मेरे साथियों , आप की ‘संघी मानसिकता’ का उपचार !
1 ‘संघी मानसिकता’ एक रुग्ण मानसिकता है एक विक्षिप्त
मानसिकता जिसका Obsession इस्लाम और मुस्लिम है और जिसका Compulsion इंडिया के
मुसलामानों को परेशान करते रहना है और यह रोग शिक्षित हिन्दुओं में बहुत ज्यादा
फैल चुका है है और देश में हो रही सारी खराब बातों के लिए ज़िम्मेदार है –
बेगुनाहों पर हमले हो रहे हैं कोई बोल नहीं रहा है उलटे सोशल मीडिया पर अमानवीय
कमेंट करते हैं और यही नहीं अगर मुजरिम संघी है तो हिन्दू लड़की की सुरक्षा से भी
उन्हें कोई मतलब नहीं रह गया – नोटबंदी जी एस टी और बैंकों द्वारा हर बात पर चार्ज
और अनेकों बातों पर चुप हैं क्योंकि इनका ओबसेशन सिर्फ मुसलमान और इस्लाम है I रोग
के इतना बढ़ने के लिए मुसलामानों की गलतियां भी ज़िम्मेदार हैं – मुसलामानों का अपने
मौलवियों लीडरों को मान कर कट्टरवाद अलगाववाद के रास्ते चल पड़ना I वास्तव में
दोनों तरफ के पागल एक दूसरे का पागलपन बढ़ा रहे हैं I
2 आकर्षण भी : इस्लाम से और मुसलामानों से मोह भी है
और इनकी बेटियों को इसी लिए प्रेम भी मुसलामानों से होता है क्योंकि मुसलमान इतने
चालाक और शराबी और व्यभिचारी नहीं होते हैं जितने इनके युवक होते हैं इसलिए उनमें
भोलापन भी होता है और वे प्रेम करने और पाने के योग्य हैं भी I लेकिन यह मोह खुद
संघियों को भी है – उर्दू से उर्दू गजलों से नवाबी पहनावों और रहनसहन से ईद की
सिवैयों से शामी कबाबों से और पाकिस्तान से दुश्मनी अलापने के बावजूद पकिस्तान
पहुँच जाते हैं मुस्लिम देशों में जा कर खूब गले लगते हैं I
3 क्या है ?
एक परिवार में एक पुराने रीति रिवाज के परिवार से आई बहू हो और एक इंग्लिश
मीडियम वाली बहू हो तो जो टेंशन होगा वह है I
एक साथ ज़िन्दगी गुज़ारने के बाद जब दोनों 60 वर्ष की हो जाती हैं तभी स्पष्ट
होगा कौन वास्तव में अच्छी थी I इसी लिए संघियों को इस्लाम से परेशान नहीं होना
चाहिए था पर वे इस्लाम जैसा हिन्दू धर्म बनाना चाहते हैं जो बड़ी गलती है I
1 एक किबला दुनिया भर के मुसलमान काबे की तरफ मुंह
करके 5 बार रोज़ नमाज़ पढ़ते हैं और एक बार हज करते हैं
2 नमाज़ के लिए सूर्योदय से पूर्व ऊषा काल में बिस्तर
छोड़ देते हैं मस्जिद जा कर अज़ान देते हैं और एक साथ नमाज़ पढ़ते हैं और फिर ऐसा 4
बार विशेष समय पर करते हैं
3 वजू का एक विशेष ढंग है
4 नमाज़ का एक विशेष ढंग है
इन सब बातों से संघी विचलित हो जाता है – कभी चाहता
है हिन्दू भी अपना धर्म ऐसे ही मानें और कभी चाहते हैं मुसलमानों को रोक सकें !
4 क्या सब मुसलमान
हो जाएँ ? क्या यह अधिक उपयुक्त
नहीं होगा कि सभी संघी हिन्दू खुद इस्लाम स्वीकार कर लें ? पुराने परिवार की बहू
खुद इंग्लिश मीडियम बन जाए ?
यही ज्ञान की कमी है संघियों में और जैसा कहा जाता है
अज्ञानता ही जड़ है हर बुराई की I
5 मुसलमान कहाँ गलत हैं ? मुसलमान कहाँ गलत हैं यह न
मुसलमान जानते हैं और न संघी जानता है और अगर संघी जान ले और समझ ले तो देश में
अमन हो जाए और मुसलमान जान लें और समझ लें तो उनका उरूज हो जाए
यहूदी ईसाई और इस्लाम तीनों एकेश्वरवादी धर्म एक
व्यक्तिवादी धर्म हैं बस एक व्यक्ति का ईश्वर से सम्बन्ध है और कोई दूसरा इंसान
केवल उस व्यक्ति से प्रेम कर के उसका अनुपालन कर के ही ईश्वर की कृपा प् सकता है
और अगर वह ऐसा नहीं करेगा तो बस उसके लिए नर्क है I इस सही या गलत धारणा या ईमान
का फायेदा मौलवी , पादरी और रब्बानी तबके ने उठाया क्योंकि वे बताएँगे कि मुहम्मद
, ईसा या मूसा ने क्या कहा था और कैसे क्या किया था I
इसी कारण इस्लाम सीधे सीधे दो टुकड़ों में बँट गया –
वजू कैसे करैं ? नमाज़ कैसे पढें ? किस टाइम पढें ? अज़ान क्या हो ? रोज़ा कब खोलें ?
6 अध्यात्म
इंडिया में बुद्ध ने वह शिक्षा दी जिस पर चल कर कोई
भी इंसान मोक्ष प्राप्त कर सकता है बिलकुल उन नबियों जैसा बन सकता है जिसे ईश्वर
खुद प्यार करे ( बुद्ध ने स्वयं ईश्वर का नाम नहीं लिया ) इक्षा , वाणी , कर्म पर
नियंत्रण और इनमें अहिंसा
हिन्दू अध्यात्म ने ईश्वर बाहर ढूँढने नहीं अपने
अन्दर ढूँढ कर ईश्वर तक पहुँचने का रास्ता दिखाया I
मौलवी पादरी और रब्बानी इंसानों को मानसिक रूप से
परतंत्र बनाते हैं और ईश्वर से और
इंसानियत से दूर कर रहे हैं वहीँ बुद्ध की शिक्षा और अध्यात्म हमें मानवता देती है
और ईश्वर के करीब करती है
7 समन्वय :
दुनिया के सारे इंसान एक माँ बाप की औलाद हैं मान कर मेरे संघी मित्रों जातिवाद
समाप्त करो और बुद्ध की शिक्षाओं को मानो और अध्यात्म द्वारा ईश्वर तक पहुंचने का
प्रयास करो बस यही रास्ता है इंडिया के मुसलमानों और हिन्दुओं के लिए और इंडिया को
शिखर तक फिर पहुंचाने के लिए !
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