी ग़ुलाम में सर्फ करे और पाबन्दी से नमाज़ पढे़ और ज़कात देता रहे और जब कोई एहद किया तो अपने क़ौल के पूरे हो और फ़क्र व फाक़ा रन्ज और घुटन के वक़्त साबित क़दम रहे यही लोग वह हैं जो दावे ईमान में सच्चे निकले और यही लोग परहेज़गार है
रसूल ऐसी ही उम्माह बना गए थे और यही था इस्लाम उनके वक़्त का “अल्लाह और रोज़े आखि़रत और फरिश्तों और अल्लाह की किताबों और पैग़म्बरों पर ईमान लाए और उसकी उलफ़त में अपना माल क़राबत दारों और यतीमों और मोहताजो और परदेसियों और माँगने वालों और लौन्डी ग़ुलाम में सर्फ करे और पाबन्दी से नमाज़ पढे़ और ज़कात देता रहे और जब कोई एहद किया तो अपने क़ौल के पूरे हो और फ़क्र व फाक़ा रन्ज और घुटन के वक़्त साबित क़दम रहे
“178 ऐ मोमिनों जो लोग मार डाले जाएँ उनके बदले में तुम को जान के बदले जान लेने का हुक्म दिया जाता है आज़ाद के बदले आज़ाद और ग़ुलाम के बदले ग़ुलाम और औरत के बदले औरत बस जिस को उसके ईमानी भाई के़सास की तरफ से कुछ माफ़ कर दिया जाये तो उसे भी उसके क़दम ब क़दम नेकी करना और ख़ुश मआमलती से अदा कर देना चाहिए ये तुम्हारे रब की तरफ आसानी और मेहरबानी है फिर उसके बाद जो ज़्यादती करे तो उस के लिए दर्दनाक अज़ाब है
179 और ऐ अक़ल वालों  केसास में तुम्हारी जि़न्दगी है  परहेज़ करो
180 तुम को हुक्म दिया जाता है कि जब तुम में से किसी के सामने मौत आ खड़ी हो बशर्ते कि वह कुछ माल छोड़ जाएं तो माँ बाप और क़राबतदारों के लिए अच्छी वसीयत करें जो अल्लाह से डरते हैं उन पर ये एक हक़ है
181 फिर जो सुन चुका उसके बाद उसे कुछ का कुछ कर दे तो उस का गुनाह उन्हीं लोगों की गरदन पर है जो उसे बदल डालें बेशक अल्लाह सब कुछ जानता और सुनता है
182 जो शख्स वसीयत करने वाले से बेजा तरफ़दारी या बे इन्साफी का ख़ौफ रखता है और उन वारिसों में सुलह करा दे तो उस पर बदलने का कुछ गुनाह नहीं है बेशक अल्लाह बड़ा बख्शने वाला मेहरबान है
183 ऐ ईमान लाने वालों  रोज़ा रखना जिस तरह तुम से पहले के लोगों पर फर्ज़ था उसी तरह तुम पर भी फर्ज़ किया गया ताकि तुम उस की वजह से बहुत से गुनाहों से बचो
184 गिनती के चन्द रोज़ इस पर भी जो शख्स तुम में से बीमार हो या सफर में हो तो और दिनों में रख ले और जिन्हें रोज़ा रखने की कू़वत है और न रखें तो उन पर उस का बदला एक मोहताज को खाना खिला देना है और जो शख्स अपनी ख़ुशी से भलाई करे तो ये उस के लिए ज़्यादा बेहतर है और अगर तुम समझदार हो तो रोज़ा रखना तुम्हारे हक़ में बहरहाल अच्छा है
185 महीना रमज़ान है जिस में क़ुरान नाजि़ल किया गया जो लोगों का रहनुमा है और उसमें रहनुमाई और तमीज़ की रौशन निनियाँ हैं तुम में से जो शख्स इस महीनें में अपनी जगह पर हो तो उसको चाहिए कि रोज़ा रखे और जो शख्स बीमार हो या फिर सफ़र में हो तो और दिनों में रोज़े की गिनती पूरी करे अल्लाह तुम्हारे साथ आसानी करना चाहता है और तुम्हारे साथ सख़्ती करनी नहीं चाहता और ताकि तुम गिनती पूरी करो और ताकि अल्लाह ने जो तुम को राह पर लगा दिया है उस नेअमत पर उस की बड़ाई करो और ताकि तुम शुक्र गुज़ार बनो
186 जब मेरे बन्दे मेरा हाल तुमसे पूछे तो मै उन के पास ही हूँ और जब मुझसे कोई दुआ माँगता है तो मै हर दुआ करने वालों की दुआ क़ुबूल करता हूँ बस उन्हें चाहिए कि मेरा भी कहना माने और मुझ पर ईमान लाएँ
187 ताकि वह सीधी राह पर आ जाए तुम्हारे वास्ते रोज़ों की रातों में अपनी बीवियों के पास जाना हलाल कर दिया गया औरतें तुम्हारा लिबास हैं और तुम  अल्लाह ने देखा कि तुम अपना नुकसान करते  तो उसने तुम्हारी तौबा क़ुबूल की और तुम्हारी ख़ता से दर गुज़र किया बस तुम अब उनसे हम बिस्तरी करो और  जो कुछ अल्लाह ने तुम्हारे लिए लिख दिया है उसे माँगों और खाओ और पियो यहाँ तक कि सुबह की सफेद धारी काली धारी से आसमान पर पूरब की तरफ़ तक तुम्हें साफ नज़र आने लगे फिर रात तक रोज़ा पूरा करो और हाँ जब तुम मस्जि़दों में एतेकाफ़ करने बैठो तो उन से हम बिस्तरी न करो ये अल्लाह की  हदे हैं तो तुम उनके पास भी न जाना यूँ खुल्लम खुल्ला अल्लाह अपने एहकाम लोगों के सामने बयान करता है ताकि वह लोग बचें
188 और आस में एक दूसरे का माल नाहक़ न खाओ और न माल को  हुक्काम के यहाँ झोंक दो ताकि लोगों के माल में से कुछ हाथ लगे नाहक़ ख़ुर्द बुर्द कर जाओ हालाकि तुम जानते हो
189 तुम से लोग चाँद के बारे में पूछते हैं तुम कह दो कि इससे लोगों के  अम्र और हज के अवक़ात मालूम होते है और ये कोई भली बात नही है कि घरो में पिछवाड़े से फाँद के आओ बल्कि नेकी उसकी है जो परहेज़गारी करे और घरों में आना हो तो उनके दरवाजो़ं की तरफ से आओ और अल्लाह से डरते रहो ताकि तुम मुराद को पहुँचो
जंग का हुक्म :
“190 और जो लोग तुम से लड़े तुम अल्लाह की राह में उनसे लड़ो और ज़्यादती न करो अल्लाह ज़्यादती करने वालों को हरगिज़ दोस्त नहीं रखता
191 और तुम उन को जहाँ पाओ मार ही डालो और उन लोगों ने जहाँ से तुम्हें शहर बदर किया है तुम भी उन्हें निकाल बाहर करो और फितना परदाज़ी  खूँरेज़ी से भी बढ़ के है और जब तक वह लोग मस्जि़द हराम के पास तुम से न लडे़ तुम भी उन से उस जगह न लड़ों बस अगर वह तुम से लड़े तो बेखटके तुम भी उन को क़त्ल करो काफि़रों की यही सज़ा है
192 फिर अगर वह लोग बाज़ रहें तो बेशक अल्लाह बड़ा बख्शने वाला मेहरबान है
193 और उन से लड़े जाओ यहाँ तक कि फ़साद बाक़ी न रहे और सिर्फ़ अल्लाह ही का दीन रह जाए फिर अगर वह लोग बाज़ रहे तो उन पर ज़्यादती न करो क्योंकि ज़ालिमों के सिवा किसी पर ज़्यादती नहीं
194 हुरमत वाला महीना हुरमत वाले महीने के बराबर है सब हुरमत वाली चीजे़ एक दूसरे के बराबर हैं बस जो शख्स तुम पर ज़्यादती करे तो जैसी ज़्यादती उसने तुम पर की है वैसी ही ज़्यादती तुम भी उस पर करो और अल्लाह से डरते रहो और खू़ब समझ लो कि अल्लाह परहेज़गारों का साथी है
जैसी ज्यादती तुम पर की गयी है वैसी ज्यादती तुम भी करो पर खूब समझ लो अल्लाह परहेज़गारों के साथ है – दूसरे मुल्कों के बेगुनाह शहरियों ने कौन सी ज्यादती की है जिन्हें दहशतगर्दी का निशाना यह मुनाफ़िक़ बना रहे हैं I ज़ाहिर है यह मुनाफिक़ मुसलामानों के इस्लाम के और इंसानियत के दुश्मन हैं I
अल्लाह की राह में खर्च करो : 
“195 और अल्लाह की राह में ख़र्च करो और अपने हाथ जान हलाकत मे न डालो और नेकी करो बेशक अल्लाह नेकी करने वालों को दोस्त रखता है
हज और उमरा  :
“196 और सिर्फ़ अल्लाह ही के वास्ते हज और उमरा को पूरा करो अगर तुम बीमारी वगै़रह की वजह से मजबूर हो जाओ तो फिर जैसी क़ुरबानी मयस्सर आये  और जब तक कु़रबानी अपनी जगह पर न पहुँय जाये अपने सर न मुँडवाओ फिर जब तुम में से कोई बीमार हो या उसके सर में कोई तकलीफ हो तो  रोजे़ या खै़रात या कु़रबानी है बस जब मुतमइन रहों तो जो शख्स हज तमत्तो का उमरा करे तो उसको जो कु़रबानी मयस्सर आये करनी होगी और जिस से कु़रबानी ना मुमकिन हो तो तीन रोजे़ ज़ामानए हज में और सात रोजे़ जब तुम वापस आओ ये पूरी दहाई है ये हुक्म उस शख्स के वास्ते है जिस के लड़के बाले मस्जि़दुल हराम  के बाशिन्दे न हो और अल्लाह से डरो और समझ लो कि अल्लाह बड़ा सख़्त अज़ाब देने वाला है
197 हज के महीने तो  मालूम हैं बस जो शख्स इन महीनों में अपने ऊपर हज लाजि़म करे तो न औरत के पास जाए न कोई और गुनाह करे और न झगडे़ और नेकी का कोई सा काम भी करों तो अल्लाह उस को खू़ब जानता है और  ज़ाद राह मुहिय्या करो और सब मे बेहतर ज़ाद राह परहेज़गारी है और ऐ अक़्लमन्दों मुझ से डरते रहो
आज ज़रुरत है कि हज की तारीखें ज़िलहिज्ज के इलावा भी रखी जाएँ ताकि बेइंतिहा भीड़ और हादसों से बचा जाए I मक्का मदीने का इंतज़ाम किसी आलमी मुस्लिमीन आर्गेनाइजेशन के ज़रिये होना चाहिए  

“198 इस में कोई इल्ज़ाम नहीं है कि तुम अपने रब के फज़ल की ख़्वाहिश करो और फिर जब तुम अरफात से चल खड़े हो तो मशअरुल हराम के पास अल्लाह का जिक्र करो और उस की याद भी करो तो जिस तरह तुम्हे बताया है अगरचे तुम इसके पहले तो गुमराहो से थे
199 फिर जहाँ से लोग चल खड़े हों वहीं से तुम भी चल खड़े हो और उससे मग़फिरत की दुआ माँगों बेशक अल्लाह बड़ा बख्शने वाला मेहरबान है
200 फिर जब तुम अरक़ान हज बजा ला चुको तो तुम इस तरह जि़क्रे अल्लाह करो जिस तरह तुम अपने बाप दादाओं का जि़क्र करते हो बल्कि उससे बढ़ कर के फिर बाज़ लोग ऐसे हैं जो कहते हैं कि ऐ मेरे रब हमको जो दुनिया ही में दे दे हालाकि आखि़रत में उनका कुछ हिस्सा नहीं

Thursday, June 29, 2017

मेरे साथ 1400 वर्ष पूर्व मदीने का सफ़र कीजिये और सच्चे इस्लाम और मोमिनों को पहचानिए – 2

क़ुरान के मदनी सूरे                 
कुरान में 114 सूरे हैं जिसमें 86 सूरे 10 वर्षों में मक्का में उतरे थे – मक्का वालों ने रसूल को स्वीकार नहीं किया तो उन्हें मदीना हिजरत करनी पड़ी और वहां 11 वर्षों में 28 सूरे उतरे और इन्हीं मदनी सूरों में इस्लाम का पूरा विधान है – इनका जो अनुमानित क्रम रहा होगा उस क्रम में मैंने उनका अनुवाद यहाँ दिया है और अनुवाद के लिए http://www.aquran.com/ पर दिए गए हिंदी कुरान से मदद ली गयी है I अनुवाद के लिए मैंने नेट पर ही उपलब्ध A Word to word Meaning of Quran  by Muhammad Mohar Ali से भी मदद ली है और दोनों का शुक्रगुज़ार हूँ I
(87) 2 सूर : बक़र :
1 अलीफ़ लाम मीम
2 वह किताब है जिस  में कोई शक नहीं परहेज़गारों (मुत्तक़ीन) के लिए हिदायत है
3 जो ग़ैब पर ईमान रखते हैं और नमाज़ क़ायम  करते हैं और जो कुछ हमने उनको दिया है उसमें से ख़र्च करते हैं
4 और जो कुछ तुम पर और तुम से पहले नाजि़ल किया गया है उस पर ईमान रखते हैं और आखि़रत का यक़ीन रखते हैं I
5 यही लोग अपने रब हिदायत पर हैं और यही लोग कामयाब हैं I”
मदीना पहुँच कर एक नयी कौम एक नयी उम्माह का निर्माण शुरू हुआ जिसके मर्द औरत परहेजगार थे उनके दिलों में ईश-भय (तक्वा) था जो नमाज़ पढ़ते थे नेक कामों में खर्च करते थे और जिन बातों पर ईमान लाने को कहा गया उस पर ईमान लाते थे और वहाँ जो यहूदी और ईसाई थे उनके भी रसूलों और किताबों पर भी ईमान रखते थे I
शुरू में कुछ थोड़े से लोग ही इस उम्माह में शामिल थे – कुछ मक्का से हिजरत कर के आये लोग जो ‘महाजिर’ कहलाये और कुछ मदीने के रहने वाले जो ‘अंसार’ कहलाये I
इनके इलावा वे लोग थे जो दूसरी दुनिया और दूसरी ज़िन्दगी का इनकार करते थे और किसी रब का इनकार करते थे – यह लोग काफिर कहलाये I बाक़ी वे लोग थे जो किसी अन्य देवी देवता की भी इबादत करते थे जो ‘मुशरिक’ कहलाये और इन दो के इलावा यहूदी और ईसाई थे जो शायद बहतर हालत में थे इज्ज़तदार थे और कल तक नए ईमान वालों को हेय दृष्टि से देखते रहे होंगे I अब समीकरण बदलना शुरू हो चुकी थी I
मक्के वाले काबे की वजह से दुनियावी फायदे में थे क्योंकि हर साल हज में आस पास और दूर दराज़ के लोग आते थे जिनका आना उनके लिए फायदेमंद रहा होगा I हो सकता है मक्के वालों और मदीने वालों में इस वजह से आपस में तनातनी रही हो और मदीने वाले नए दीन नए रसूल के इंतज़ार में रहे हों I
अल्लाह का नबी होना और रसूल होना कोई अनोखी असंभव बात नहीं थी और लोग इन बातों से वाकिफ थे I इकरार और इनकार की वजह कबीलापरस्ती ही रही होगी- कारण आज की ही तरह राजनैतिक ही था और मध्य युग में धर्म वास्तव में राजनीति ही था I
उस ज़माने के लोग वादों, कसमों और मुआहिदों के पाबन्द थे और अपनी जान अपना नुकसान सब बर्दाश्त कर लेते थे I    
जिन्होंने इनकार किया :
“ 6 बेशक जिन लोगों ने कुफ्र इख़तेयार किया उनके लिए बराबर है  चाहे तुम उन्हें डराओ या न डराओ वह ईमान न लाएँगे
7 उनके दिलों पर और उनके कानों पर अल्लाह ने मुहर लगा दी है  और उनकी आँखों पर परदा  है और उन्हीं के लिए बड़ा अज़ाब है
एक ग्रुप और था जो मुंह से इकरार कर लेते थे :
8 और कुछ ऐसे भी हैं जो  कहते हैं कि हम अल्लाह पर और क़यामत पर ईमान लाए हालाँकि वह दिल से ईमान नहीं लाए
9 अल्लाह को और उन लोगों को जो ईमान लाए (मोमिनों को ) धोखा देते हैं हालाँकि वह अपने आपको धोखा देते हैं और कुछ शऊर नहीं रखते हैं
10 उनके दिलों में मर्ज़  था अल्लाह ने उनके मर्ज़  को और बढ़ा दिया और चूँकि वह लोग झूठ बोला करते थे इसलिए उन पर तकलीफ देह अज़ाब है
11 और जब उनसे कहा जाता है कि मुल्क में फसाद न करते फिरो  कहते हैं कि हम सुलह कराते हैं
12 बेशक यही लोग फसादी हैं लेकिन समझते नहीं
13 और जब उनसे कहा जाता है कि जिस तरह और लोग ईमान लाए हैं तुम भी ईमान लाओ तो कहते हैं क्या हम भी उसी तरह ईमान लाएँ जिस तरह और बेवकू़फ़ लोग ईमान लाएँ, यही लोग बेवक़ूफ़ हैं लेकिन नहीं जानते
14 और जब उन लोगों से मिलते हैं जो ईमान ला चुके तो कहते हैं हम तो ईमान ला चुके और जब अपने शैतानों के साथ तनहा रह जाते हैं तो कहते हैं हम तुम्हारे साथ हैं हम तो बनाते हैं
15 अल्लाह उनको बनाता है और उनको ढील देता है कि वह अपनी सरकशी में बढ़ते जाएँ
16 यही वह लोग हैं जिन्होंने हिदायत के बदले गुमराही ख़रीद ली, फिर न उनकी तिजारत ही ने कुछ नफ़ा दिया और न उन लोगों ने हिदायत ही पाई
17 उन लोगों की मिसाल  उस शख़्स की सी है जिसने  भड़कती हुयी आग रौशन की फिर जब आग  ने उनके गिर्दों पेश  खू़ब उजाला कर दिया तो अल्लाह  ने उनकी रौशनी ले ली और उनको घटाटोप अँधेरे में छोड़ दिया
18 कि अब उन्हें कुछ सुझाई नहीं देता ये लोग बहरे गूँगे अन्धे हैं कि फिर अपनी गुमराही से बाज़ नहीं आ सकते
19 या उनकी मिसाल ऐसी है जैसे आसमानी बारिश जिसमें तारिकियाँ गरज और बिजली की गरज हो मौत के खौफ से कड़क के मारे अपने कानों में ऊँगलियाँ दे लेते हैं हालाँकि अल्लाह काफि़रों को  घेरे हुए है
20 क़रीब है कि बिजली उनकी आँखों को चैन्धिया दे जब उनके आगे बिजली चमकी तो उस रौशनी में चल खड़े हुए और जब उन पर अँधेरा छा गया तो  खड़े हो गए और अल्लाह  चाहता तो यूँ भी उनके देखने और सुनने की कूवतें छीन लेता बेशक अल्लाह  हर चीज़ पर क़ादिर है
इस्लाम की इस क्रान्ति की आग से किसी का बचना मुमकिन था ही नहीं और वक़्त की यह ज़रुरत भी थी – क़बीलों की स्टेज का अरब 11 वर्षों में एक मुल्क एक कौम बन गया I
दावते ईमान – ‘अल्लाह के सिवा कोई इलाहा नहीं और मुहम्मद अल्लाह के रसूल हैं ‘ को आज तक मुसलमान और उनके मौलाना और स्कॉलर ‘ईमान’ की बात कहते हैं और इसी को इस्लाम बताते हैं और इनके लिए नेकी और इंसानियत अहम नहीं है और इसी सोच का नतीजा है आज की दहशतगर्दी और ज़ुल्म से भरा खलीफाओं  और मुस्लिम हमलावरों हुक्मरानों और हुकूमतों का इतिहास I रसूल एक अच्छा समाज और एक अच्छी दुनिया बनाना चाहते थे और जिसकी बुनियाद और जिसकी शुरुआत एक अच्छी उम्माह बना कर किया उन्होंने कोई इन्क़ुइजीशन inquisition का दफ्तर नहीं खोला था जो ईसाइयों ने मध्यकाल में शुरू कर के हज़ारों इंसानों को क़त्ल कर दिया और न ही उन्होंने कभी अपने , जिब्राइल और अल्लाह के रिश्तों और कौन किससे बना है इस पर कुछ कहा – सिर्फ कुरान यही कहता रहा मुहम्मद अल्लाह के बन्दे और रसूल हैं I
दावते ईमान सिर्फ उम्माह में शामिल होने की दावत थी कोई रसूल के सामने पेश होने उनसे सर पर हाथ फिरवाने पानी छिड़कवाने उनकी क़दमबोसी की दावत नहीं थी I
इस्लाम एक राजनैतिक सामाजिक आर्थिक क्रांति थी I मदीने के लोग अपने कुनबे और कबीले से बंधे हुए थे – ऐसे भी लोग थे जो उम्माह में शामिल होना चाहते थे पर अपने कुनबे कबीले की वजह से पीछे थे और कुछ ऐसे थे जो शामिल नहीं होना चाहते थे पर उन पर शामिल होने के लिए कुनबे कबीले का दबाव था I          
“ 21 ऐ लोगों अपने रब की इबादत करो जिसने तुमको और उन लोगों को जो तुम से पहले थे पैदा किया है अजब नहीं तुम परहेज़गार बन जाओ
22 जिसने तुम्हारे लिए ज़मीन का बिछौना और आसमान को छत बनाया और आसमान से पानी बरसाया फिर उसी ने तुम्हारे खाने के लिए बाज़ फल पैदा किए बस किसी को अल्लाह के बराबर न बनाओ हालाँकि तुम खू़ब जानते हो
23 और अगर तुम लोग इस कलाम से जो हमने अपने बन्दे पर नाजि़ल किया है शक में पड़े हो बस अगर तुम सच्चे हो तो तुम  एक सूरा बना लाओ और अल्लाह के सिवा जो भी तुम्हारे मददगार हों उनको भी बुला लो
24 बस अगर तुम ये नहीं कर सकते हो और हरगिज़ नहीं कर सकोगे तो उस आग से डरो जिसके ईधन आदमी और पत्थर होंगे और काफि़रों के लिए तैयार की गई है”
“25 और जो लोग इमान लाए और उन्होंने नेक काम किए उनको खुशख़बरी दे दो कि उनके लिए वह बाग़ात हैं जिनके नीचे नहरे जारी हैं जब उन्हें इन बाग़ात का कोई मेवा खाने को मिलेगा तो कहेंगे ये तो वही  उन्हें मिलती जुलती सूरत व रंग के  मिला करेंगे और जन्नत  में उनके लिए साफ सुथरी बीवियाँ होगी और ये लोग उस बाग़ में हमेशा रहेंगे
26 बेशक अल्लाह  मच्छर या उससे भी बढ़कर की कोई मिसाल बयान करने में नहीं झेंपता बस जो लोग ईमान ला चुके हैं वह तो यह यक़ीन जानते हैं कि ये  बिल्कुल ठीक है और ये रब की तरफ़ से है वह लोग जो काफि़र है बस वह बोल उठते हैं कि अल्लाह का इस मिसाल से क्या मतलब है, ऐसी मिसाल से अल्लाह बहुतेरों की हिदायत करता है मगर गुमराही में छोड़ता भी है तो ऐसे बदकारों को
“27 जो लोग अल्लाह  के एहदो पैमान को मज़बूत हो जाने के बाद तोड़ डालते हैं और जिन  का अल्लाह  ने हुक्म दिया है उनको क़ताआ कर देते हैं और मुल्क में फसाद करते फिरते हैं, यही लोग घाटा उठाने वाले हैं
28  क्यों कर तुम अल्लाह का इन्कार कर सकते हो हालाँकि तुम  बेजान थे तो उसी ने तुमको ज़िन्दा किया फिर वही तुमको मार डालेगा, फिर वही तुमको  जि़न्दा करेगा फिर उसी की तरफ लौटाए जाओगे
29 वही तो वह  है जिसने तुम्हारे फायदे के ज़मीन की कुल चीज़ों को पैदा किया फिर आसमान  की तरफ़ मुतावज्जेह हुआ तो सात आसमान हमवार बना दिए और वह हर चीज़ से  वाकि़फ है
मदीने वाले सभी इंसानों की तरह बुराईयों और गुनाहों का माज़ी रखते थे उनके सर से गुनाहों का बोझ उतारने के लिए उन्हें नेकी के रास्ते बढ़ाने के लिए उनके लिए यह समझना ज़रूरी था कि इंसान किसी के बहकाने से गलती करते हैं और उन्हें जो बहकाता है वह क्यों बहकाता है इसके लिए उन्हें खल्क़त के वक़्त जो हुआ वह जानना ज़रूरी है I 
“30 और उस वक़्त को याद करो जब तुम्हारे रब ने फ़रिश्तों से कहा कि मैं एक नायब ज़मीन में बनानेवाला हूँ कहने लगे क्या तू ज़मीन में ऐसे को पैदा करेगा जो ज़मीन में फ़साद और खू़ँरेजि़याँ करता फिरे जबकि हम तेरी तारीफ व तसबीह करते हैं और तेरी पाकीज़गी साबित करते हैं तब अल्लाह  ने फरमाया इसमें तो शक ही नहीं कि जो मैं जानता हूँ तुम नहीं जानते
31 और आदम को सब चीज़ों के नाम सिखा दिए फिर उनको फरिश्तों के सामने पेश किया और फ़रमाया कि अगर तुम अपने दावे में सच्चे हो तो मुझे इन चीज़ों के नाम बताओ
32 तब फ़रिश्तों ने अर्ज़  की तू पाक व पाकीज़ा है हमे तो जो कुछ तूने बताया है उसके सिवा कुछ नहीं जानते तू बड़ा जानने वाला, पहचानने वाला है
33 हुक्म दिया कि ऐ आदम तुम इन फ़रिश्तों को उन सब चीज़ों के नाम बता दो बस जब आदम ने फ़रिश्तों को उन चीज़ों के नाम बता दिए तो अल्लाह  ने फरिश्तों की तरफ खि़ताब करके फरमाया क्यों, मैं तुमसे न कहता था कि मैं आसमानों और ज़मीनों के छिपे हुए राज़ को जानता हूँ, और जो कुछ तुम अब ज़ाहिर करते हो और जो कुछ तुम छुपाते थे जानता हूँ
34 और जब हमने फ़रिश्तों से कहा कि आदम को सजदा करो तो सब के सब झुक गए मगर इब्लीस ने इन्कार किया और ग़ुरूर में आ गया और काफि़र हो गया
इसके बाद इब्लीस ने आदम और हव्वा को बहका दिया :
“ 35 और हमने आदम से कहा ऐ आदम तुम अपनी बीवी समैत जन्नत में रहा सहा करो और जहाँ से तुम्हारा जी चाहे उसमें से ब फराग़त खाओ मगर उस दरख़्त के पास भी न जाना  फिर तुम अपना आप नुक़सान करोगे
36 तब शैतान ने आदम व हौव्वा को वहाँ से डगमगाया और आखि़रकार उनको जिस में थे उनसे निकाल फेंका और हमने कहा तुम उतर पड़ो तुममें से एक का एक दुशमन होगा और ज़मीन में तुम्हारे लिए एक ख़ास वक़्त  तक ठहराव और ठिकाना है
37 फिर आदम ने अपने रब से  सीखे बस अल्लाह ने उन अल्फाज़ की बरकत से आदम की तौबा कु़बूल कर ली बेशक वह बड़ा माफ़ करने वाला मेहरबान है
38 ये हुक्म दिया था कि यहाँ से उतर पड़ो  अगर तुम्हारे पास मेरी तरफ़ से हिदायत आए तो  जो लोग मेरी हिदायत पर चलेंगे उन पर  में न कोई ख़ौफ होगा
39 और न वह रंजीदा होगे और जिन लोगों ने कुफ्र इख़तेयार किया और हमारी आयतों को झुठलाया तो वही जहन्नुमी हैं और हमेशा जहन्नम में पड़े रहेगे
1400 साल पहले की दुनिया में जब रोम, फारस, हिन्द, चीन आदि शिखर पर थे तब अरब के एक शहर मदीना में एक नयी उम्माह में शामिल होने वाले आम भोले भाले मर्दों औरतों बच्चों को दुनिया, ज़िन्दगी और आखिरत का मतलब मिल गया – रसूल और कुरान की पैरवी करो, शैतान से बचो
नयी उम्माह अपनी इबादत में येरुशलम का रुख करती थी और यहूदी ईसाई भी उसी तरफ रुख कर के इबादत करते थे I
रसूल ने यह नहीं चाहा कि यहूदी और ईसाई अपना मजहब छोड़ कर मुसलमान हो जाएँ बस यह चाहा कि उन्हें और कुरान को हक़ मान लें I        
“ 40 ऐ बनी इसराईल मेरे उन एहसानात को याद करो जो तुम पर पहले कर चुके हैं और तुम मेरे एहद व इक़रार को पूरा करो तो मैं तुम्हारे एहद  को पूरा करूँगा, और मुझ ही से डरते रहो
41 और जो मैंने नाजि़ल किया वह उस किताब की तसदीक़ करता हूँ जो तुम्हारे पास है और तुम सबसे पहले उसके इन्कार करने वाले न हो जाओ और मेरी आयतों के बदले थोड़ी क़ीमत  न लो और मुझ ही से डरते रहो
42 और हक़ को बातिल के साथ न मिलाओ और हक़ बात को न छिपाओ हालाँकि तुम जानते हो और पाबन्दी से नमाज़ अदा करो
43 और ज़कात दिया करो और जो लोग इबादत के लिए झुकते हैं उनके साथ तुम भी झुका करो
44 और तुम लोगों से नेकी करने को कहते हो और अपनी ख़बर नहीं लेते हालाँकि तुम किताब को रटा करते हो तो तुम क्या इतना भी नहीं समझते
यहाँ पर नेकी किताब रटने से अफज़ल है ज़ाहिर है I 
“45 और सब्र और नमाज़ का सहारा पकड़ो और अलबत्ता नमाज़ दूभर तो है सिवाय उन ख़ाक़सारों पर जो बख़ूबी जानते हैं
46 कि वह अपने रब की बारगाह में हाजि़र होंगे और ज़रूर उसकी तरफ लौट जाएँगे
47 ऐ बनी इसराइल मेरी उन नेअमतों को याद करो जो मैंने पहले तुम्हें दी और ये कि हमने तुमको सारे जहाँन के लोगों से तरजीह दी
48 और उस दिन से डरो कोई शख़्स किसी की तरफ से न फिदिया हो सकेगा और न उसकी तरफ से कोई सिफारिश मानी जाएगी और न उसका कोई मुआवज़ा लिया जाएगा और न वह मदद पहुँचाए जाएँगे
49 और जब हमने तुम्हें फिरऔन से छुड़ाया जो तुम्हें बड़े-बड़े दुख दे के सताते थे तुम्हारे लड़कों को क़त्ल करते थे और तुम्हारी औरतों को जि़न्दा रहने देते थे और उसमें तुम्हारे रब की तरफ से सख़्त आज़माइश थी
50 और जब हमने तुम्हारे लिए दरया को टुकड़े-टुकड़े किया फिर हमने तुमको छुटकारा दिया
51 और फिरऔन के आदमियों को तुम्हारे देखते-देखते डुबो दिया और  जब हमने मूसा से चालीस रातों का वायदा किया था और तुम लोगों ने उनके जाने के बाद एक बछड़े को बना लिया
52 हालाँकि तुम अपने ऊपर ज़ुल्म करते रहे थे फिर हमने उसके बाद भी तुम से दरगुज़र की ताकि तुम शुक्र करो
53 और जब मूसा को अता की और हक़ और बातिल को जुदा करनेवाला क़ानून  ताकि तुम हिदायत पाओ
54 और जब मूसा ने अपनी क़ौम से कहा कि ऐ मेरी क़ौम तुमने बछड़े को  बना के अपने ऊपर बड़ा सख़्त जु़ल्म किया तो अब तुम बारगाह में तौबा करो और वह ये है कि अपने को क़त्ल कर डालो बारगाह के नज़दीक तुम्हारे हक़ में यही बेहतर है, फिर जब तुमने ऐसा किया तो तुम्हारी तौबा क़ुबूल कर ली बेशक वह बड़ा मेहरबान माफ़ करने वाला है
55  और जब तुमने मूसा से कहा था कि ऐ मूसा हम तुम पर उस वक़्त तक ईमान न लाएँगे जब तक हम अल्लाह को ज़ाहिर बज़ाहिर न देख ले उस पर तुम्हें बिजली ने ले डाला, और तुम तकते ही रह गए
56 फिर तुम्हें तुम्हारे मरने के बाद हमने जिला उठाया ताकि तुम शुक्र करो
57 और हमने तुम पर अब्र का साया किया और तुम पर मन व सलवा उतारा और जो सुथरी व नफीस रोजि़या तुम्हें दी हैं उन्हें शौक़ से खाओ, और उन लोगों ने हमारा तो कुछ बिगाड़ा नहीं मगर अपनी जानों पर सितम ढाते रहे
58 और जब हमने तुमसे कहा कि इस गाँव  में जाओ और इसमें जहाँ चाहो फराग़त से खाओ और दरवाज़े पर सजदा करते हुए और ज़बान से हित्ता बखि़्शश कहते हुए आओ तो हम तुम्हारी ख़ता ये बख़्श देगे और हम नेकी करने वालों की नेकी बढ़ा देगें
59 तो जो बात उनसे कही गई थी उसे शरारतियों ने बदलकर दूसरी बात कहनी शुरू कर दी तब हमने उन लोगों पर जिन्होंने शरारत की थी उनकी बदकारी की वजह से आसमानी बला नाजि़ल की
60 और जब मूसा ने अपनी क़ौम के लिए पानी माँगा तो हमने कहा अपनी लाठी पत्थर पर मारो उसमें से बारह चश्में फूट निकले और सब लोगों ने अपना-अपना घाट बखूबी जान लिया और हमने आम इजाज़त दे दी कि अल्लाह की दी हुयी रोज़ी से खाओ पियो और मुल्क में फसाद न करते फिरो
61 जब तुमने मूसा से कहा कि ऐ मूसा हमसे एक ही खाने पर न रहा जाएगा तो आप हमारे लिए अपने रब से दुआ कीजिए कि जो चीज़े ज़मीन से उगती है जैसे साग पात तरकारी और ककड़ी और गेहूँ या (लहसुन) और मसूर और प्याज़ (मन व सलवा) की जगह पैदा करें कहा क्या तुम ऐसी चीज़ को जो हर तरह से बेहतर है अदना चीज़ से बदलन चाहते हो तो किसी शहर में उतर पड़ो फिर तुम्हारे लिए जो तुमने माँगा है सब मौजूद है और उन पर ज़िल्लत रूसवाई और मोहताजी की मार पड़ी और उन लोगों अल्लाह के अज़ाब की तरफ पलटा खाया, ये सब इस सबब से हुआ कि वह लोग अल्लाह  की निशानियों से इन्कार करते थे और पैग़म्बरों को नाहक शहीद करते थे, और इस वजह से कि वह नाफ़रमानी और सरकशी किया करते थे
49 से 61 तक सिर्फ 12 आयतों में मदीने वालों को यहूदियों के बारे में सब कुछ मालूम पड़ गया – उनकी तरह की एक उम्माह जिसे अल्लाह ने सब कुछ दिया पर वे नाफरमानी करते गए I इस तरह धीरे धीरे नयी उम्माह में शामिल मदीने के लोग कल के इज्ज़तदार यहूदियों और ईसाइयों से अपने को बहतर साबित करने का मौक़ा पा गए I
दीन क्या है ? अल्लाह , रोज़े आखिरत पर यक़ीन और नेक अमल
“ 62 बेशक मुसलमानों और यहूदियों और नसरानियों और साबिईन में से जो कोई अल्लाह और रोज़े आख़ेरत पर ईमान लाए और अच्छे-अच्छे काम करता रहे तो उन्हीं के लिए उनका अज्र व सवाब उनके अल्लाह  के पास है और न उन पर किसी का ख़ौफ होगा न वह रंजीदा दिल होंगे
63 और  जब हमने तुमसे एक़रार लिया और हमने तुम्हारे सर पर तूर लाकर लटकाया और कह दिया कि तौरेत जो हमने तुमको दी है उसको मज़बूत पकड़े रहो और जो कुछ उसमें है उसको याद रखो
64 ताकि तुम परहेज़गार बनो फिर उसके बाद तुम  फिर गए बस अगर तुम पर अल्लाह का फज़ल और उसकी मेहरबानी न होती तो तुमने सख़्त घाटा उठाया होता
65 और अपनी क़ौम से उन लोगों की हालत तो तुम बखू़बी जानते हो जो शम्बे  के दिन अपनी हद से गुज़र गए  तो हमने उन से कहा कि तुम राइन्दे गए बन्दर बन जाओ
66 बस हमने इस वाक़ये से उन लोगों के वास्ते जिन के सामने हुआ था और जो उसके बाद आनेवाले थे अज़ाब क़रार दिया, और परहेज़गारों के लिए नसीहत
67 और जब मूसा ने अपनी क़ौम से कहा कि अल्लाह तुम लोगों को ताकीदी हुक्म करता है कि तुम एक गाय जि़बाह करो वह लोग कहने लगे क्या तुम हमसे दिल्लगी करते हो मूसा ने कहा मैं अल्लाह  से पनाह माँगता हूँ कि मैं जाहिल बनूँ
68  तुम अपने अल्लाह से दुआ करो कि हमें बता दे कि वह गाय कैसी हो मूसा ने कहा बेशक अल्लाह  ने फरमाता है कि वह गाय न तो बहुत बूढ़ी हो और न बछिया बल्कि उनमें से औसत दरजे की हो, ग़रज़ जो तुमको हुक्म दिया गया उसको बजा लाओ
69 वह कहने लगे  तुम अपने अल्लाह  से दुआ करो कि हमें ये बता दे कि उसका रंग आखि़र क्या हो मूसा ने कहा बेशक अल्लाह  फरमाता है कि वह गाय खू़ब गहरे ज़र्द रंग की हो देखने वाले उसे देखकर खु़श हो जाए
70 तब कहने लगे कि तुम अपने अल्लाह से दुआ करो कि हमें ज़रा यह तो बता दे कि वह और कैसी हो  गाय तो और गायों में मिल जुल गई और अल्लाह  ने चाहा तो हम ज़रूर पता लगा लेगे
71 मूसा ने कहा अल्लाह ज़रूर फरमाता है कि वह गाय न तो इतनी सधाई हो कि ज़मीन जोते न खेती सीचें भली चंगी एक रंग की कि उसमें कोई धब्बा तक न हो, वह बोले अब  ठीक-ठीक बयान किया, ग़रज़ उन लोगों ने वह गाय हलाल की हालाँकि उनसे उम्मीद न थी वह कि वह ऐसा करेंगे
72 और जब तुमने एक शख़्स को मार डाला और तुममें उसकी बाबत फूट पड़ गई एक दूसरे को क़ातिल बताने लगा जो तुम छिपाते थे
73 अल्लाह  को उसका ज़ाहिर करना मंजू़र था बस हमने कहा कि उस गाय को कोई टुकड़ा लेकर इस पर मारो यूँ अल्लाह मुर्दे को जि़न्दा करता है और तुम को अपनी कु़दरत की निशानियाँ दिखा देता है
74 ताकि तुम समझो फिर उसके बाद तुम्हारे दिल सख़्त हो गये बस वह पत्थर के मिस्ल थे या उससे भी ज़्यादा क्योंकि पत्थरों में बाज़ तो ऐसे होते हैं कि उनसे नहरें जारी हो जाती हैं और बाज़ ऐसे होते हैं कि उनमें दरार पड़ जाती है और उनमें से पानी निकल पड़ता है और बाज़ पत्थर तो ऐसे होते हैं कि अल्लाह के ख़ौफ से गिर पड़ते हैं और जो कुछ तुम कर रहे हो उससे अल्लाह ग़ाफिल नहीं है
यह जो आयतें नाजिल होती थीं उनकी तिलावत रसूल करते थे उन्हें बहुत से मुसलमान दिल से याद कर लेते थे और कुछ पत्तों, कपड़ों और चमड़े वगैरा पर लिख लेते थे I यह आयतें जो ईमान नहीं लाये थे उन तक और यहूदियों ईसाइयों तक पहुँचती रहती थीं और उनके जवाब वापस रसूल तक सीधे या उनके करीबी सहाबा के ज़रिये पहुँचते रहते थे I इस तरह मदीने में लगातार डायलाग चल रहा था और कोई इससे अनभिज्ञ नहीं था I सीधी बात तो यह थी कि अगर मूसा रसूल थे तो ईसा भी रसूल थे और अगर मूसा और ईसा रसूल थे तो मुहम्मद भी रसूल थे और अगर तौरैत अल्लाह की किताब थी तो इंजील भी अल्लाह की किताब थी और अगर तौरैत और इंजील अल्लाह की किताब है तो कुरान भी अल्लाह की किताब है – इस सीधी बात पर न तो 1400 वर्ष पहले लोग राज़ी हो पाए और न आज राज़ी हैं I वैसे आज भी मुमकिन है कि तीनों मजहब के आलिम और स्कॉलर एक आंम राय बना कर यह इकरार कर लें कि बेशक मूसा, ईसा और मुहम्मद रसूल थे और तीनों किताबें आसमानी किताबे हैं I 
उम्माह के लोग यह आरज़ू तो करते ही थे काश यहूदी और ईसाई रसूल और कुरान पर ईमान ले आते I      
“ 75 क्या तुम ये लालच रखते हो कि वह तुम्हारा ईमान लाएँगें हालाँकि उनमें का एक गिरोह साबिक़ में ऐसा था कि अल्लाह  का कलाम सुनता था और अच्छी तरह समझने के बाद उलट फेर कर देता था हालाँकि वह खू़ब जानते थे और जब उन लोगों से मुलाक़ात करते हैं
76 जो ईमान लाए तो कह देते हैं कि हम तो ईमान ला चुके और जब उनसे बाज़-बाज़ के साथ तखि़लया  में मिलते हैं तो कहते हैं कि जो कुछ अल्लाह  ने तुम पर ज़ाहिर कर दिया है क्या तुम बता दोगे ताकि उसके सबब से कल तुम्हारे अल्लाह  के पास तुम पर हुज्जत लाएँ क्या तुम इतना भी नहीं समझते
77 लेकिन क्या वह लोग नहीं जानते कि वह लोग जो कुछ छिपाते हैं या ज़ाहिर करते हैं अल्लाह  सब कुछ जानता है
यहूदियों ने अपनी मोर्चाबंदी इस तरह की कि कोई तौरैत में क्या है मुसलामानों को न बताये I 
“ 78 और कुछ उनमें से ऐसे अनपढ़ हैं कि वह किताबे अल्लाह  को अपने मतलब की बातों के सिवा कुछ नहीं समझते और वह फक़त ख़्याली बातें किया करते हैं,
79 बस वाए हो उन लोगों पर जो अपने हाथ से किताब लिखते हैं फिर  हैं कि यह अल्लाह  के यहाँ से  है ताकि उसके ज़रिये से थोड़ी सी क़ीमत हासिल करें बस अफसोस है उन पर कि उनके हाथों ने लिखा और फिर अफसोस है उनपर कि वह ऐसी कमाई करते हैं
और कुछ लोगों ने भ्रमित करने के लिए फर्जी बनावटी किताब पेश की I 
“ 80 और कहते हैं कि गिनती के चन्द दिनों के सिवा हमें आग छुएगी भी तो नहीं इन लोगों से कहो कि क्या तुमने अल्लाह  से कोई इक़रार ले लिया है कि फिर वह किसी तरह अपने इक़रार के खि़लाफ़ हरगिज़ न करेगा या बे समझे बूझे अल्लाह  पर बोहतान जोड़ते हो
81 हाँ जिसने बुराई हासिल की और उसके गुनाहों ने चारों तरफ से उसे घेर लिया है वही लोग तो जहन्नमी  हैं और वही उसमें हमेशा रहेगें
82 और जो लोग ईमानदार हैं और उन्होंने अच्छे काम किए हैं वही लोग जन्नती हैं कि हमेशा बाग़ (जन्नत)  में रहेंगे
बनी इस्राएल से अहद :
83 और जब हमने बनी ईसराइल से अहद व पैमान लिया था कि अल्लाह  के सिवा किसी की इबादत न करना और माँ बाप और क़राबतदारों और यतीमों और मोहताजों के साथ अच्छे सुलूक करना और लोगों के साथ अच्छी तरह से बातें करना और बराबर नमाज़ पढ़ना और ज़कात देना फिर तुममें से थोड़े आदमियों के सिवा फिर गए और तुम लोग हो ही इक़रार से मुँह फेरने वाले
84 और जब हमने तुम  से अहद लिया था कि आपस में खू़रेजि़याँ न करना और न अपने लोगों को शहर बदर करना तो तुम  ने इक़रार किया था और तुम भी उसकी गवाही देते हो
85  फिर वही लोग तो तुम हो कि आपस में एक दूसरे को क़त्ल करते हो और अपनों से एक जत्थे के नाहक़ और ज़बरदस्ती हिमायती बनकर दूसरे को शहर बदर करते हो  अगर वही लोग क़ैदी बनकर तम्हारे पास आए तो उनको तावान देकर छुड़ा लेते हो हालाँकि उनका निकालना ही तुम पर हराम किया गया था तो फिर क्या तुम बाज़ बातों पर ईमान रखते हो और बाज़ से इन्कार करते हो बस तुम में से जो लोग ऐसा करें उनकी सज़ा इसके सिवा और कुछ नहीं कि जि़न्दगी भर की रूसवाई हो और क़यामत के दिन सख़्त अज़ाब की तरफ लौटा दिये जाए और जो कुछ तुम लोग करते हो अल्लाह  उससे ग़ाफि़ल नहीं है
86 यही वह लोग हैं जिन्होंने आख़ेरत के बदले दुनिया की जि़न्दगी ख़रीद ली बस न उनके अज़ाब ही में कमी की जाएगी और न वह लोग किसी तरह की मदद दिए जाएँगे
87 और ये हक़ीक़ी बात है कि हमने मूसा को किताब दी और उनके बाद बहुत से पैग़म्बरों को उनके क़दम ब क़दम ले चलें और मरयम के बेटे ईसा को  वाजे़ए व रौशन मौजिजे दिए और रूह कुद्दूस के ज़रिये से उनकी मदद की क्या तुम उस क़द्र बददिमाग़ हो गए हो कि जब कोई पैग़म्बर तुम्हारे पास तुम्हारी ख़्वाहिशे नफ़सानी के खि़लाफ कोई हुक्म लेकर आया तो तुम अकड़ बैठे फिर तुमने बाज़ पैग़म्बरों को तो झुठलाया और बाज़ को जान से मार डाला
88 और कहने लगे कि हमारे दिलों पर गि़लाफ चढ़ा हुआ है बल्कि उनके कुफ्र की वजह से अल्लाह  ने उनपर लानत की है बस कम ही लोग ईमान लाते हैं
89 और जब उनके पास अल्लाह  की तरफ़ से किताब आई और वह उस  की जो उन के पास है तसदीक़ भी करती है। और उससे पहले काफि़रों पर फतेहयाब होने की दुआएँ माँगते थे बस जब उनके पास वह चीज़ जिसे पहचानते थे आ गई तो लगे इन्कार करने बस काफि़रों पर अल्लाह  की लानत है
90 क्या ही बुरा है वह काम जिसके मुक़ाबले में वह लोग अपनी जानें बेच बैठे हैं कि अल्लाह  अपने बन्दों से जिस पर चाहे अपनी इनायत से किताब नाजि़ल किया करे इस रश्क से जो कुछ अल्लाह  ने नाजि़ल किया है सबका इन्कार कर बैठे बस उन पर ग़ज़ब पर ग़ज़ब टूट पड़ा और काफि़रों के लिए रूसवाई का अज़ाब है
91 और जब उनसे कहा गया कि अल्लाह  ने नाजि़ल किया है उस पर ईमान लाओ तो कहने लगे कि हम तो उसी किताब पर ईमान लाए हैं जो हम पर नाजि़ल की गई थी और उस किताब को जो उसके बाद आई है नहीं मानते हैं हालाँकि वह हक़ है और उस किताब की जो उनके पास है तसदीक़ भी करती है मगर उस किताब कु़रान का जो उसके बाद आई है इन्कार करते हैं उनसे ये तो पूछो कि तुम अगर ईमानदार थे तो फिर क्यों अल्लाह  के पैग़म्बरों का साबिक़ मे क़त्ल करते थे
92 और तुम्हारे पास मूसा तो वाज़ेए व रौशन मौजिज़े लेकर आ ही चुके थे फिर भी तुमने उनके बाद बछड़े को अल्लाह  बना ही लिया और उससे तुम अपने ही ऊपर ज़ुल्म करने वाले थे
93 और जब हमने तुमसे अहद लिया और तूर को तुम्हारे सर पर लटकाया और  जो हमने दी है मज़बूती से लिए रहो और  सुनो तो कहने लगे सुना तो  हम इसको मानते नहीं और उनकी बेईमानी की वजह से बछड़े की उलफ़त घोल के उनके दिलों में पिला दी गई उन लोगों से कह दो कि अगर तुम ईमानदार थे तो तुमको तुम्हारा ईमान क्या ही बुरा हुक्म करता था
94 इन लोगों से कह दो कि अगर अल्लाह  के नज़दीक आख़ेरत का घर ख़ास तुम्हारे वास्ते है और लोगों के वास्ते नहीं है बस अगर तुम सच्चे हो तो मौत की आरजू़ करो
95 लेकिन वह उन आमाले बद की वजह से जिनको उनके हाथों ने पहले से आगे भेजा है हरगिज़ मौत की आरज़ू न करेंगे और अल्लाह  ज़ालिमों से खू़ब वाकि़फ है
96 और तुम उन ही को जि़न्दगी का सबसे ज़्यादा हरीस पाओगे और मुशरिक़ों में से हर एक शख़्स चाहता है कि काश उसको हज़ार बरस की उम्र दी जाती हालाँकि अगर इतनी लम्बी उम्र भी दी जाए तो वह अल्लाह के अज़ाब से छुटकारा देने वाली नहीं, और जो कुछ वह लोग करते हैं अल्लाह  उसे देख रहा है
कुछ यहूदी अल्लाह का कलाम मुहम्मद तक लाने के लिए जिब्राइल के दुश्मन हो गए !
“97 कह दो कि जो जिबरील का दुशमन है क्योंकि उस फ़रिश्ते ने अल्लाह  के हुक्म से तुम्हारे दिल पर डाला है और वह उन किताबों की भी तसदीक करता है जो उसके सामने मौजूद हैं और ईमान लाने वालों  के वास्ते खु़शख़बरी है
98 जो शख़्स अल्लाह और उसके फरिश्तों और उसके रसूलों और जिबराईल व मीकाइल का दुशमन हो तो बेशक अल्लाह  भी काफि़रों का दुश्मन है
99 और हमने तुम पर ऐसी निशानियाँ नाजि़ल की हैं जो वाजेए और रौशन हैं और ऐसे नाफरमानों के सिवा उनका कोई इन्कार नहीं कर सकता
100 और उनकी ये हालत है कि जब कभी कोई अहद किया तो उनमें से एक फरीक़ ने तोड़ डाला बल्कि उनमें से अक्सर तो ईमान ही नहीं रखते