क़ुरान के मदनी सूरे
कुरान में 114 सूरे हैं जिसमें 86 सूरे 10
वर्षों में मक्का में उतरे थे – मक्का वालों ने रसूल को स्वीकार नहीं किया तो उन्हें
मदीना हिजरत करनी पड़ी और वहां 11 वर्षों में 28 सूरे उतरे और इन्हीं मदनी सूरों
में इस्लाम का पूरा विधान है – इनका जो अनुमानित क्रम रहा होगा उस क्रम में मैंने
उनका अनुवाद यहाँ दिया है और अनुवाद के लिए http://www.aquran.com/ पर दिए गए हिंदी कुरान से
मदद ली गयी है I अनुवाद के लिए मैंने नेट
पर ही उपलब्ध A Word to word Meaning of Quran
by Muhammad Mohar Ali से भी मदद ली है और दोनों का शुक्रगुज़ार हूँ I
(87) 2 सूर : बक़र :
“1 अलीफ़ लाम मीम
2 वह किताब है जिस में कोई शक नहीं परहेज़गारों (मुत्तक़ीन) के लिए हिदायत है
3 जो ग़ैब पर ईमान रखते हैं और नमाज़ क़ायम करते हैं और जो कुछ हमने उनको दिया है उसमें से ख़र्च करते हैं
4 और जो कुछ तुम पर और तुम से पहले नाजि़ल किया गया है उस पर ईमान रखते हैं और आखि़रत का यक़ीन रखते हैं I
5 यही लोग अपने रब हिदायत पर हैं और यही लोग कामयाब हैं I”
“1 अलीफ़ लाम मीम
2 वह किताब है जिस में कोई शक नहीं परहेज़गारों (मुत्तक़ीन) के लिए हिदायत है
3 जो ग़ैब पर ईमान रखते हैं और नमाज़ क़ायम करते हैं और जो कुछ हमने उनको दिया है उसमें से ख़र्च करते हैं
4 और जो कुछ तुम पर और तुम से पहले नाजि़ल किया गया है उस पर ईमान रखते हैं और आखि़रत का यक़ीन रखते हैं I
5 यही लोग अपने रब हिदायत पर हैं और यही लोग कामयाब हैं I”
मदीना पहुँच कर एक नयी कौम एक नयी उम्माह का निर्माण शुरू हुआ जिसके मर्द औरत
परहेजगार थे उनके दिलों में ईश-भय (तक्वा) था जो नमाज़ पढ़ते थे नेक कामों में खर्च
करते थे और जिन बातों पर ईमान लाने को कहा गया उस पर ईमान लाते थे और वहाँ जो
यहूदी और ईसाई थे उनके भी रसूलों और किताबों पर भी ईमान रखते थे I
शुरू में कुछ थोड़े से लोग ही इस उम्माह में शामिल थे – कुछ मक्का से हिजरत कर
के आये लोग जो ‘महाजिर’ कहलाये और कुछ मदीने के रहने वाले जो ‘अंसार’ कहलाये I
इनके इलावा वे लोग थे जो दूसरी दुनिया और दूसरी ज़िन्दगी का इनकार करते थे और
किसी रब का इनकार करते थे – यह लोग काफिर कहलाये I बाक़ी वे लोग थे जो किसी अन्य
देवी देवता की भी इबादत करते थे जो ‘मुशरिक’ कहलाये और इन दो के इलावा यहूदी और
ईसाई थे जो शायद बहतर हालत में थे इज्ज़तदार थे और कल तक नए ईमान वालों को हेय
दृष्टि से देखते रहे होंगे I अब समीकरण बदलना शुरू हो चुकी थी I
मक्के वाले काबे की वजह से दुनियावी फायदे में थे क्योंकि हर साल हज में आस
पास और दूर दराज़ के लोग आते थे जिनका आना उनके लिए फायदेमंद रहा होगा I हो सकता है
मक्के वालों और मदीने वालों में इस वजह से आपस में तनातनी रही हो और मदीने वाले नए
दीन नए रसूल के इंतज़ार में रहे हों I
अल्लाह का नबी होना और रसूल होना कोई अनोखी असंभव बात नहीं थी और लोग इन बातों
से वाकिफ थे I इकरार और इनकार की वजह कबीलापरस्ती ही रही होगी- कारण आज की ही तरह
राजनैतिक ही था और मध्य युग में धर्म वास्तव में राजनीति ही था I
उस ज़माने के लोग वादों, कसमों और मुआहिदों के पाबन्द थे और अपनी जान अपना
नुकसान सब बर्दाश्त कर लेते थे I
जिन्होंने इनकार किया :
“ 6 बेशक जिन लोगों ने कुफ्र इख़तेयार किया उनके लिए बराबर है चाहे तुम उन्हें डराओ या न डराओ वह ईमान न
लाएँगे
7 उनके दिलों पर और उनके कानों पर अल्लाह ने मुहर लगा दी है और उनकी आँखों पर परदा है और उन्हीं के लिए बड़ा अज़ाब है”
7 उनके दिलों पर और उनके कानों पर अल्लाह ने मुहर लगा दी है और उनकी आँखों पर परदा है और उन्हीं के लिए बड़ा अज़ाब है”
एक ग्रुप और था जो मुंह से इकरार कर लेते थे :
8 और कुछ ऐसे भी हैं जो कहते हैं कि हम अल्लाह पर और क़यामत पर ईमान लाए हालाँकि वह दिल से ईमान नहीं लाए
9 अल्लाह को और उन लोगों को जो ईमान लाए (मोमिनों को ) धोखा देते हैं हालाँकि वह अपने आपको धोखा देते हैं और कुछ शऊर नहीं रखते हैं
10 उनके दिलों में मर्ज़ था अल्लाह ने उनके मर्ज़ को और बढ़ा दिया और चूँकि वह लोग झूठ बोला करते थे इसलिए उन पर तकलीफ देह अज़ाब है
11 और जब उनसे कहा जाता है कि मुल्क में फसाद न करते फिरो कहते हैं कि हम सुलह कराते हैं
12 बेशक यही लोग फसादी हैं लेकिन समझते नहीं
13 और जब उनसे कहा जाता है कि जिस तरह और लोग ईमान लाए हैं तुम भी ईमान लाओ तो कहते हैं क्या हम भी उसी तरह ईमान लाएँ जिस तरह और बेवकू़फ़ लोग ईमान लाएँ, यही लोग बेवक़ूफ़ हैं लेकिन नहीं जानते
14 और जब उन लोगों से मिलते हैं जो ईमान ला चुके तो कहते हैं हम तो ईमान ला चुके और जब अपने शैतानों के साथ तनहा रह जाते हैं तो कहते हैं हम तुम्हारे साथ हैं हम तो बनाते हैं
15 अल्लाह उनको बनाता है और उनको ढील देता है कि वह अपनी सरकशी में बढ़ते जाएँ
16 यही वह लोग हैं जिन्होंने हिदायत के बदले गुमराही ख़रीद ली, फिर न उनकी तिजारत ही ने कुछ नफ़ा दिया और न उन लोगों ने हिदायत ही पाई
17 उन लोगों की मिसाल उस शख़्स की सी है जिसने भड़कती हुयी आग रौशन की फिर जब आग ने उनके गिर्दों पेश खू़ब उजाला कर दिया तो अल्लाह ने उनकी रौशनी ले ली और उनको घटाटोप अँधेरे में छोड़ दिया
18 कि अब उन्हें कुछ सुझाई नहीं देता ये लोग बहरे गूँगे अन्धे हैं कि फिर अपनी गुमराही से बाज़ नहीं आ सकते
19 या उनकी मिसाल ऐसी है जैसे आसमानी बारिश जिसमें तारिकियाँ गरज और बिजली की गरज हो मौत के खौफ से कड़क के मारे अपने कानों में ऊँगलियाँ दे लेते हैं हालाँकि अल्लाह काफि़रों को घेरे हुए है
20 क़रीब है कि बिजली उनकी आँखों को चैन्धिया दे जब उनके आगे बिजली चमकी तो उस रौशनी में चल खड़े हुए और जब उन पर अँधेरा छा गया तो खड़े हो गए और अल्लाह चाहता तो यूँ भी उनके देखने और सुनने की कूवतें छीन लेता बेशक अल्लाह हर चीज़ पर क़ादिर है “
8 और कुछ ऐसे भी हैं जो कहते हैं कि हम अल्लाह पर और क़यामत पर ईमान लाए हालाँकि वह दिल से ईमान नहीं लाए
9 अल्लाह को और उन लोगों को जो ईमान लाए (मोमिनों को ) धोखा देते हैं हालाँकि वह अपने आपको धोखा देते हैं और कुछ शऊर नहीं रखते हैं
10 उनके दिलों में मर्ज़ था अल्लाह ने उनके मर्ज़ को और बढ़ा दिया और चूँकि वह लोग झूठ बोला करते थे इसलिए उन पर तकलीफ देह अज़ाब है
11 और जब उनसे कहा जाता है कि मुल्क में फसाद न करते फिरो कहते हैं कि हम सुलह कराते हैं
12 बेशक यही लोग फसादी हैं लेकिन समझते नहीं
13 और जब उनसे कहा जाता है कि जिस तरह और लोग ईमान लाए हैं तुम भी ईमान लाओ तो कहते हैं क्या हम भी उसी तरह ईमान लाएँ जिस तरह और बेवकू़फ़ लोग ईमान लाएँ, यही लोग बेवक़ूफ़ हैं लेकिन नहीं जानते
14 और जब उन लोगों से मिलते हैं जो ईमान ला चुके तो कहते हैं हम तो ईमान ला चुके और जब अपने शैतानों के साथ तनहा रह जाते हैं तो कहते हैं हम तुम्हारे साथ हैं हम तो बनाते हैं
15 अल्लाह उनको बनाता है और उनको ढील देता है कि वह अपनी सरकशी में बढ़ते जाएँ
16 यही वह लोग हैं जिन्होंने हिदायत के बदले गुमराही ख़रीद ली, फिर न उनकी तिजारत ही ने कुछ नफ़ा दिया और न उन लोगों ने हिदायत ही पाई
17 उन लोगों की मिसाल उस शख़्स की सी है जिसने भड़कती हुयी आग रौशन की फिर जब आग ने उनके गिर्दों पेश खू़ब उजाला कर दिया तो अल्लाह ने उनकी रौशनी ले ली और उनको घटाटोप अँधेरे में छोड़ दिया
18 कि अब उन्हें कुछ सुझाई नहीं देता ये लोग बहरे गूँगे अन्धे हैं कि फिर अपनी गुमराही से बाज़ नहीं आ सकते
19 या उनकी मिसाल ऐसी है जैसे आसमानी बारिश जिसमें तारिकियाँ गरज और बिजली की गरज हो मौत के खौफ से कड़क के मारे अपने कानों में ऊँगलियाँ दे लेते हैं हालाँकि अल्लाह काफि़रों को घेरे हुए है
20 क़रीब है कि बिजली उनकी आँखों को चैन्धिया दे जब उनके आगे बिजली चमकी तो उस रौशनी में चल खड़े हुए और जब उन पर अँधेरा छा गया तो खड़े हो गए और अल्लाह चाहता तो यूँ भी उनके देखने और सुनने की कूवतें छीन लेता बेशक अल्लाह हर चीज़ पर क़ादिर है “
इस्लाम की इस क्रान्ति की आग से किसी का बचना मुमकिन था ही नहीं और वक़्त की यह
ज़रुरत भी थी – क़बीलों की स्टेज का अरब 11 वर्षों में एक मुल्क एक कौम बन गया I
दावते ईमान – ‘अल्लाह के सिवा कोई इलाहा नहीं और मुहम्मद अल्लाह के रसूल हैं ‘
को आज तक मुसलमान और उनके मौलाना और स्कॉलर ‘ईमान’ की बात कहते हैं और इसी को
इस्लाम बताते हैं और इनके लिए नेकी और इंसानियत अहम नहीं है और इसी सोच का नतीजा
है आज की दहशतगर्दी और ज़ुल्म से भरा खलीफाओं
और मुस्लिम हमलावरों हुक्मरानों और हुकूमतों का इतिहास I रसूल एक अच्छा
समाज और एक अच्छी दुनिया बनाना चाहते थे और जिसकी बुनियाद और जिसकी शुरुआत एक
अच्छी उम्माह बना कर किया उन्होंने कोई इन्क़ुइजीशन inquisition का दफ्तर नहीं खोला
था जो ईसाइयों ने मध्यकाल में शुरू कर के हज़ारों इंसानों को क़त्ल कर दिया और न ही
उन्होंने कभी अपने , जिब्राइल और अल्लाह के रिश्तों और कौन किससे बना है इस पर कुछ
कहा – सिर्फ कुरान यही कहता रहा मुहम्मद अल्लाह के बन्दे और रसूल हैं I
दावते ईमान सिर्फ उम्माह में शामिल होने की दावत थी कोई रसूल के सामने पेश
होने उनसे सर पर हाथ फिरवाने पानी छिड़कवाने उनकी क़दमबोसी की दावत नहीं थी I
इस्लाम एक राजनैतिक सामाजिक आर्थिक क्रांति थी I मदीने के लोग अपने कुनबे और
कबीले से बंधे हुए थे – ऐसे भी लोग थे जो उम्माह में शामिल होना चाहते थे पर अपने
कुनबे कबीले की वजह से पीछे थे और कुछ ऐसे थे जो शामिल नहीं होना चाहते थे पर उन
पर शामिल होने के लिए कुनबे कबीले का दबाव था I
“ 21 ऐ लोगों अपने रब की इबादत करो जिसने तुमको और उन लोगों को जो तुम से पहले थे पैदा किया है अजब नहीं तुम परहेज़गार बन जाओ
22 जिसने तुम्हारे लिए ज़मीन का बिछौना और आसमान को छत बनाया और आसमान से पानी बरसाया फिर उसी ने तुम्हारे खाने के लिए बाज़ फल पैदा किए बस किसी को अल्लाह के बराबर न बनाओ हालाँकि तुम खू़ब जानते हो
23 और अगर तुम लोग इस कलाम से जो हमने अपने बन्दे पर नाजि़ल किया है शक में पड़े हो बस अगर तुम सच्चे हो तो तुम एक सूरा बना लाओ और अल्लाह के सिवा जो भी तुम्हारे मददगार हों उनको भी बुला लो
24 बस अगर तुम ये नहीं कर सकते हो और हरगिज़ नहीं कर सकोगे तो उस आग से डरो जिसके ईधन आदमी और पत्थर होंगे और काफि़रों के लिए तैयार की गई है”
“25 और जो लोग इमान लाए और उन्होंने नेक काम किए उनको खुशख़बरी दे दो कि उनके लिए वह बाग़ात हैं जिनके नीचे नहरे जारी हैं जब उन्हें इन बाग़ात का कोई मेवा खाने को मिलेगा तो कहेंगे ये तो वही उन्हें मिलती जुलती सूरत व रंग के मिला करेंगे और जन्नत में उनके लिए साफ सुथरी बीवियाँ होगी और ये लोग उस बाग़ में हमेशा रहेंगे
26 बेशक अल्लाह मच्छर या उससे भी बढ़कर की कोई मिसाल बयान करने में नहीं झेंपता बस जो लोग ईमान ला चुके हैं वह तो यह यक़ीन जानते हैं कि ये बिल्कुल ठीक है और ये रब की तरफ़ से है वह लोग जो काफि़र है बस वह बोल उठते हैं कि अल्लाह का इस मिसाल से क्या मतलब है, ऐसी मिसाल से अल्लाह बहुतेरों की हिदायत करता है मगर गुमराही में छोड़ता भी है तो ऐसे बदकारों को “
“27 जो लोग अल्लाह के एहदो पैमान को मज़बूत हो जाने के बाद तोड़ डालते हैं और जिन का अल्लाह ने हुक्म दिया है उनको क़ताआ कर देते हैं और मुल्क में फसाद करते फिरते हैं, यही लोग घाटा उठाने वाले हैं
28 क्यों कर तुम अल्लाह का इन्कार कर सकते हो हालाँकि तुम बेजान थे तो उसी ने तुमको ज़िन्दा किया फिर वही तुमको मार डालेगा, फिर वही तुमको जि़न्दा करेगा फिर उसी की तरफ लौटाए जाओगे
“ 21 ऐ लोगों अपने रब की इबादत करो जिसने तुमको और उन लोगों को जो तुम से पहले थे पैदा किया है अजब नहीं तुम परहेज़गार बन जाओ
22 जिसने तुम्हारे लिए ज़मीन का बिछौना और आसमान को छत बनाया और आसमान से पानी बरसाया फिर उसी ने तुम्हारे खाने के लिए बाज़ फल पैदा किए बस किसी को अल्लाह के बराबर न बनाओ हालाँकि तुम खू़ब जानते हो
23 और अगर तुम लोग इस कलाम से जो हमने अपने बन्दे पर नाजि़ल किया है शक में पड़े हो बस अगर तुम सच्चे हो तो तुम एक सूरा बना लाओ और अल्लाह के सिवा जो भी तुम्हारे मददगार हों उनको भी बुला लो
24 बस अगर तुम ये नहीं कर सकते हो और हरगिज़ नहीं कर सकोगे तो उस आग से डरो जिसके ईधन आदमी और पत्थर होंगे और काफि़रों के लिए तैयार की गई है”
“25 और जो लोग इमान लाए और उन्होंने नेक काम किए उनको खुशख़बरी दे दो कि उनके लिए वह बाग़ात हैं जिनके नीचे नहरे जारी हैं जब उन्हें इन बाग़ात का कोई मेवा खाने को मिलेगा तो कहेंगे ये तो वही उन्हें मिलती जुलती सूरत व रंग के मिला करेंगे और जन्नत में उनके लिए साफ सुथरी बीवियाँ होगी और ये लोग उस बाग़ में हमेशा रहेंगे
26 बेशक अल्लाह मच्छर या उससे भी बढ़कर की कोई मिसाल बयान करने में नहीं झेंपता बस जो लोग ईमान ला चुके हैं वह तो यह यक़ीन जानते हैं कि ये बिल्कुल ठीक है और ये रब की तरफ़ से है वह लोग जो काफि़र है बस वह बोल उठते हैं कि अल्लाह का इस मिसाल से क्या मतलब है, ऐसी मिसाल से अल्लाह बहुतेरों की हिदायत करता है मगर गुमराही में छोड़ता भी है तो ऐसे बदकारों को “
“27 जो लोग अल्लाह के एहदो पैमान को मज़बूत हो जाने के बाद तोड़ डालते हैं और जिन का अल्लाह ने हुक्म दिया है उनको क़ताआ कर देते हैं और मुल्क में फसाद करते फिरते हैं, यही लोग घाटा उठाने वाले हैं
28 क्यों कर तुम अल्लाह का इन्कार कर सकते हो हालाँकि तुम बेजान थे तो उसी ने तुमको ज़िन्दा किया फिर वही तुमको मार डालेगा, फिर वही तुमको जि़न्दा करेगा फिर उसी की तरफ लौटाए जाओगे
29 वही तो वह है जिसने तुम्हारे फायदे के ज़मीन की कुल चीज़ों को
पैदा किया फिर आसमान की तरफ़ मुतावज्जेह
हुआ तो सात आसमान हमवार बना दिए और वह हर चीज़ से
वाकि़फ है “
मदीने वाले सभी इंसानों की तरह बुराईयों और गुनाहों का माज़ी रखते थे उनके सर
से गुनाहों का बोझ उतारने के लिए उन्हें नेकी के रास्ते बढ़ाने के लिए उनके लिए यह
समझना ज़रूरी था कि इंसान किसी के बहकाने से गलती करते हैं और उन्हें जो बहकाता है
वह क्यों बहकाता है इसके लिए उन्हें खल्क़त के वक़्त जो हुआ वह जानना ज़रूरी है
I
“30 और उस वक़्त को याद करो जब तुम्हारे रब ने फ़रिश्तों से कहा कि मैं एक नायब ज़मीन में बनानेवाला हूँ कहने लगे क्या तू ज़मीन में ऐसे को पैदा करेगा जो ज़मीन में फ़साद और खू़ँरेजि़याँ करता फिरे जबकि हम तेरी तारीफ व तसबीह करते हैं और तेरी पाकीज़गी साबित करते हैं तब अल्लाह ने फरमाया इसमें तो शक ही नहीं कि जो मैं जानता हूँ तुम नहीं जानते
31 और आदम को सब चीज़ों के नाम सिखा दिए फिर उनको फरिश्तों के सामने पेश किया और फ़रमाया कि अगर तुम अपने दावे में सच्चे हो तो मुझे इन चीज़ों के नाम बताओ
32 तब फ़रिश्तों ने अर्ज़ की तू पाक व पाकीज़ा है हमे तो जो कुछ तूने बताया है उसके सिवा कुछ नहीं जानते तू बड़ा जानने वाला, पहचानने वाला है
33 हुक्म दिया कि ऐ आदम तुम इन फ़रिश्तों को उन सब चीज़ों के नाम बता दो बस जब आदम ने फ़रिश्तों को उन चीज़ों के नाम बता दिए तो अल्लाह ने फरिश्तों की तरफ खि़ताब करके फरमाया क्यों, मैं तुमसे न कहता था कि मैं आसमानों और ज़मीनों के छिपे हुए राज़ को जानता हूँ, और जो कुछ तुम अब ज़ाहिर करते हो और जो कुछ तुम छुपाते थे जानता हूँ
34 और जब हमने फ़रिश्तों से कहा कि आदम को सजदा करो तो सब के सब झुक गए मगर इब्लीस ने इन्कार किया और ग़ुरूर में आ गया और काफि़र हो गया “
“30 और उस वक़्त को याद करो जब तुम्हारे रब ने फ़रिश्तों से कहा कि मैं एक नायब ज़मीन में बनानेवाला हूँ कहने लगे क्या तू ज़मीन में ऐसे को पैदा करेगा जो ज़मीन में फ़साद और खू़ँरेजि़याँ करता फिरे जबकि हम तेरी तारीफ व तसबीह करते हैं और तेरी पाकीज़गी साबित करते हैं तब अल्लाह ने फरमाया इसमें तो शक ही नहीं कि जो मैं जानता हूँ तुम नहीं जानते
31 और आदम को सब चीज़ों के नाम सिखा दिए फिर उनको फरिश्तों के सामने पेश किया और फ़रमाया कि अगर तुम अपने दावे में सच्चे हो तो मुझे इन चीज़ों के नाम बताओ
32 तब फ़रिश्तों ने अर्ज़ की तू पाक व पाकीज़ा है हमे तो जो कुछ तूने बताया है उसके सिवा कुछ नहीं जानते तू बड़ा जानने वाला, पहचानने वाला है
33 हुक्म दिया कि ऐ आदम तुम इन फ़रिश्तों को उन सब चीज़ों के नाम बता दो बस जब आदम ने फ़रिश्तों को उन चीज़ों के नाम बता दिए तो अल्लाह ने फरिश्तों की तरफ खि़ताब करके फरमाया क्यों, मैं तुमसे न कहता था कि मैं आसमानों और ज़मीनों के छिपे हुए राज़ को जानता हूँ, और जो कुछ तुम अब ज़ाहिर करते हो और जो कुछ तुम छुपाते थे जानता हूँ
34 और जब हमने फ़रिश्तों से कहा कि आदम को सजदा करो तो सब के सब झुक गए मगर इब्लीस ने इन्कार किया और ग़ुरूर में आ गया और काफि़र हो गया “
इसके बाद इब्लीस ने आदम और हव्वा को बहका दिया :
“ 35 और हमने आदम से कहा ऐ आदम तुम अपनी बीवी समैत जन्नत में रहा सहा करो और जहाँ से तुम्हारा जी चाहे उसमें से ब फराग़त खाओ मगर उस दरख़्त के पास भी न जाना फिर तुम अपना आप नुक़सान करोगे
36 तब शैतान ने आदम व हौव्वा को वहाँ से डगमगाया और आखि़रकार उनको जिस में थे उनसे निकाल फेंका और हमने कहा तुम उतर पड़ो तुममें से एक का एक दुशमन होगा और ज़मीन में तुम्हारे लिए एक ख़ास वक़्त तक ठहराव और ठिकाना है
37 फिर आदम ने अपने रब से सीखे बस अल्लाह ने उन अल्फाज़ की बरकत से आदम की तौबा कु़बूल कर ली बेशक वह बड़ा माफ़ करने वाला मेहरबान है
38 ये हुक्म दिया था कि यहाँ से उतर पड़ो अगर तुम्हारे पास मेरी तरफ़ से हिदायत आए तो जो लोग मेरी हिदायत पर चलेंगे उन पर में न कोई ख़ौफ होगा
39 और न वह रंजीदा होगे और जिन लोगों ने कुफ्र इख़तेयार किया और हमारी आयतों को झुठलाया तो वही जहन्नुमी हैं और हमेशा जहन्नम में पड़े रहेगे “
“ 35 और हमने आदम से कहा ऐ आदम तुम अपनी बीवी समैत जन्नत में रहा सहा करो और जहाँ से तुम्हारा जी चाहे उसमें से ब फराग़त खाओ मगर उस दरख़्त के पास भी न जाना फिर तुम अपना आप नुक़सान करोगे
36 तब शैतान ने आदम व हौव्वा को वहाँ से डगमगाया और आखि़रकार उनको जिस में थे उनसे निकाल फेंका और हमने कहा तुम उतर पड़ो तुममें से एक का एक दुशमन होगा और ज़मीन में तुम्हारे लिए एक ख़ास वक़्त तक ठहराव और ठिकाना है
37 फिर आदम ने अपने रब से सीखे बस अल्लाह ने उन अल्फाज़ की बरकत से आदम की तौबा कु़बूल कर ली बेशक वह बड़ा माफ़ करने वाला मेहरबान है
38 ये हुक्म दिया था कि यहाँ से उतर पड़ो अगर तुम्हारे पास मेरी तरफ़ से हिदायत आए तो जो लोग मेरी हिदायत पर चलेंगे उन पर में न कोई ख़ौफ होगा
39 और न वह रंजीदा होगे और जिन लोगों ने कुफ्र इख़तेयार किया और हमारी आयतों को झुठलाया तो वही जहन्नुमी हैं और हमेशा जहन्नम में पड़े रहेगे “
1400 साल पहले की दुनिया में जब रोम, फारस, हिन्द, चीन आदि शिखर पर थे तब अरब
के एक शहर मदीना में एक नयी उम्माह में शामिल होने वाले आम भोले भाले मर्दों औरतों
बच्चों को दुनिया, ज़िन्दगी और आखिरत का मतलब मिल गया – रसूल और कुरान की पैरवी
करो, शैतान से बचो
नयी उम्माह अपनी इबादत में येरुशलम का रुख करती थी और यहूदी ईसाई भी उसी तरफ
रुख कर के इबादत करते थे I
रसूल ने यह नहीं चाहा कि यहूदी और ईसाई अपना मजहब छोड़ कर मुसलमान हो जाएँ बस
यह चाहा कि उन्हें और कुरान को हक़ मान लें I
“ 40 ऐ बनी इसराईल मेरे उन एहसानात को याद करो जो तुम पर पहले कर चुके हैं और तुम मेरे एहद व इक़रार को पूरा करो तो मैं तुम्हारे एहद को पूरा करूँगा, और मुझ ही से डरते रहो
41 और जो मैंने नाजि़ल किया वह उस किताब की तसदीक़ करता हूँ जो तुम्हारे पास है और तुम सबसे पहले उसके इन्कार करने वाले न हो जाओ और मेरी आयतों के बदले थोड़ी क़ीमत न लो और मुझ ही से डरते रहो
42 और हक़ को बातिल के साथ न मिलाओ और हक़ बात को न छिपाओ हालाँकि तुम जानते हो और पाबन्दी से नमाज़ अदा करो
43 और ज़कात दिया करो और जो लोग इबादत के लिए झुकते हैं उनके साथ तुम भी झुका करो
44 और तुम लोगों से नेकी करने को कहते हो और अपनी ख़बर नहीं लेते हालाँकि तुम किताब को रटा करते हो तो तुम क्या इतना भी नहीं समझते “
“ 40 ऐ बनी इसराईल मेरे उन एहसानात को याद करो जो तुम पर पहले कर चुके हैं और तुम मेरे एहद व इक़रार को पूरा करो तो मैं तुम्हारे एहद को पूरा करूँगा, और मुझ ही से डरते रहो
41 और जो मैंने नाजि़ल किया वह उस किताब की तसदीक़ करता हूँ जो तुम्हारे पास है और तुम सबसे पहले उसके इन्कार करने वाले न हो जाओ और मेरी आयतों के बदले थोड़ी क़ीमत न लो और मुझ ही से डरते रहो
42 और हक़ को बातिल के साथ न मिलाओ और हक़ बात को न छिपाओ हालाँकि तुम जानते हो और पाबन्दी से नमाज़ अदा करो
43 और ज़कात दिया करो और जो लोग इबादत के लिए झुकते हैं उनके साथ तुम भी झुका करो
44 और तुम लोगों से नेकी करने को कहते हो और अपनी ख़बर नहीं लेते हालाँकि तुम किताब को रटा करते हो तो तुम क्या इतना भी नहीं समझते “
यहाँ पर नेकी किताब रटने से अफज़ल है ज़ाहिर है I
“45 और सब्र और नमाज़ का सहारा पकड़ो और अलबत्ता नमाज़ दूभर तो है सिवाय उन ख़ाक़सारों पर जो बख़ूबी जानते हैं
46 कि वह अपने रब की बारगाह में हाजि़र होंगे और ज़रूर उसकी तरफ लौट जाएँगे
47 ऐ बनी इसराइल मेरी उन नेअमतों को याद करो जो मैंने पहले तुम्हें दी और ये कि हमने तुमको सारे जहाँन के लोगों से तरजीह दी
48 और उस दिन से डरो कोई शख़्स किसी की तरफ से न फिदिया हो सकेगा और न उसकी तरफ से कोई सिफारिश मानी जाएगी और न उसका कोई मुआवज़ा लिया जाएगा और न वह मदद पहुँचाए जाएँगे
49 और जब हमने तुम्हें फिरऔन से छुड़ाया जो तुम्हें बड़े-बड़े दुख दे के सताते थे तुम्हारे लड़कों को क़त्ल करते थे और तुम्हारी औरतों को जि़न्दा रहने देते थे और उसमें तुम्हारे रब की तरफ से सख़्त आज़माइश थी
50 और जब हमने तुम्हारे लिए दरया को टुकड़े-टुकड़े किया फिर हमने तुमको छुटकारा दिया
51 और फिरऔन के आदमियों को तुम्हारे देखते-देखते डुबो दिया और जब हमने मूसा से चालीस रातों का वायदा किया था और तुम लोगों ने उनके जाने के बाद एक बछड़े को बना लिया
52 हालाँकि तुम अपने ऊपर ज़ुल्म करते रहे थे फिर हमने उसके बाद भी तुम से दरगुज़र की ताकि तुम शुक्र करो
53 और जब मूसा को अता की और हक़ और बातिल को जुदा करनेवाला क़ानून ताकि तुम हिदायत पाओ
54 और जब मूसा ने अपनी क़ौम से कहा कि ऐ मेरी क़ौम तुमने बछड़े को बना के अपने ऊपर बड़ा सख़्त जु़ल्म किया तो अब तुम बारगाह में तौबा करो और वह ये है कि अपने को क़त्ल कर डालो बारगाह के नज़दीक तुम्हारे हक़ में यही बेहतर है, फिर जब तुमने ऐसा किया तो तुम्हारी तौबा क़ुबूल कर ली बेशक वह बड़ा मेहरबान माफ़ करने वाला है
55 और जब तुमने मूसा से कहा था कि ऐ मूसा हम तुम पर उस वक़्त तक ईमान न लाएँगे जब तक हम अल्लाह को ज़ाहिर बज़ाहिर न देख ले उस पर तुम्हें बिजली ने ले डाला, और तुम तकते ही रह गए
56 फिर तुम्हें तुम्हारे मरने के बाद हमने जिला उठाया ताकि तुम शुक्र करो
57 और हमने तुम पर अब्र का साया किया और तुम पर मन व सलवा उतारा और जो सुथरी व नफीस रोजि़या तुम्हें दी हैं उन्हें शौक़ से खाओ, और उन लोगों ने हमारा तो कुछ बिगाड़ा नहीं मगर अपनी जानों पर सितम ढाते रहे
58 और जब हमने तुमसे कहा कि इस गाँव में जाओ और इसमें जहाँ चाहो फराग़त से खाओ और दरवाज़े पर सजदा करते हुए और ज़बान से हित्ता बखि़्शश कहते हुए आओ तो हम तुम्हारी ख़ता ये बख़्श देगे और हम नेकी करने वालों की नेकी बढ़ा देगें
59 तो जो बात उनसे कही गई थी उसे शरारतियों ने बदलकर दूसरी बात कहनी शुरू कर दी तब हमने उन लोगों पर जिन्होंने शरारत की थी उनकी बदकारी की वजह से आसमानी बला नाजि़ल की
60 और जब मूसा ने अपनी क़ौम के लिए पानी माँगा तो हमने कहा अपनी लाठी पत्थर पर मारो उसमें से बारह चश्में फूट निकले और सब लोगों ने अपना-अपना घाट बखूबी जान लिया और हमने आम इजाज़त दे दी कि अल्लाह की दी हुयी रोज़ी से खाओ पियो और मुल्क में फसाद न करते फिरो
61 जब तुमने मूसा से कहा कि ऐ मूसा हमसे एक ही खाने पर न रहा जाएगा तो आप हमारे लिए अपने रब से दुआ कीजिए कि जो चीज़े ज़मीन से उगती है जैसे साग पात तरकारी और ककड़ी और गेहूँ या (लहसुन) और मसूर और प्याज़ (मन व सलवा) की जगह पैदा करें कहा क्या तुम ऐसी चीज़ को जो हर तरह से बेहतर है अदना चीज़ से बदलन चाहते हो तो किसी शहर में उतर पड़ो फिर तुम्हारे लिए जो तुमने माँगा है सब मौजूद है और उन पर ज़िल्लत रूसवाई और मोहताजी की मार पड़ी और उन लोगों अल्लाह के अज़ाब की तरफ पलटा खाया, ये सब इस सबब से हुआ कि वह लोग अल्लाह की निशानियों से इन्कार करते थे और पैग़म्बरों को नाहक शहीद करते थे, और इस वजह से कि वह नाफ़रमानी और सरकशी किया करते थे ”
49 से 61 तक सिर्फ 12 आयतों में मदीने वालों को यहूदियों के बारे में सब कुछ मालूम पड़ गया – उनकी तरह की एक उम्माह जिसे अल्लाह ने सब कुछ दिया पर वे नाफरमानी करते गए I इस तरह धीरे धीरे नयी उम्माह में शामिल मदीने के लोग कल के इज्ज़तदार यहूदियों और ईसाइयों से अपने को बहतर साबित करने का मौक़ा पा गए I
“45 और सब्र और नमाज़ का सहारा पकड़ो और अलबत्ता नमाज़ दूभर तो है सिवाय उन ख़ाक़सारों पर जो बख़ूबी जानते हैं
46 कि वह अपने रब की बारगाह में हाजि़र होंगे और ज़रूर उसकी तरफ लौट जाएँगे
47 ऐ बनी इसराइल मेरी उन नेअमतों को याद करो जो मैंने पहले तुम्हें दी और ये कि हमने तुमको सारे जहाँन के लोगों से तरजीह दी
48 और उस दिन से डरो कोई शख़्स किसी की तरफ से न फिदिया हो सकेगा और न उसकी तरफ से कोई सिफारिश मानी जाएगी और न उसका कोई मुआवज़ा लिया जाएगा और न वह मदद पहुँचाए जाएँगे
49 और जब हमने तुम्हें फिरऔन से छुड़ाया जो तुम्हें बड़े-बड़े दुख दे के सताते थे तुम्हारे लड़कों को क़त्ल करते थे और तुम्हारी औरतों को जि़न्दा रहने देते थे और उसमें तुम्हारे रब की तरफ से सख़्त आज़माइश थी
50 और जब हमने तुम्हारे लिए दरया को टुकड़े-टुकड़े किया फिर हमने तुमको छुटकारा दिया
51 और फिरऔन के आदमियों को तुम्हारे देखते-देखते डुबो दिया और जब हमने मूसा से चालीस रातों का वायदा किया था और तुम लोगों ने उनके जाने के बाद एक बछड़े को बना लिया
52 हालाँकि तुम अपने ऊपर ज़ुल्म करते रहे थे फिर हमने उसके बाद भी तुम से दरगुज़र की ताकि तुम शुक्र करो
53 और जब मूसा को अता की और हक़ और बातिल को जुदा करनेवाला क़ानून ताकि तुम हिदायत पाओ
54 और जब मूसा ने अपनी क़ौम से कहा कि ऐ मेरी क़ौम तुमने बछड़े को बना के अपने ऊपर बड़ा सख़्त जु़ल्म किया तो अब तुम बारगाह में तौबा करो और वह ये है कि अपने को क़त्ल कर डालो बारगाह के नज़दीक तुम्हारे हक़ में यही बेहतर है, फिर जब तुमने ऐसा किया तो तुम्हारी तौबा क़ुबूल कर ली बेशक वह बड़ा मेहरबान माफ़ करने वाला है
55 और जब तुमने मूसा से कहा था कि ऐ मूसा हम तुम पर उस वक़्त तक ईमान न लाएँगे जब तक हम अल्लाह को ज़ाहिर बज़ाहिर न देख ले उस पर तुम्हें बिजली ने ले डाला, और तुम तकते ही रह गए
56 फिर तुम्हें तुम्हारे मरने के बाद हमने जिला उठाया ताकि तुम शुक्र करो
57 और हमने तुम पर अब्र का साया किया और तुम पर मन व सलवा उतारा और जो सुथरी व नफीस रोजि़या तुम्हें दी हैं उन्हें शौक़ से खाओ, और उन लोगों ने हमारा तो कुछ बिगाड़ा नहीं मगर अपनी जानों पर सितम ढाते रहे
58 और जब हमने तुमसे कहा कि इस गाँव में जाओ और इसमें जहाँ चाहो फराग़त से खाओ और दरवाज़े पर सजदा करते हुए और ज़बान से हित्ता बखि़्शश कहते हुए आओ तो हम तुम्हारी ख़ता ये बख़्श देगे और हम नेकी करने वालों की नेकी बढ़ा देगें
59 तो जो बात उनसे कही गई थी उसे शरारतियों ने बदलकर दूसरी बात कहनी शुरू कर दी तब हमने उन लोगों पर जिन्होंने शरारत की थी उनकी बदकारी की वजह से आसमानी बला नाजि़ल की
60 और जब मूसा ने अपनी क़ौम के लिए पानी माँगा तो हमने कहा अपनी लाठी पत्थर पर मारो उसमें से बारह चश्में फूट निकले और सब लोगों ने अपना-अपना घाट बखूबी जान लिया और हमने आम इजाज़त दे दी कि अल्लाह की दी हुयी रोज़ी से खाओ पियो और मुल्क में फसाद न करते फिरो
61 जब तुमने मूसा से कहा कि ऐ मूसा हमसे एक ही खाने पर न रहा जाएगा तो आप हमारे लिए अपने रब से दुआ कीजिए कि जो चीज़े ज़मीन से उगती है जैसे साग पात तरकारी और ककड़ी और गेहूँ या (लहसुन) और मसूर और प्याज़ (मन व सलवा) की जगह पैदा करें कहा क्या तुम ऐसी चीज़ को जो हर तरह से बेहतर है अदना चीज़ से बदलन चाहते हो तो किसी शहर में उतर पड़ो फिर तुम्हारे लिए जो तुमने माँगा है सब मौजूद है और उन पर ज़िल्लत रूसवाई और मोहताजी की मार पड़ी और उन लोगों अल्लाह के अज़ाब की तरफ पलटा खाया, ये सब इस सबब से हुआ कि वह लोग अल्लाह की निशानियों से इन्कार करते थे और पैग़म्बरों को नाहक शहीद करते थे, और इस वजह से कि वह नाफ़रमानी और सरकशी किया करते थे ”
49 से 61 तक सिर्फ 12 आयतों में मदीने वालों को यहूदियों के बारे में सब कुछ मालूम पड़ गया – उनकी तरह की एक उम्माह जिसे अल्लाह ने सब कुछ दिया पर वे नाफरमानी करते गए I इस तरह धीरे धीरे नयी उम्माह में शामिल मदीने के लोग कल के इज्ज़तदार यहूदियों और ईसाइयों से अपने को बहतर साबित करने का मौक़ा पा गए I
दीन क्या है ?
अल्लाह , रोज़े आखिरत पर यक़ीन और नेक अमल
“ 62 बेशक मुसलमानों और यहूदियों और नसरानियों और साबिईन में से जो कोई अल्लाह और रोज़े आख़ेरत पर ईमान लाए और अच्छे-अच्छे काम
करता रहे तो उन्हीं के लिए उनका अज्र व सवाब उनके अल्लाह के पास है और न उन पर किसी का ख़ौफ होगा न वह
रंजीदा दिल होंगे
63 और जब हमने तुमसे एक़रार लिया और हमने तुम्हारे सर पर तूर लाकर लटकाया और कह दिया कि तौरेत जो हमने तुमको दी है उसको मज़बूत पकड़े रहो और जो कुछ उसमें है उसको याद रखो
64 ताकि तुम परहेज़गार बनो फिर उसके बाद तुम फिर गए बस अगर तुम पर अल्लाह का फज़ल और उसकी मेहरबानी न होती तो तुमने सख़्त घाटा उठाया होता
65 और अपनी क़ौम से उन लोगों की हालत तो तुम बखू़बी जानते हो जो शम्बे के दिन अपनी हद से गुज़र गए तो हमने उन से कहा कि तुम राइन्दे गए बन्दर बन जाओ
66 बस हमने इस वाक़ये से उन लोगों के वास्ते जिन के सामने हुआ था और जो उसके बाद आनेवाले थे अज़ाब क़रार दिया, और परहेज़गारों के लिए नसीहत
67 और जब मूसा ने अपनी क़ौम से कहा कि अल्लाह तुम लोगों को ताकीदी हुक्म करता है कि तुम एक गाय जि़बाह करो वह लोग कहने लगे क्या तुम हमसे दिल्लगी करते हो मूसा ने कहा मैं अल्लाह से पनाह माँगता हूँ कि मैं जाहिल बनूँ
68 तुम अपने अल्लाह से दुआ करो कि हमें बता दे कि वह गाय कैसी हो मूसा ने कहा बेशक अल्लाह ने फरमाता है कि वह गाय न तो बहुत बूढ़ी हो और न बछिया बल्कि उनमें से औसत दरजे की हो, ग़रज़ जो तुमको हुक्म दिया गया उसको बजा लाओ
69 वह कहने लगे तुम अपने अल्लाह से दुआ करो कि हमें ये बता दे कि उसका रंग आखि़र क्या हो मूसा ने कहा बेशक अल्लाह फरमाता है कि वह गाय खू़ब गहरे ज़र्द रंग की हो देखने वाले उसे देखकर खु़श हो जाए
70 तब कहने लगे कि तुम अपने अल्लाह से दुआ करो कि हमें ज़रा यह तो बता दे कि वह और कैसी हो गाय तो और गायों में मिल जुल गई और अल्लाह ने चाहा तो हम ज़रूर पता लगा लेगे
71 मूसा ने कहा अल्लाह ज़रूर फरमाता है कि वह गाय न तो इतनी सधाई हो कि ज़मीन जोते न खेती सीचें भली चंगी एक रंग की कि उसमें कोई धब्बा तक न हो, वह बोले अब ठीक-ठीक बयान किया, ग़रज़ उन लोगों ने वह गाय हलाल की हालाँकि उनसे उम्मीद न थी वह कि वह ऐसा करेंगे
72 और जब तुमने एक शख़्स को मार डाला और तुममें उसकी बाबत फूट पड़ गई एक दूसरे को क़ातिल बताने लगा जो तुम छिपाते थे
73 अल्लाह को उसका ज़ाहिर करना मंजू़र था बस हमने कहा कि उस गाय को कोई टुकड़ा लेकर इस पर मारो यूँ अल्लाह मुर्दे को जि़न्दा करता है और तुम को अपनी कु़दरत की निशानियाँ दिखा देता है
74 ताकि तुम समझो फिर उसके बाद तुम्हारे दिल सख़्त हो गये बस वह पत्थर के मिस्ल थे या उससे भी ज़्यादा क्योंकि पत्थरों में बाज़ तो ऐसे होते हैं कि उनसे नहरें जारी हो जाती हैं और बाज़ ऐसे होते हैं कि उनमें दरार पड़ जाती है और उनमें से पानी निकल पड़ता है और बाज़ पत्थर तो ऐसे होते हैं कि अल्लाह के ख़ौफ से गिर पड़ते हैं और जो कुछ तुम कर रहे हो उससे अल्लाह ग़ाफिल नहीं है”
63 और जब हमने तुमसे एक़रार लिया और हमने तुम्हारे सर पर तूर लाकर लटकाया और कह दिया कि तौरेत जो हमने तुमको दी है उसको मज़बूत पकड़े रहो और जो कुछ उसमें है उसको याद रखो
64 ताकि तुम परहेज़गार बनो फिर उसके बाद तुम फिर गए बस अगर तुम पर अल्लाह का फज़ल और उसकी मेहरबानी न होती तो तुमने सख़्त घाटा उठाया होता
65 और अपनी क़ौम से उन लोगों की हालत तो तुम बखू़बी जानते हो जो शम्बे के दिन अपनी हद से गुज़र गए तो हमने उन से कहा कि तुम राइन्दे गए बन्दर बन जाओ
66 बस हमने इस वाक़ये से उन लोगों के वास्ते जिन के सामने हुआ था और जो उसके बाद आनेवाले थे अज़ाब क़रार दिया, और परहेज़गारों के लिए नसीहत
67 और जब मूसा ने अपनी क़ौम से कहा कि अल्लाह तुम लोगों को ताकीदी हुक्म करता है कि तुम एक गाय जि़बाह करो वह लोग कहने लगे क्या तुम हमसे दिल्लगी करते हो मूसा ने कहा मैं अल्लाह से पनाह माँगता हूँ कि मैं जाहिल बनूँ
68 तुम अपने अल्लाह से दुआ करो कि हमें बता दे कि वह गाय कैसी हो मूसा ने कहा बेशक अल्लाह ने फरमाता है कि वह गाय न तो बहुत बूढ़ी हो और न बछिया बल्कि उनमें से औसत दरजे की हो, ग़रज़ जो तुमको हुक्म दिया गया उसको बजा लाओ
69 वह कहने लगे तुम अपने अल्लाह से दुआ करो कि हमें ये बता दे कि उसका रंग आखि़र क्या हो मूसा ने कहा बेशक अल्लाह फरमाता है कि वह गाय खू़ब गहरे ज़र्द रंग की हो देखने वाले उसे देखकर खु़श हो जाए
70 तब कहने लगे कि तुम अपने अल्लाह से दुआ करो कि हमें ज़रा यह तो बता दे कि वह और कैसी हो गाय तो और गायों में मिल जुल गई और अल्लाह ने चाहा तो हम ज़रूर पता लगा लेगे
71 मूसा ने कहा अल्लाह ज़रूर फरमाता है कि वह गाय न तो इतनी सधाई हो कि ज़मीन जोते न खेती सीचें भली चंगी एक रंग की कि उसमें कोई धब्बा तक न हो, वह बोले अब ठीक-ठीक बयान किया, ग़रज़ उन लोगों ने वह गाय हलाल की हालाँकि उनसे उम्मीद न थी वह कि वह ऐसा करेंगे
72 और जब तुमने एक शख़्स को मार डाला और तुममें उसकी बाबत फूट पड़ गई एक दूसरे को क़ातिल बताने लगा जो तुम छिपाते थे
73 अल्लाह को उसका ज़ाहिर करना मंजू़र था बस हमने कहा कि उस गाय को कोई टुकड़ा लेकर इस पर मारो यूँ अल्लाह मुर्दे को जि़न्दा करता है और तुम को अपनी कु़दरत की निशानियाँ दिखा देता है
74 ताकि तुम समझो फिर उसके बाद तुम्हारे दिल सख़्त हो गये बस वह पत्थर के मिस्ल थे या उससे भी ज़्यादा क्योंकि पत्थरों में बाज़ तो ऐसे होते हैं कि उनसे नहरें जारी हो जाती हैं और बाज़ ऐसे होते हैं कि उनमें दरार पड़ जाती है और उनमें से पानी निकल पड़ता है और बाज़ पत्थर तो ऐसे होते हैं कि अल्लाह के ख़ौफ से गिर पड़ते हैं और जो कुछ तुम कर रहे हो उससे अल्लाह ग़ाफिल नहीं है”
यह जो आयतें
नाजिल होती थीं उनकी तिलावत रसूल करते थे उन्हें बहुत से मुसलमान दिल से याद कर
लेते थे और कुछ पत्तों, कपड़ों और चमड़े वगैरा पर लिख लेते थे I यह आयतें जो ईमान
नहीं लाये थे उन तक और यहूदियों ईसाइयों तक पहुँचती रहती थीं और उनके जवाब वापस
रसूल तक सीधे या उनके करीबी सहाबा के ज़रिये पहुँचते रहते थे I इस तरह मदीने में
लगातार डायलाग चल रहा था और कोई इससे अनभिज्ञ नहीं था I सीधी बात तो यह थी कि अगर
मूसा रसूल थे तो ईसा भी रसूल थे और अगर मूसा और ईसा रसूल थे तो मुहम्मद भी रसूल थे
और अगर तौरैत अल्लाह की किताब थी तो इंजील भी अल्लाह की किताब थी और अगर तौरैत और
इंजील अल्लाह की किताब है तो कुरान भी अल्लाह की किताब है – इस सीधी बात पर न तो
1400 वर्ष पहले लोग राज़ी हो पाए और न आज राज़ी हैं I वैसे आज भी
मुमकिन है कि तीनों मजहब के आलिम और स्कॉलर एक आंम राय बना कर यह इकरार कर लें कि
बेशक मूसा, ईसा और मुहम्मद रसूल थे और तीनों किताबें आसमानी किताबे हैं I
उम्माह के लोग यह
आरज़ू तो करते ही थे काश यहूदी और ईसाई रसूल और कुरान पर ईमान ले आते I
“ 75 क्या तुम ये लालच रखते हो कि वह तुम्हारा ईमान लाएँगें हालाँकि उनमें का एक गिरोह साबिक़ में ऐसा था कि अल्लाह का कलाम सुनता था और अच्छी तरह समझने के बाद उलट फेर कर देता था हालाँकि वह खू़ब जानते थे और जब उन लोगों से मुलाक़ात करते हैं
76 जो ईमान लाए तो कह देते हैं कि हम तो ईमान ला चुके और जब उनसे बाज़-बाज़ के साथ तखि़लया में मिलते हैं तो कहते हैं कि जो कुछ अल्लाह ने तुम पर ज़ाहिर कर दिया है क्या तुम बता दोगे ताकि उसके सबब से कल तुम्हारे अल्लाह के पास तुम पर हुज्जत लाएँ क्या तुम इतना भी नहीं समझते
77 लेकिन क्या वह लोग नहीं जानते कि वह लोग जो कुछ छिपाते हैं या ज़ाहिर करते हैं अल्लाह सब कुछ जानता है “
“ 75 क्या तुम ये लालच रखते हो कि वह तुम्हारा ईमान लाएँगें हालाँकि उनमें का एक गिरोह साबिक़ में ऐसा था कि अल्लाह का कलाम सुनता था और अच्छी तरह समझने के बाद उलट फेर कर देता था हालाँकि वह खू़ब जानते थे और जब उन लोगों से मुलाक़ात करते हैं
76 जो ईमान लाए तो कह देते हैं कि हम तो ईमान ला चुके और जब उनसे बाज़-बाज़ के साथ तखि़लया में मिलते हैं तो कहते हैं कि जो कुछ अल्लाह ने तुम पर ज़ाहिर कर दिया है क्या तुम बता दोगे ताकि उसके सबब से कल तुम्हारे अल्लाह के पास तुम पर हुज्जत लाएँ क्या तुम इतना भी नहीं समझते
77 लेकिन क्या वह लोग नहीं जानते कि वह लोग जो कुछ छिपाते हैं या ज़ाहिर करते हैं अल्लाह सब कुछ जानता है “
यहूदियों ने अपनी
मोर्चाबंदी इस तरह की कि कोई तौरैत में क्या है मुसलामानों को न बताये I
“ 78 और कुछ उनमें से ऐसे अनपढ़ हैं कि वह किताबे अल्लाह को अपने मतलब की बातों के सिवा कुछ नहीं समझते और वह फक़त ख़्याली बातें किया करते हैं,
79 बस वाए हो उन लोगों पर जो अपने हाथ से किताब लिखते हैं फिर हैं कि यह अल्लाह के यहाँ से है ताकि उसके ज़रिये से थोड़ी सी क़ीमत हासिल करें बस अफसोस है उन पर कि उनके हाथों ने लिखा और फिर अफसोस है उनपर कि वह ऐसी कमाई करते हैं “
“ 78 और कुछ उनमें से ऐसे अनपढ़ हैं कि वह किताबे अल्लाह को अपने मतलब की बातों के सिवा कुछ नहीं समझते और वह फक़त ख़्याली बातें किया करते हैं,
79 बस वाए हो उन लोगों पर जो अपने हाथ से किताब लिखते हैं फिर हैं कि यह अल्लाह के यहाँ से है ताकि उसके ज़रिये से थोड़ी सी क़ीमत हासिल करें बस अफसोस है उन पर कि उनके हाथों ने लिखा और फिर अफसोस है उनपर कि वह ऐसी कमाई करते हैं “
और कुछ लोगों ने
भ्रमित करने के लिए फर्जी बनावटी किताब पेश की I
“ 80 और कहते हैं कि गिनती के चन्द दिनों के सिवा हमें आग छुएगी भी तो नहीं इन लोगों से कहो कि क्या तुमने अल्लाह से कोई इक़रार ले लिया है कि फिर वह किसी तरह अपने इक़रार के खि़लाफ़ हरगिज़ न करेगा या बे समझे बूझे अल्लाह पर बोहतान जोड़ते हो
81 हाँ जिसने बुराई हासिल की और उसके गुनाहों ने चारों तरफ से उसे घेर लिया है वही लोग तो जहन्नमी हैं और वही उसमें हमेशा रहेगें
82 और जो लोग ईमानदार हैं और उन्होंने अच्छे काम किए हैं वही लोग जन्नती हैं कि हमेशा बाग़ (जन्नत) में रहेंगे “
“ 80 और कहते हैं कि गिनती के चन्द दिनों के सिवा हमें आग छुएगी भी तो नहीं इन लोगों से कहो कि क्या तुमने अल्लाह से कोई इक़रार ले लिया है कि फिर वह किसी तरह अपने इक़रार के खि़लाफ़ हरगिज़ न करेगा या बे समझे बूझे अल्लाह पर बोहतान जोड़ते हो
81 हाँ जिसने बुराई हासिल की और उसके गुनाहों ने चारों तरफ से उसे घेर लिया है वही लोग तो जहन्नमी हैं और वही उसमें हमेशा रहेगें
82 और जो लोग ईमानदार हैं और उन्होंने अच्छे काम किए हैं वही लोग जन्नती हैं कि हमेशा बाग़ (जन्नत) में रहेंगे “
बनी इस्राएल से
अहद :
83 और जब हमने बनी ईसराइल से अहद व पैमान लिया था कि अल्लाह के सिवा किसी की इबादत न करना और माँ बाप और क़राबतदारों और यतीमों और मोहताजों के साथ अच्छे सुलूक करना और लोगों के साथ अच्छी तरह से बातें करना और बराबर नमाज़ पढ़ना और ज़कात देना फिर तुममें से थोड़े आदमियों के सिवा फिर गए और तुम लोग हो ही इक़रार से मुँह फेरने वाले
84 और जब हमने तुम से अहद लिया था कि आपस में खू़रेजि़याँ न करना और न अपने लोगों को शहर बदर करना तो तुम ने इक़रार किया था और तुम भी उसकी गवाही देते हो
85 फिर वही लोग तो तुम हो कि आपस में एक दूसरे को क़त्ल करते हो और अपनों से एक जत्थे के नाहक़ और ज़बरदस्ती हिमायती बनकर दूसरे को शहर बदर करते हो अगर वही लोग क़ैदी बनकर तम्हारे पास आए तो उनको तावान देकर छुड़ा लेते हो हालाँकि उनका निकालना ही तुम पर हराम किया गया था तो फिर क्या तुम बाज़ बातों पर ईमान रखते हो और बाज़ से इन्कार करते हो बस तुम में से जो लोग ऐसा करें उनकी सज़ा इसके सिवा और कुछ नहीं कि जि़न्दगी भर की रूसवाई हो और क़यामत के दिन सख़्त अज़ाब की तरफ लौटा दिये जाए और जो कुछ तुम लोग करते हो अल्लाह उससे ग़ाफि़ल नहीं है
86 यही वह लोग हैं जिन्होंने आख़ेरत के बदले दुनिया की जि़न्दगी ख़रीद ली बस न उनके अज़ाब ही में कमी की जाएगी और न वह लोग किसी तरह की मदद दिए जाएँगे
87 और ये हक़ीक़ी बात है कि हमने मूसा को किताब दी और उनके बाद बहुत से पैग़म्बरों को उनके क़दम ब क़दम ले चलें और मरयम के बेटे ईसा को वाजे़ए व रौशन मौजिजे दिए और रूह कुद्दूस के ज़रिये से उनकी मदद की क्या तुम उस क़द्र बददिमाग़ हो गए हो कि जब कोई पैग़म्बर तुम्हारे पास तुम्हारी ख़्वाहिशे नफ़सानी के खि़लाफ कोई हुक्म लेकर आया तो तुम अकड़ बैठे फिर तुमने बाज़ पैग़म्बरों को तो झुठलाया और बाज़ को जान से मार डाला
88 और कहने लगे कि हमारे दिलों पर गि़लाफ चढ़ा हुआ है बल्कि उनके कुफ्र की वजह से अल्लाह ने उनपर लानत की है बस कम ही लोग ईमान लाते हैं
89 और जब उनके पास अल्लाह की तरफ़ से किताब आई और वह उस की जो उन के पास है तसदीक़ भी करती है। और उससे पहले काफि़रों पर फतेहयाब होने की दुआएँ माँगते थे बस जब उनके पास वह चीज़ जिसे पहचानते थे आ गई तो लगे इन्कार करने बस काफि़रों पर अल्लाह की लानत है
90 क्या ही बुरा है वह काम जिसके मुक़ाबले में वह लोग अपनी जानें बेच बैठे हैं कि अल्लाह अपने बन्दों से जिस पर चाहे अपनी इनायत से किताब नाजि़ल किया करे इस रश्क से जो कुछ अल्लाह ने नाजि़ल किया है सबका इन्कार कर बैठे बस उन पर ग़ज़ब पर ग़ज़ब टूट पड़ा और काफि़रों के लिए रूसवाई का अज़ाब है
91 और जब उनसे कहा गया कि अल्लाह ने नाजि़ल किया है उस पर ईमान लाओ तो कहने लगे कि हम तो उसी किताब पर ईमान लाए हैं जो हम पर नाजि़ल की गई थी और उस किताब को जो उसके बाद आई है नहीं मानते हैं हालाँकि वह हक़ है और उस किताब की जो उनके पास है तसदीक़ भी करती है मगर उस किताब कु़रान का जो उसके बाद आई है इन्कार करते हैं उनसे ये तो पूछो कि तुम अगर ईमानदार थे तो फिर क्यों अल्लाह के पैग़म्बरों का साबिक़ मे क़त्ल करते थे
92 और तुम्हारे पास मूसा तो वाज़ेए व रौशन मौजिज़े लेकर आ ही चुके थे फिर भी तुमने उनके बाद बछड़े को अल्लाह बना ही लिया और उससे तुम अपने ही ऊपर ज़ुल्म करने वाले थे
93 और जब हमने तुमसे अहद लिया और तूर को तुम्हारे सर पर लटकाया और जो हमने दी है मज़बूती से लिए रहो और सुनो तो कहने लगे सुना तो हम इसको मानते नहीं और उनकी बेईमानी की वजह से बछड़े की उलफ़त घोल के उनके दिलों में पिला दी गई उन लोगों से कह दो कि अगर तुम ईमानदार थे तो तुमको तुम्हारा ईमान क्या ही बुरा हुक्म करता था
94 इन लोगों से कह दो कि अगर अल्लाह के नज़दीक आख़ेरत का घर ख़ास तुम्हारे वास्ते है और लोगों के वास्ते नहीं है बस अगर तुम सच्चे हो तो मौत की आरजू़ करो
95 लेकिन वह उन आमाले बद की वजह से जिनको उनके हाथों ने पहले से आगे भेजा है हरगिज़ मौत की आरज़ू न करेंगे और अल्लाह ज़ालिमों से खू़ब वाकि़फ है
96 और तुम उन ही को जि़न्दगी का सबसे ज़्यादा हरीस पाओगे और मुशरिक़ों में से हर एक शख़्स चाहता है कि काश उसको हज़ार बरस की उम्र दी जाती हालाँकि अगर इतनी लम्बी उम्र भी दी जाए तो वह अल्लाह के अज़ाब से छुटकारा देने वाली नहीं, और जो कुछ वह लोग करते हैं अल्लाह उसे देख रहा है”
कुछ
यहूदी अल्लाह का कलाम मुहम्मद तक लाने के लिए जिब्राइल के दुश्मन हो गए ! 83 और जब हमने बनी ईसराइल से अहद व पैमान लिया था कि अल्लाह के सिवा किसी की इबादत न करना और माँ बाप और क़राबतदारों और यतीमों और मोहताजों के साथ अच्छे सुलूक करना और लोगों के साथ अच्छी तरह से बातें करना और बराबर नमाज़ पढ़ना और ज़कात देना फिर तुममें से थोड़े आदमियों के सिवा फिर गए और तुम लोग हो ही इक़रार से मुँह फेरने वाले
84 और जब हमने तुम से अहद लिया था कि आपस में खू़रेजि़याँ न करना और न अपने लोगों को शहर बदर करना तो तुम ने इक़रार किया था और तुम भी उसकी गवाही देते हो
85 फिर वही लोग तो तुम हो कि आपस में एक दूसरे को क़त्ल करते हो और अपनों से एक जत्थे के नाहक़ और ज़बरदस्ती हिमायती बनकर दूसरे को शहर बदर करते हो अगर वही लोग क़ैदी बनकर तम्हारे पास आए तो उनको तावान देकर छुड़ा लेते हो हालाँकि उनका निकालना ही तुम पर हराम किया गया था तो फिर क्या तुम बाज़ बातों पर ईमान रखते हो और बाज़ से इन्कार करते हो बस तुम में से जो लोग ऐसा करें उनकी सज़ा इसके सिवा और कुछ नहीं कि जि़न्दगी भर की रूसवाई हो और क़यामत के दिन सख़्त अज़ाब की तरफ लौटा दिये जाए और जो कुछ तुम लोग करते हो अल्लाह उससे ग़ाफि़ल नहीं है
86 यही वह लोग हैं जिन्होंने आख़ेरत के बदले दुनिया की जि़न्दगी ख़रीद ली बस न उनके अज़ाब ही में कमी की जाएगी और न वह लोग किसी तरह की मदद दिए जाएँगे
87 और ये हक़ीक़ी बात है कि हमने मूसा को किताब दी और उनके बाद बहुत से पैग़म्बरों को उनके क़दम ब क़दम ले चलें और मरयम के बेटे ईसा को वाजे़ए व रौशन मौजिजे दिए और रूह कुद्दूस के ज़रिये से उनकी मदद की क्या तुम उस क़द्र बददिमाग़ हो गए हो कि जब कोई पैग़म्बर तुम्हारे पास तुम्हारी ख़्वाहिशे नफ़सानी के खि़लाफ कोई हुक्म लेकर आया तो तुम अकड़ बैठे फिर तुमने बाज़ पैग़म्बरों को तो झुठलाया और बाज़ को जान से मार डाला
88 और कहने लगे कि हमारे दिलों पर गि़लाफ चढ़ा हुआ है बल्कि उनके कुफ्र की वजह से अल्लाह ने उनपर लानत की है बस कम ही लोग ईमान लाते हैं
89 और जब उनके पास अल्लाह की तरफ़ से किताब आई और वह उस की जो उन के पास है तसदीक़ भी करती है। और उससे पहले काफि़रों पर फतेहयाब होने की दुआएँ माँगते थे बस जब उनके पास वह चीज़ जिसे पहचानते थे आ गई तो लगे इन्कार करने बस काफि़रों पर अल्लाह की लानत है
90 क्या ही बुरा है वह काम जिसके मुक़ाबले में वह लोग अपनी जानें बेच बैठे हैं कि अल्लाह अपने बन्दों से जिस पर चाहे अपनी इनायत से किताब नाजि़ल किया करे इस रश्क से जो कुछ अल्लाह ने नाजि़ल किया है सबका इन्कार कर बैठे बस उन पर ग़ज़ब पर ग़ज़ब टूट पड़ा और काफि़रों के लिए रूसवाई का अज़ाब है
91 और जब उनसे कहा गया कि अल्लाह ने नाजि़ल किया है उस पर ईमान लाओ तो कहने लगे कि हम तो उसी किताब पर ईमान लाए हैं जो हम पर नाजि़ल की गई थी और उस किताब को जो उसके बाद आई है नहीं मानते हैं हालाँकि वह हक़ है और उस किताब की जो उनके पास है तसदीक़ भी करती है मगर उस किताब कु़रान का जो उसके बाद आई है इन्कार करते हैं उनसे ये तो पूछो कि तुम अगर ईमानदार थे तो फिर क्यों अल्लाह के पैग़म्बरों का साबिक़ मे क़त्ल करते थे
92 और तुम्हारे पास मूसा तो वाज़ेए व रौशन मौजिज़े लेकर आ ही चुके थे फिर भी तुमने उनके बाद बछड़े को अल्लाह बना ही लिया और उससे तुम अपने ही ऊपर ज़ुल्म करने वाले थे
93 और जब हमने तुमसे अहद लिया और तूर को तुम्हारे सर पर लटकाया और जो हमने दी है मज़बूती से लिए रहो और सुनो तो कहने लगे सुना तो हम इसको मानते नहीं और उनकी बेईमानी की वजह से बछड़े की उलफ़त घोल के उनके दिलों में पिला दी गई उन लोगों से कह दो कि अगर तुम ईमानदार थे तो तुमको तुम्हारा ईमान क्या ही बुरा हुक्म करता था
94 इन लोगों से कह दो कि अगर अल्लाह के नज़दीक आख़ेरत का घर ख़ास तुम्हारे वास्ते है और लोगों के वास्ते नहीं है बस अगर तुम सच्चे हो तो मौत की आरजू़ करो
95 लेकिन वह उन आमाले बद की वजह से जिनको उनके हाथों ने पहले से आगे भेजा है हरगिज़ मौत की आरज़ू न करेंगे और अल्लाह ज़ालिमों से खू़ब वाकि़फ है
96 और तुम उन ही को जि़न्दगी का सबसे ज़्यादा हरीस पाओगे और मुशरिक़ों में से हर एक शख़्स चाहता है कि काश उसको हज़ार बरस की उम्र दी जाती हालाँकि अगर इतनी लम्बी उम्र भी दी जाए तो वह अल्लाह के अज़ाब से छुटकारा देने वाली नहीं, और जो कुछ वह लोग करते हैं अल्लाह उसे देख रहा है”
“97 कह दो कि जो जिबरील का दुशमन है क्योंकि उस फ़रिश्ते ने अल्लाह के हुक्म से तुम्हारे दिल पर डाला है और वह उन किताबों की भी तसदीक करता है जो उसके सामने मौजूद हैं और ईमान लाने वालों के वास्ते खु़शख़बरी है
98 जो शख़्स अल्लाह और उसके फरिश्तों और उसके रसूलों और जिबराईल व मीकाइल का दुशमन हो तो बेशक अल्लाह भी काफि़रों का दुश्मन है
99 और हमने तुम पर ऐसी निशानियाँ नाजि़ल की हैं जो वाजेए और रौशन हैं और ऐसे नाफरमानों के सिवा उनका कोई इन्कार नहीं कर सकता
100 और उनकी ये हालत है कि जब कभी कोई अहद किया तो उनमें से एक फरीक़ ने तोड़ डाला बल्कि उनमें से अक्सर तो ईमान ही नहीं रखते
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