आइये उस इस्लाम पर जो मदीने में रसूल के वक़्त था !
आज एक तरफ दुनिया मुसलामानों से और इस्लाम से नफरत को
आमादा है और दूसरी तरफ मुसलमान फिरकों में बंटे हैं और हर फिरका दूसरों से नफरत कर
रहा है I
आतंकवाद , फिदायीन हमले एक नया फितना हैं और तालिबान ,
अल क़ायदा , दायश और बोको हराम जैसे गुट आम इंसानी एहसासात को मजरूह कर रहे हैं –
यह मुसलमान है या मुसलामानों और इस्लाम के दुश्मनों के ज़रिये उठाये गए हैं और फण्ड
पाते हैं हम नहीं जानते I
अगर मुसलमान उस इस्लाम की तरफ पलट आयें जो मदीने में
नबी के वक़्त था तो ऐसी इंसानियत दुश्मन हरकतों का कोई जवाज़ नहीं रहेगा I
इबादत रोज़ा ज़कात और हज सिर्फ यही दीन के सुतून थे I जंग
होती थीं और मुसलामानों को अपने दिफ़ा और अपने हक में जंग लड़नी पड़ीं पर जिहाद दीन
का सुतून नहीं था यह बाद में डाला गया- मुल्कों पर हमला करने और जीतने के लिए I तीन
तलाक भी नहीं था , तलाक की इजाज़त थी पर मदीने में शायद ही आम तौर पर रायज था I
औरतों पर सख्त पर्दा और बंदिश नहीं थी जैसी की बाद में लगाई गयी I
तो पलट आइये उस इस्लाम की तरफ जो मदीने में रसूल के
वक़्त था I
1
सारे मुसलामानों के बीच
इत्तिहाद लाइए
2
तालीम , साइंस और टेक्नोलॉजी
में कौम को आगे बढ़ाइये
No comments:
Post a Comment