मेरे साथ 1400 वर्ष पूर्व मदीने का सफ़र कीजिये और सच्चे
इस्लाम और मोमिनों को पहचानिए – 12
(98) 76 सूरए अद दहर
“1 क्या इन्सान पर एक ऐसा वक़्त आ चुका है कि वह कोई चीज़ क़ाबिले जि़क्र न था” धरती पर मानव का जनम लाखों वर्ष पूर्व हुआ था पर निरंतर इतिहास मुश्किल से 2000 वर्षों का है या यूँ कहें निरंतर इतिहास रसूल के वक़्त से ही है उसके पहले के 2000 वर्ष बिखरा हुआ इतिहास है और उसके भी पहले इतिहास खोजने से मिला है और 10000 वर्षों से पहले केवल वैज्ञानिक खोजें हैं कोई इतिहास नहीं है I
2 हमने इन्सान को मख़लूत नुत्फे़ से पैदा किया कि उसे आज़माये तो हमने उसे सुनता देखता बनाया
3 और उसको रास्ता भी दिखा दिया ख़्वाह शुक्र गुज़ार हो ख़्वाह न शुक्रा
4 हमने काफि़रों के ज़ंजीरे, तौक और दहकती हुयी आग तैयार कर रखी है बेशक 5 नेकोकार लोग कासे पियेंगे जिसमें काफू़र की आमेजि़श होगी 6 ये एक चश्मा है जिसमें से अल्लाह के बन्दे पियेंगे और जहाँ चाहेंगे बहा ले जाएँगे
7 ये वह लोग हैं जो नज़रें पूरी करते हैं और उस दिन से जिनकी सख़्ती हर तरह फैली होगी डरते हैं
8 और उसकी मोहब्बत में मोहताज और यतीम और असीर को खाना खिलाते हैं
9 हम तो तुमको बस ख़ालिस अल्लाह के लिए खिलाते हैं हम न तुम से बदले के ख़ास्तगार हैं और न शुक्र गुज़ारी के
10 हमको तो अपने रब से उस दिन का डर है जिसमें मुँह बन जाएँगे चेहरे पर हवाइयाँ उड़ती होंगी
11 तो अल्लाह उन्हें उस दिन की तकलीफ़ से बचा लेगा और उनको ताज़गी और ख़ुशदिली अता फ़रमाएगा
12 और उनके सब्र की जज़ा में बाग़ (जन्नत) और रेशम
13 वहाँ वह तख़्तों पर तकिए लगाए होंगे न वहाँ धूप देखेंगे और न शिद्दत की सर्दी
14 और घने दरख़्तों के साए उन पर झुके हुए होंगे और मेवों के गुच्छे उनके बहुत क़रीब हर तरह उनके एख़्तेयार में
15 और उनके सामने चाँदी के साग़र और शीशे के निहायत शफ़्फ़ाफ़ गिलास का दौर चल रहा होगा
16 और शीशे भी चाँदी के जो ठीक अन्दाज़े के मुताबिक बनाए गए हैं
17 और वहाँ उन्हें ऐसी शराब पिलाई जाएगी जिसमें जनजबील की आमेजि़श होगी
18 वहाँ ये एक चश्मा है जिसका नाम सलसबील है
19 और उनके सामने हमेशा एक हालत पर रहने वाले नौजवाल लड़के चक्कर लगाते होंगे कि जब तुम उनको देखो तो समझो कि बिखरे हुए मोती हैं
20 और जब तुम वहाँ निगाह उठाओगे तो हर तरह की नेअमत और अज़ीमुशशान सल्तनत देखोगे
21 उनके ऊपर सब्ज़ क्रेब और अतलस की पोशाक होगी और उन्हें चाँदी के कंगन पहनाए जाएँगे और उनका रब उन्हें निहायत पाकीज़ा शाराब पिलाएगा
22 ये यक़ीनी तुम्हारे लिए होगा और तुम्हारी सिले में और तुम्हारी कोशिश क़ाबिले शुक्र गुज़ारी है
23 हमने तुम पर क़ुरआन को रफ़्ता रफ़्ता करके नाजि़ल किया
24 तो तुम अपने रब के हुक्म के इन्तज़ार में सब्र किए रहो और उन लोगों में से गुनाहगार और नाशुक्रे की पैरवी न करना
25 सुबह शाम अपने रब का नाम लेते रहो
26 और कुछ रात गए उसका सजदा करो और बड़ी रात तक उसकी तस्बीह करते रहो
27 ये लोग यक़ीनन दुनिया को पसन्द करते हैं और बड़े भारी दिन को अपने पसे पुश्त छोड़ बैठे हैं
28 हमने उनको पैदा किया और उनके आज़अ को मज़बूत बनाया और अगर हम चाहें तो उनके बदले उन्हीं के जैसे लोग ले आएँ
29 बेशक ये सरासर नसीहत है तो जो चाहे अपने रब की राह ले
30 और जब तक अल्लाह को मंज़ूर न हो तुम लोग कुछ भी चाह नहीं सकते बेशक अल्लाह बड़ा वाकि़फकार दाना है
31 जिसको चाहे अपनी रहमत में दाखि़ल कर ले और ज़ालिमों के वास्ते उसने दर्दनाक अज़ाब तैयार कर रखा है (99) 65 सूरए अत तलाक़
1 ऐ रसूल जब तुम अपनी बीवियों को तलाक़ दो तो उनकी इद्दत के वक़्त तलाक़ दो और इद्दा का शुमार रखो और अपने रब अल्लाह से डरो और उनके घर से उन्हें न निकालो और वह ख़ुद भी घर से न निकलें मगर जब वह कोई सरीही बेहयाई का काम कर बैठें और ये अल्लाह की हदें हैं और जो अल्लाह की हदों से तजाउज़ करेगा तो उसने अपने ऊपर आप ज़ुल्म किया तो तुम नहीं जानते शायद अल्लाह उसके बाद कोई बात पैदा करे 2 तो जब ये अपना इद्दा पूरा करने के करीब पहुँचे तो या तुम उन्हें उनवाने शाइस्ता से रोक लो या अच्छी तरह रूख़सत ही कर दो और अपने लोगों में से दो आदिलों को गवाह क़रार दे लो और गवाहों तुम अल्लाह के वास्ते ठीक ठीक गवाही देना इन बातों से उस को नसीहत की जाती है जो अल्लाह और रोजे़ आख़ेरत पर ईमान रखता हो और जो अल्लाह से डरेगा तो अल्लाह उसके लिए नजात की सूरत निकाल देगा
3 और उसको ऐसी जगह से रिज़्क़ देगा जहाँ से वहम भी न हो और जिसने अल्लाह पर भरोसा किया तो वह उसके लिए काफी है बेशक अल्लाह अपने काम को पूरा करके रहता है अल्लाह ने हर चीज़ का एक अन्दाज़ा मुक़र्रर कर रखा है
4 और जो औरतें हैज़ से मायूस हो चुकी अगर तुम को उनके इद्दे में शक होवे तो उनका इद्दा तीन महीने है और वह औरतें जिनको हैज़ हुआ ही नहीं और हामेला औरतों का इद्दा उनका बच्चा जनना है और जो अल्लाह से डरता है अल्लाह उसके काम मे सहूलित पैदा करेगा
5 ये अल्लाह का हुक़्म है जो अल्लाह ने तुम पर नाजि़ल किया है और जो ख़ुद डरता रहेगा तो वह उसके गुनाह उससे दूर कर देगा और उसे बड़ा दरजा देगा
6 मुतलक़ा औरतों को अपने मक़दूर मुताबिक दे रखो जहाँ तुम ख़ुद रहते हो और उनको तंग करने के लिए उनको तकलीफ न पहुँचाओ और अगर वह हामेला हो तो बच्चा जनने तक उनका खर्च देते रहो फिर अगर वह बच्चे को तुम्हारी ख़ातिर दूध पिलाए तो उन्हें उनकी उजरत दे दो और बाहम सलाहियत से दस्तूर के मुताबिक बात चीत करो और अगर दिकक़त हो तो बच्चे को उसके ख़ातिर से कोई और औरत दूध पिला देगी
7 गुन्जाइश वाले को अपनी गुन्जाइश के मुताबिक़ ख़र्च करना चाहिए और जिसकी रोज़ी तंग हो वह जितना अल्लाह ने उसे दिया है उसमें से खर्च करे अल्लाह ने जिसको जितना दिया है बस उसी के मुताबिक़ तकलीफ़ दिया करता है अल्लाह अनकरीब ही तंगी के बाद फ़राख़ी अता करेगा
8 और कितनी ही बस्तियों ने अपने रब और उसके रसूलों के हुक़्म से सरकशी की तो हमने उनका बड़ी सख़्ती से हिसाब लिया और उन्हें बुरे अज़ाब की सज़ा दी
9 तो उन्होने अपने काम की सज़ा का मज़ा चख लिया और उनके काम का अन्जाम घाटा ही था
10 अल्लाह ने उनके लिए सख़्त अज़ाब तैयार कर रखा है तो ऐ अक़्ल वालों जो इमान ला चुके हो अल्लाह से डरते रहो अल्लाह ने तुम्हारे पास ज़िक्र भेजा है
11 रसूल जो तुम्हारे सामने वाज़ेए आयतें पढ़ता है ताकि जो लोग ईमान लाए और अच्छे अच्छे काम करते रहे उनको तारिकि़यों से ईमान की रौशनी की तरफ़ निकाल लाए और जो अल्लाह पर ईमान लाए और अच्छे अच्छे काम करे तो अल्लाह उसको बाग़ (जन्नत) में दाखिल करेगा जिनके नीचे नहरें जारी हैं और वह उसमें अबादुल आबाद तक रहेंगे अल्लाह ने उनको अच्छी अच्छी रोज़ी दी है
अल्लाह ही तो है जिसने सात आसमान पैदा किए और उन्हीं के बराबर ज़मीन को भी उनमें अल्लाह का हुक़्म नाजि़ल होता रहता है - ताकि तुम लोग जान लो कि अल्लाह हर चीज़ पर कादिर है और बेशक अल्लाह अपने इल्म से हर चीज़ पर हावी है (100) 98 सूरए अल बय्यनह
1 अहले किताब और मुशरिकों से जो लोग काफिर थे जब तक कि उनके पास खुली हुयी दलीलें न पहुँचे वह बाज़ आने वाले न थे
2 अल्लाह के रसूल जो पाक औराक़ पढ़ते हैं
3 उनमें पुरज़ोर और दरूस्त बातें लिखी हुयी हैं
4 अहले किताब मुताफ़र्रिक़ हुए भी तो जब उनके पास खुली हुयी दलील आ चुकी दीन है क्या ?
5 और उन्हें तो बस ये हुक्म दिया गया था कि निरा ख़ुरा उसी का एतक़ाद रख के बातिल से कतरा के अल्लाह की इबादत करे और पाबन्दी से नमाज़ पढ़े और ज़कात अदा करता रहे और यही सच्चा दीन है
6 बेशक अहले किताब और मुशरेकीन से जो लोग काफि़र हैं वह जहन्नम की आग में हमेशा उसी में रहेंगे यही लोग बदतरीन ख़लाएक़ हैं
7 बेशक जो लोग ईमान लाए और अच्छे काम करते रहे यही लोग बेहतरीन ख़लाएक़ हैं
8 उनकी जज़ा उनके रब के यहाँ हमेशा रहने के लिए बाग़ (जन्नत) हैं जिनके नीचे नहरें जारी हैं और वह आबादुल आबाद हमेशा उसी में रहेंगे अल्लाह उनसे राज़ी और वह अल्लाह से ख़ुश ये ख़ास उस की है जो अपने रब से डरे
(101) 59 सूरए अल हश्र
1 जो कुछ आसमानों में है और जो चीज़ ज़मीन में है अल्लाह की तस्बीह करते हैं और वही ग़ालिब हिकमत वाला है
2 वही तो है जिसने कुफ़्फ़ार एहले किताब को पहले हश्र में उनके घरों से निकाल बाहर किया तुमको तो ये वहम भी न था कि वह निकल जाएँगे और वह लोग ये समझे हुये थे कि उनके कि़ले उनको अल्लाह से बचा लेंगे मगर जहाँ से उनको ख़्याल भी न था अल्लाह ने उनको आ लिया और उनके दिलों मे को रौब डाल दिया कि वह लोग ख़ुद अपने हाथों से और मोमिनीन के हाथों से अपने घरों को उजाड़ने लगे तो ऐ आँख वालों इबरत हासिल करो
3 और अल्लाह ने उनकी किसमत में जि़ला वतनी न लिखा होता तो उन पर दुनिया में भी अज़ाब करता और आख़ेरत में तो उन पर आग का अज़ाब है ही
4 ये इसलिए कि उन लोगों ने अल्लाह और उसके रसूल की मुख़ालेफ़त की और जिसने अल्लाह की मुख़ालेफ़त की तो अल्लाह बड़ा सख़्त अज़ाब देने वाला है
5 खजूर का दरख़्त जो तुमने काट डाला या जूँ का तूँ से उनकी जड़ों पर खड़ा रहने दिया तो अल्लाह ही के हुक़्म से और मतलब ये था कि वह नाफ़रमानों को रूसवा करे
6 जो माल अल्लाह ने अपने रसूल को उन लोगों से बे लड़े दिलवा दिया उसमें तुम्हार हक़ नहीं क्योंकि तुमने उसके लिए कुछ दौड़ धूप तो की ही नहीं, न घोड़ों से न ऊँटों से, मगर अल्लाह अपने पैग़म्बरों को जिस पर चाहता है ग़लबा अता फ़रमाता है और अल्लाह हर चीज़ पर क़ादिर है
7 तो जो माल अल्लाह ने अपने रसूल को देहात वालों से बे लड़े दिलवाया है वह ख़ास अल्लाह और उसके रसूल और क़राबतदारों और यतीमों और मोहताजों और परदेसियों का है ताकि जो लोग तुममें से दौलतमन्द हैं हिर फिर कर दौलत उन्हीं में न रहे, हाँ जो तुमको रसूल दें दें वह ले लिया करो और जिससे मना करें उससे बाज़ रहो और अल्लाह से डरते रहो बेशक अल्लाह सख़्त अज़ाब देने वाला है
8 उन मुफलिस मुहाजिरों का हिस्सा भी है जो अपने घरों से और मालों से निकाले गए अल्लाह के फ़ज़ल व ख़ुशनूदी के तलबगार हैं और अल्लाह की और उसके रसूल की मदद करते हैं यही लोग सच्चे इमानदार हैं 9 और जो लोग मोहाजेरीन से पहले घर में मुक़ीम हैं और ईमान में (मुसतकि़ल) रहे और जो लोग हिजरत करके उनके पास आए उनसे मोहब्बत करते हैं और जो कुछ उनको मिला उसके लिए अपने दिलों में कुछ ग़रज़ नहीं पाते और अगरचे अपने ऊपर तंगी ही क्यों न हो दूसरों को अपने नफ़्स पर तरजीह देते हैं और जो शख़्स अपने नफ्स की हिर्स से बचा लिया गया तो ऐसे ही लोग अपनी दिली मुरादें पाएँगे
10 और जो लोग उन के बाद आए दुआ करते हैं कि परवरदिगारा हमारी और उन लोगों की जो हमसे पहले ईमान ला चुके मग़फे़रत कर और मोमिनों की तरफ से हमारे दिलों में किसी तरह का कीना न आने दे रब बेशक तू बड़ा शफीक़ निहायत रहम वाला है
11 क्या तुमने उन मुनाफि़कों की हालत पर नज़र नहीं की जो अपने काफि़र भाइयों एहले किताब से कहा करते हैं कि अगर कहीं तुम निकाले गए तो यक़ीन जानों कि हम भी तुम्हारे साथ निकल खड़े होंगे और तुम्हारे बारे में कभी किसी की इताअत न करेंगे और अगर तुमसे लड़ाई होगी तो ज़रूर तुम्हारी मदद करेंगे, मगर अल्लाह बयान किए देता है कि ये लोग यक़ीनन झूठे हैं
12 अगर निकाले भी जाएँ तो ये उनके साथ न निकलेंगे और अगर उनसे लड़ाई हुयी तो उनकी मदद भी न करेंगे और यक़ीनन करेंगे भी तो पीठ फेर कर भाग जाएँगे
13 फिर उनको कहीं से कुमक भी न मिलेगी तुम्हारी हैबत उनके दिलों में अल्लाह से भी बढ़कर है, ये इस वजह से कि ये लोग समझ नहीं रखते
14 ये सब के सब मिलकर भी तुमसे नहीं लड़ सकते, मगर हर तरफ से महफूज़ बस्तियों में या दीवारों की आड़ में इनकी आपस में तो बड़ी धाक है कि तुम ख़्याल करोगे कि सब के सब हैं मगर उनके दिल एक दूसरे से फटे हुए हैं ये इस वजह से कि ये लोग बेअक़्ल हैं
15 उनका हाल उन लोगों का सा है जो उनसे कुछ ही पेशतर अपने कामों की सज़ा का मज़ा चख चुके हैं और उनके लिए दर्दनाक अज़ाब है
16 मिसाल शैतान की सी है कि इन्सान से कहता रहा कि काफि़र हो जाओ, फिर जब वह काफि़र हो गया तो कहने लगा मैं तुमसे बेज़ार हूँ मैं सारे जहाँ के रब से डरता हूँ
17 तो दोनों का नतीजा ये हुआ कि दोनों आग में जाएँगे और उसमें हमेशा रहेंगे और यही तमाम ज़ालिमों की सज़ा है
18 ऐ ईमान लाने वालों अल्लाह से डरो, और हर एक को ग़ौर करना चाहिए कि कल क़यामत के वास्ते उसने पहले से क्या भेजा है और अल्लाह ही से डरते रहो बेशक जो कुछ तुम करते हो अल्लाह उससे बाख़बर है
19 और उन लोगों के जैसे न हो जाओ जो अल्लाह को भुला बैठे तो अल्लाह ने उन्हें ऐसा कर दिया कि वह अपने आपको भूल गए यही लोग तो बद किरदार हैं
20 असहाबे नार और असहाबे बाग़ (जन्नत) किसी तरह बराबर नहीं हो सकते असहाबे बाग़ (जन्नत) ही तो कामयाबी हासिल करने वाले हैं
21 अगर हम इस क़ुरआन को किसी पहाड़ पर नाजि़ल करते तो तुम उसको देखते कि अल्लाह के डर से झुका और फटा जाता है ये मिसालें हम लोगों के लिए बयान करते हैं ताकि वह ग़ौर करें
22 वही अल्लाह है जिसके सिवा कोई माबूद नहीं, पोशीदा और ज़ाहिर का जानने वाला वही बड़ा मेहरबान निहायत रहम वाला है
23 वही वह अल्लाह है जिसके सिवा कोई क़ाबिले इबादत नहीं बादशाह, पाक ज़ात बरी अमन देने वाला निगेहबान, ग़ालिब ज़बरदस्त बड़ाई वाला ये लोग जिसको शरीक ठहराते हैं उससे पाक है 24 वही अल्लाह मुजिद सूरतों का बनाने वाला उसी के अच्छे अच्छे नाम हैं जो चीज़े सारे आसमान व ज़मीन में हैं सब उसी की तसबीह करती हैं, और वही ग़ालिब हिकमत वाला है (102) 24 सूरए अन नूर
1 एक सूरा है जिसे हमने नाजि़ल किया है और उस को फर्ज़ कर दिया है और इसमें हमने वाज़ेए व रौशन आयतें नाजि़ल की हैं ताकि तुम नसीहत हासिल करो
2 ज़िना करने वाली औरत और जि़ना करने वाले मर्द इन दोनों में से हर एक को सौ कोड़े मारो और अगर तुम अल्लाह और रोजे़ आखि़रत पर इमान रखते हो तो हुक्मे अल्लाह के नाफिज़ करने में तुमको उनके बारे में किसी तरह की तरस का लिहाज़ न होने पाए और उन दोनों की सज़ा के वक़्त मोमिन की एक जमाअत को मौजूद रहना चाहिए
3 जि़ना करने वाला मर्द तो जि़ना करने वाली औरत या मुशरिका से निकाह करेगा और जि़ना करने वाली औरत भी बस जि़ना करने वाले ही मर्द या मुशरिक से निकाह करेगी और सच्चे इमानदारों पर तो इस कि़स्म के ताल्लुक़ात हराम हैं
4 और जो लोग पाक दामन औरतों पर तोहमत लगाएँ फिर चार गवाह पेश न करें तो उन्हें अस्सी कोड़ें मारो और फिर कभी उनकी गवाही कु़बूल न करो और ये लोग ख़ुद बदकार हैं
5 मगर हाँ जिन लोगों ने उसके बाद तौबा कर ली और अपनी इसलाह की तो बेशक अल्लाह बड़ा बख़्शने वाला मेहरबान है
6 और जो लोग अपनी बीवियों पर का ऐब लगाएँ और अपने सिवा उनका कोई गवाह न हो तो ऐसे लोगों में से एक की गवाही चार मरतबा इस तरह होगी कि वह अल्लाह की क़सम खाकर बयान करे कि वह ज़रूर सच्चा है
7 और पाँचवी यूँ अगर वह झूट बोलता हो तो उस पर अल्लाह की लानत
8 और औरत इस तरह सज़ा टल सकती है कि वह चार मरतबा अल्लाह की क़सम खा कर बयान कर दे कि ये ज़रुर झूठा है
9 और पाँचवी मरतबा यूँ करेगी कि अगर ये सच्चा हो तो मुझ पर अल्लाह का ग़ज़ब पड़े
10 और अगर तुम पर अल्लाह का फज़ल और उसकी मेहरबानी न होती तो देखते कि तोहमत लगाने वालों का क्या हाल होता और इसमें शक ही नहीं कि अल्लाह बड़ा तौबा क़ुबूल करने वाला हकीम है
11 बेशक जिन लोगों ने झूठी तोहमत लगायी वह तुम्ही में से एक गिरोह है तुम अपने हक़ में इस तोहमत को बड़ा न समझो बल्कि ये तुम्हारे हक़ में बेहतर है इनमें से जिस ने जितना गुनाह समेटा वह उस खुद भुगतेगा और उनमें से जिस ने तोहमत का बड़ा हिस्सा लिया उसके लिए बड़ी सज़ा होगी
12 और जब तुम लोगो ने उसको सुना था तो उसी वक़्त इमान वाले मर्दों और इमान वाली औरतों ने अपने लोगों पर भलाई का गुमान क्यो न किया और ये क्यों न बोल उठे कि ये तो खुला हुआ बोहतान है
13 और जिन लोगों ने तोहमत लगायी थी अपने दावे के सुबूत में चार गवाह क्यों न पेश किए फिर जब इन लोगों ने गवाह न पेश किये तो अल्लाह के नज़दीक यही लोग झूठे हैं
14 और अगर तुम लोगों पर दुनिया और आखि़रत में अल्लाह का फज़ल और उसकी रहमत न होती तो जिस बात का तुम लोगों ने चर्चा किया था उस की वजह से तुम पर कोई बड़ा अज़ाब आ पहुँचता
15 कि तुम अपनी ज़बानों से इसको एक दूसरे से बयान करने लगे और अपने मुँह से ऐसी बात कहते थे जिसका तुम्हें इल्म व यक़ीन न था तुमने इसको एक आसान बात समझी थी हालांकि वह अल्लाह के नज़दीक बड़ी सख़्त बात थी
16 और जब तुमने ऐसी बात सुनी थी तो तुमने लोगों से क्यों न कह दिया कि हमको ऐसी बात मुँह से निकालनी मुनासिब नहीं सुबहान अल्लाह ये बड़ा भारी बोहतान है
17 अल्लाह तुम्हारी नसीहत करता है कि अगर तुम सच्चे इमानदार हो तो ख़बरदार फिर कभी ऐसा न करना
18 और अल्लाह तुम से एहकाम साफ साफ बयान करता है और अल्लाह तो बड़ा वाकि़फकार हकीम है
19 जो लोग ये चाहते हैं कि इमानदारों में बदकारी का चर्चा फैल जाए बेशक उनके लिए दुनिया और आखि़रत में दर्दनाक अज़ाब है और अल्लाह ख़ूब जानता है और तुम लोग नहीं जानते हो
20 और अगर ये बात न होती कि तुम पर अल्लाह का फ़ज़ल और उसकी रहमत से और ये कि अल्लाह बड़ा शफीक़ मेहरबान है
21 ऐ इमानदारों शैतान के क़दम ब क़दम न चलो और जो शैतान के क़दम ब क़दम चलेगा तो वह यक़ीनन उसे बदकारी और बुरी बात का हुक्म देगा औार अगर तुम पर अल्लाह का फ़ज़ल और उसकी रहमत न होती तो तुममें से कोई भी कभी पाक साफ न होता मगर अल्लाह तो जिसे चहता है पाक साफ़ कर देता है और अल्लाह बड़ा सुनने वाला वाकिफ़कार है
22 और तुममें से जो लोग ज़्यादा दौलत और मुक़द्दर वालें है क़राबतदारों और मोहताजों और अल्लाह की राह में हिजरत करने वालों को कुछ देने से क़सम न खा बैठें बल्कि उन्हें चाहिए कि माफ कर दें और दरगुज़र करें क्या तुम ये नहीं चाहते हो कि अल्लाह तुम्हारी ख़ता माफ करे और अल्लाह तो बड़ा बख़्शने वाला मेहरबान है
23 बेशक जो लोग पाक दामन बेख़बर और इमानदार औरतों पर तोहमत लगाते हैं पर दुनिया और आखि़रत में लानत है और उन पर बड़ा अज़ाब होगा
24 जिस दिन उनके खि़लाफ उनकी ज़बानें और उनके हाथ उनके पावँ उनकी कारस्तानियों की गवाही देगें
25 उस दिन अल्लाह उनको ठीक-ठीक उनका पूरा पूरा बदला देगा और जान जाएँगें कि अल्लाह बिल्कुल बरहक़ और ज़ाहिर करने वाला है
26 ख़बीस औरते ख़बीस मर्दों के लिए हैं और ख़बीस मर्द ख़बीस औरतो के लिए और पाक औरतें पाक मर्दों के लिए हैं और पाक मर्द पाक औरतों के लिए लोग जो कुछ उनकी निस्बत बका करते हैं उससे ये लोग बुरी उल जि़म्मा हैं उन ही के लिए बख़शिश है और इज़्ज़त की रोज़ी
27 ऐ इमान वालों अपने घरों के सिवा दूसरे घरों में न चले जाओ यहाँ तक कि उनसे इजाज़त ले लो और उन घरों के रहने वालों से साहब सलामत कर लो यही तुम्हारे हक़ में बेहतर है ताकि तुम याद रखो पस
28 अगर तुम उन घरों में किसी को न पाओ तो तावाक़फियत कि तुम को इजाज़त न हासिल हो जाए उन में न जाओ और अगर तुम से कहा जाए कि फिर जाओ तो तुम फिर जाओ यही तुम्हारे वास्ते ज़्यादा सफाई की बात है और तुम जो कुछ भी करते हो अल्लाह उससे खूब वाकिफ़ है
29 इसमें अलबत्ता तुम पर इल्ज़ाम नहीं कि ग़ैर आबाद मकानात में जिसमें तुम्हारा कोई असबाब हो चले जाओ और जो कुछ खुल्लम खुल्ला करते हो और जो कुछ छिपाकर करते हो अल्लाह जानता है
30 इमान वालों से कह दो कि अपनी नज़रों को नीची रखें और अपनी शर्मगाहों की हिफाज़त करें यही उनके वास्ते ज़्यादा सफाई की बात है ये लोग जो कुछ करते हैं अल्लाह उससे यक़ीनन ख़ूब वाकि़फ है
31 और इमान वाली औरतों से भी कह दो कि वह भी अपनी नज़रें नीची रखें और अपनी शर्मगाहों की हिफाज़त करें और अपने बनाव सिंगार को ज़ाहिर न होने दें मगर जो खुद ब खुद ज़ाहिर हो जाता हो और अपनी ओढ़नियों को अपने गरेबानों पर डाले रहें और अपने शौहर या अपने बाप दादाओं या आपने शौहर के बाप दादाओं या अपने बेटों या अपने शौहर के बेटों या अपने भाइयों या अपने भतीजों या अपने भांजों या अपने औरतों या अपनी या अपनी लौंडियों या नौकर चाकर जो मर्द सूरत हैं मगर औरतों से कुछ मतलब नहीं रखते या पह कमसिन लड़के जो औरतों के पर्दे की बात से आगाह नहीं हैं उनके सिवा अपना बनाव सिंगार ज़ाहिर न होने दिया करें और चलने में अपने पाँव ज़मीन पर इस तरह न रखें कि लोगों को उनके पोशीदा बनाव सिंगार की ख़बर हो जाए और ऐ इमान वालों तुम सबके सब अल्लाह की बारगाह में तौबा करो ताकि तुम फलाह पाओ
32 और अपनी बेशौहर औरतों और अपने नेक बख़्त गुलामों और लौंडियों का निकाह कर दिया करो अगर ये लोग मोहताज होंगे तो अल्लाह अपने फज़ल व से उन्हें मालदार बना देगा और अल्लाह तो बड़ी गुनजाइश वाला वाकि़फ कार है
33 और जो लोग निकाह करने का मक़दूर नहीं रखते उनको चाहिए कि पाक दामिनी एख़्तियार करें यहाँ तक कि अल्लाह उनको अपने फज़ल से मालदार बना दे और तुम्हारी लौन्डी ग़ुलामों में से जो मकातबत होने की ख़्वाहिश करें तो तुम अगर उनमें कुछ सलाहियत देखो तो उनको मकातिब कर दो और अल्लाह के माल से जो उसने तुम्हें अता किया है उनको भी दो और तुम्हारी लौन्डियाँ जो पाक दामन ही रहना चाहती हैं उनको दुनियावी जि़न्दगी के फायदे हासिल करने की ग़रज़ से हराम कारी पर मजबूर न करो और जो उनको मजबूर करेगा तो इसमें शक नहीं कि अल्लाह उसकी बेबसी के बाद बड़ा बख़्शने वाले मेहरबान है
34 और हमने तो तुम्हारे पास वाज़ेए व रौशन आयतें और जो लोग तुमसे पहले गुज़र चुके हैं उनकी हालतें और परहेज़गारों के लिए नसीहत नाजि़ल की
35 अल्लाह तो सारे आसमान और ज़मीन का नूर है उसके नूर की मिसल है जैसे एक ताक़ है जिसमे एक रौशन चिराग़ हो और चिराग़ एक शीशे की क़न्दील में हो क़न्दील गोया एक जगमगाता हुआ रौशन सितारा जै़तून के मुबारक दरख़्त से रौशन किया जाए जो न पूरब की तरफ हो और न पच्छिम की तरफ उसका तेल शफ्फाफ हो कि अगरचे आग उसे छुए भी नही ताहम ऐसा मालूम हो कि आप ही आप रौशन हो जाएगा नूर आला नूर अल्लाह अपने नूर की तरफ जिसे चाहता है हिदायत करता है और अल्लाह तो हर चीज़ से खूब वाकि़फ है
36 उन घरों में रौशन है जिनकी निस्बत अल्लाह ने हुक्म दिया कि उनकी ताज़ीम की जाए और उनमें उसका नाम लिया जाए जिनमें सुबह व शाम वह लोग उसकी तस्बीह किया करते हैं
37 ऐसे लोग जिनको अल्लाह के जि़क्र और नमाज़ पढ़ने और ज़कात अदा करने से न तो तिजारत ही ग़ाफिल कर सकती है न वह लोग उस दिन से डरते हैं जिसमें ख़ौफ के मारे दिल और आँखें उलट जाएँगी
38 ताकि अल्लाह उन्हें उनके आमाल का बेहतर से बेहतर बदला अता फरमाए और अपने फज़ल व करम से कुछ और ज़्यादा भी दे और अल्लाह तो जिसे चाहता है बेहिसाब रोज़ी देता है
39 और जिन लोगों ने कुफ्र एख़्तेयार किया उनकी कारस्तानियाँ जैसे एक चटियल मैदान का चमकता हुआ बालू का प्यासा उस को दूर से देखे तो पानी ख़्याल करता है यहाँ तक कि जब उसके पास आया तो उसको कुछ भी न पाया और अल्लाह को अपने पास मौजूद पाया तो उसने उसका हिसाब पूरा पूरा चुका दिया और अल्लाह तो बहुत जल्द हिसाब लेने वाला है
40 उस बड़े गहरे दरिया की तारिकियों की सी है- जैसे एक लहर उसके ऊपर दूसरी लहर उसके ऊपर अब्र ढाके हुए हो तारिकियाँ है कि एक से ऊपर एक चली आती हैं कि अगर कोइ अपना हाथ निकाले तो उसे देख न सके और जिसे खुद अल्लाह ही ने रौशनी न दी हो तो उसके लिए कहीं कोई रौशनी नहीं है
41 क्या तुम ने इतना भी नहीं देखा कि जितनी मख़लूक़ात सारे आसमान और ज़मीन में हैं और परिन्दें पर फैलाए उसी को तस्बीह किया करते हैं सब के सब अपनी नमाज़ और अपनी तस्बीह का तरीक़ा खूब जानते हैं और जो कुछ ये किया करते हैं अल्लाह उससे खू़ब वाकि़फ है
42 और सारे आसमान व ज़मीन की सल्तनत ख़ास अल्लाह ही की है और अल्लाह ही की तरफ लौट कर जाना है
43 क्या तुम ने उस पर भी नज़र नहीं की कि यक़ीनन अल्लाह ही अब्र को चलाता है फिर वही बाहम उसे जोड़ता है-फिर वही उसे तह ब तह रखता है तब तो तू बारिश उसके दरम्यिान से निकलते हुए देखता है और आसमान में जो पहाड़ है उनमें से वही उसे बरसाता है- फिर उन्हें जिस पर चाहता है पहुँचा देता है- और जिस से चाहता है टाल देता है- क़रीब है कि उसकी बिजली की कौन्द आखों की रौशनी उचके लिये जाती है
44 अल्लाह ही रात और दिन को फेर बदल करता रहता है- बेशक इसमें आँख वालों के लिए बड़ी इबरत है
45 और अल्लाह ही ने तमाम ज़मीन पर चलने वाले को पानी से पैदा किया उनमें से बाज़ तो ऐसे हैं जो अपने पेट के बल चलते हैं और बाज़ उनमें से ऐसे हैं जो दो पाँव पर चलते हैं और बाज़ उनमें से ऐसे हैं जो चार पावों पर चलते हैं- अल्लाह जो चाहता है पैदा करता है इसमें शक नहीं कि अल्लाह हर चीज़ पर क़ादिर है
46 हम ही ने यक़ीनन वाजे़ए व रौशन आयतें नाजि़ल की और अल्लाह ही जिसको चाहता है सीधी राह की हिदायत करता है
47 और कहते हैं कि अल्लाह पर और रसूल पर इमान लाए और हमने इताअत क़ुबूल की- फिर उसके बाद उन में से कुछ लोग मुँह फेर लेते हैं और ये लोग इमानदार थे ही नहीं
48 और जब वह लोग अल्लाह और उसके रसूल की तरफ बुलाए जाते हैं ताकि रसूल उनके आपस के झगड़े का फैसला कर दें तो उनमें का एक फरीक रूगरदानी करता है
49 और अगर हक़ उनकी तरफ होता तो गर्दन झुकाए रसूल के पास दौड़े हुए आते
50 क्या उन के दिल में मर्ज़ है या शक में पड़े हैं या इस बात से डरते हैं कि अल्लाह और उसका रसूल उन पर ज़ुल्म कर बैठेगा- बल्कि यही लोग ज़ालिम हैं
51 इमान वालों का क़ौल तो बस ये है कि जब उनको अल्लाह और उसके रसूल के पास बुलाया जाता है ताकि उनके बाहमी झगड़ों का फैसला करो तो कहते हैं कि हमने सुना और मान लिया और यही लोग कामयाब होने वाले हैं
52 और जो अल्लाह और उसके रसूल का हुक्म माने और अल्लाह से डरे और उस से बचता रहेगा तो ऐसे ही लोग अपनी मुराद को पहुँचेगें
53 और उन ने तुम्हारी इताअत की अल्लाह की सख़्त से सख़्त क़समें खाई कि अगर तुम उन्हें हुक्म दो तो बिला उज़्र निकल खडे़ हों- तुम कह दो कि क़समें न खाओ दस्तूर के मुवाफिक़ इताअत और बेशक तुम जो कुछ करते हो अल्लाह उससे ख़बरदार है
54 तुम कह दो कि अल्लाह की इताअत करो और रसूल की इताअत करो इस पर भी अगर तुम सरताबी करोगे तो बस रसूल पर इतना ही वाजिब है जिसके वह जि़म्मेदार किए गए हैं और जिसके जि़म्मेदार तुम बनाए गए हो तुम पर वाजिब है और अगर तुम उसकी इताअत करोगे तो हिदायत पाओगे और रसूल पर तो सिर्फ साफ तौर पर पहुँचाना फर्ज़ है
55 तुम में से जिन लोगों ने इमान क़ुबूल किया और अच्छे अच्छे काम किए उन से अल्लाह ने वायदा किया कि उन को दिन रुए ज़मीन पर ज़रुर नाएब मुक़र्रर करेगा जिस तरह उन लोगों को नाएब बनाया जो उनसे पहले गुज़र चुके हैं और जिस दीन को उसने उनके लिए पसन्द फरमाया है उस पर उन्हें ज़रुर ज़रुर पूरी क़ुदरत देगा और उनके ख़ाएफ़ होने के बाद अमन से ज़रुर बदल देगा कि वह मेरी ही इबादत करेंगे और किसी को हमारा शरीक न बनाएँगे और जो इसके बाद भी नाशुक्री करे तो ऐसे ही लोग बदकार हैं
56 और नमाज़ पाबन्दी से पढ़ा करो और ज़कात दिया करो और रसूल की इताअत करो ताकि तुम पर रहम किया जाए
57 और तुम ये ख़्याल न करो कि कुफ्फार ज़मीन मे आजिज़ कर देगें और उनका ठिकाना तो आग है और क्या बुरा ठिकाना है
58 ऐ इमान वालों तुम्हारी लौन्डी ग़ुलाम और वह लड़के जो अभी तक बुलूग़ की हद तक नहीं पहुँचे हैं उनको भी चाहिए कि तीन मरतबा तुमसे इजाज़त ले लिया करें तब आएँ नमाज़ सुबह से पहले और जब तुम दोपहर को कपड़े उतार दिया करते हो नमाजे़ इशा के बाद तीन तुम्हारे परदे के हैं इन अवक़ात के अलावा न तुम पर कोई इल्ज़ाम है-न उन पर उन अवक़ात के अलावा लोग एक दूसरे के पास चक्कर लगाया करते हैं- यँ अल्लाह एहकाम तुम से साफ साफ बयान करता है और अल्लाह तो बड़ा वाकिफ़कार हकीम है
59 और जब तुम्हारे लड़के हदे बुलूग को पहुँचें तो जिस तरह उन के कब्ल वाले इजाज़त ले लिया करते थे उसी तरह ये लोग भी इजाज़त ले लिया करें-यूँ अल्लाह अपने एहकाम साफ साफ बयान करता है और अल्लाह तो बड़ा वाकिफकार हकीम है
60 और बूढ़ी बूढ़ी औरतें जो निकाह की ख़्वाहिश नही रखती वह अगर अपने कपड़े उतार डालें तो उसमें उन पर कुछ गुनाह नही है- बशर्ते कि उनको अपना बनाव सिंगार दिखाना मंज़ूर न हो और बचें तो उनके लिए और बेहतर है और अल्लाह तो सुनता और जानता है
61 इस बात में न तो अँधे आदमी के लिए मज़ाएक़ा है और न लँगड़ें आदमी पर कुछ इल्ज़ाम है- और न बीमार पर कोई गुनाह है और न ख़ुद तुम लोगो पर कि अपने घरों से खाना खाओ या अपने बाप दादा नाना बग़ैरह के घरों से या अपनी माँ दादी नानी वगै़रह के घरों से या अपने भाइयों के घरों से या अपनी बहनों के घरों से या अपने चचाओं के घरों से या अपनी फूफि़यों के घरों से या अपने मामूओं के घरों से या अपनी खा़लाओं के घरों से या उस घर से जिसकी कुन्जियाँ तुम्हारे हाथ में है या अपने दोस्तों से इस में भी तुम पर कोई इल्ज़ाम नहीं कि सब के सब मिलकर खाओ या अलग अलग फिर जब तुम घर वालों में जाने लगो तो ख़ुद अपने ही ऊपर सलाम कर लिया करो जो अल्लाह की तरफ से एक मुबारक पाक व पाकीज़ा तोहफा है- अल्लाह यूँ एहकाम तुमसे साफ साफ बयान करता है ताकि तुम समझो
62 सच्चे इमान वाले तो सिर्फ वह लोग हैं जो अल्लाह और उसके रसूल पर इमान लाए और जब किसी ऐसे काम के लिए जिसमें लोगों के जमा होने की ज़रुरत है- रसूल के पास होते हैं जब तक उससे इजाज़त न ले ली न गए जो लोग तुम से इजाज़त ले लेते हैं वे ही लोग अल्लाह और उसके रसूल पर इमान लाए हैं तो जब ये लोग अपने किसी काम के लिए तुम से इजाज़त माँगें तो तुम उनमें से जिसको चाहो इजाज़त दे दिया करो और अल्लाह उसे उसकी बखशिश की दुआ भी करो बेशक अल्लाह बड़ा बख्शने वाला मेहरबान है
63 जिस तरह तुम में से एक दूसरे को बुलाया करते हैं उस तरह आपस में रसूल का बुलाना न समझो अल्लाह उन लोगों को खू़ब जानता है जो तुम में से आँख बचा के खिसक जाते हैं- तो जो लोग उसके हुक्म की मुख़ालफत करते हैं उनको इस बात से डरते रहना चाहिए कि उन पर कोई मुसीबत आ पडे़ या उन पर कोई दर्दनाक अज़ाब नाजि़ल हो
64 ख़बरदार जो कुछ सारे आसमान व ज़मीन में है यक़ीनन अल्लाह ही का है जिस हालत पर तुम हो अल्लाह ख़ूब जानता है और जिस दिन उसके पास ये लोग लौटा कर लाएँ जाएँगें तो जो कुछ उन लोगों ने किया कराया है बता देगा और अल्लाह तो हर चीज़ से खू़ब वाकिफ है
“1 क्या इन्सान पर एक ऐसा वक़्त आ चुका है कि वह कोई चीज़ क़ाबिले जि़क्र न था” धरती पर मानव का जनम लाखों वर्ष पूर्व हुआ था पर निरंतर इतिहास मुश्किल से 2000 वर्षों का है या यूँ कहें निरंतर इतिहास रसूल के वक़्त से ही है उसके पहले के 2000 वर्ष बिखरा हुआ इतिहास है और उसके भी पहले इतिहास खोजने से मिला है और 10000 वर्षों से पहले केवल वैज्ञानिक खोजें हैं कोई इतिहास नहीं है I
2 हमने इन्सान को मख़लूत नुत्फे़ से पैदा किया कि उसे आज़माये तो हमने उसे सुनता देखता बनाया
3 और उसको रास्ता भी दिखा दिया ख़्वाह शुक्र गुज़ार हो ख़्वाह न शुक्रा
4 हमने काफि़रों के ज़ंजीरे, तौक और दहकती हुयी आग तैयार कर रखी है बेशक 5 नेकोकार लोग कासे पियेंगे जिसमें काफू़र की आमेजि़श होगी 6 ये एक चश्मा है जिसमें से अल्लाह के बन्दे पियेंगे और जहाँ चाहेंगे बहा ले जाएँगे
7 ये वह लोग हैं जो नज़रें पूरी करते हैं और उस दिन से जिनकी सख़्ती हर तरह फैली होगी डरते हैं
8 और उसकी मोहब्बत में मोहताज और यतीम और असीर को खाना खिलाते हैं
9 हम तो तुमको बस ख़ालिस अल्लाह के लिए खिलाते हैं हम न तुम से बदले के ख़ास्तगार हैं और न शुक्र गुज़ारी के
10 हमको तो अपने रब से उस दिन का डर है जिसमें मुँह बन जाएँगे चेहरे पर हवाइयाँ उड़ती होंगी
11 तो अल्लाह उन्हें उस दिन की तकलीफ़ से बचा लेगा और उनको ताज़गी और ख़ुशदिली अता फ़रमाएगा
12 और उनके सब्र की जज़ा में बाग़ (जन्नत) और रेशम
13 वहाँ वह तख़्तों पर तकिए लगाए होंगे न वहाँ धूप देखेंगे और न शिद्दत की सर्दी
14 और घने दरख़्तों के साए उन पर झुके हुए होंगे और मेवों के गुच्छे उनके बहुत क़रीब हर तरह उनके एख़्तेयार में
15 और उनके सामने चाँदी के साग़र और शीशे के निहायत शफ़्फ़ाफ़ गिलास का दौर चल रहा होगा
16 और शीशे भी चाँदी के जो ठीक अन्दाज़े के मुताबिक बनाए गए हैं
17 और वहाँ उन्हें ऐसी शराब पिलाई जाएगी जिसमें जनजबील की आमेजि़श होगी
18 वहाँ ये एक चश्मा है जिसका नाम सलसबील है
19 और उनके सामने हमेशा एक हालत पर रहने वाले नौजवाल लड़के चक्कर लगाते होंगे कि जब तुम उनको देखो तो समझो कि बिखरे हुए मोती हैं
20 और जब तुम वहाँ निगाह उठाओगे तो हर तरह की नेअमत और अज़ीमुशशान सल्तनत देखोगे
21 उनके ऊपर सब्ज़ क्रेब और अतलस की पोशाक होगी और उन्हें चाँदी के कंगन पहनाए जाएँगे और उनका रब उन्हें निहायत पाकीज़ा शाराब पिलाएगा
22 ये यक़ीनी तुम्हारे लिए होगा और तुम्हारी सिले में और तुम्हारी कोशिश क़ाबिले शुक्र गुज़ारी है
23 हमने तुम पर क़ुरआन को रफ़्ता रफ़्ता करके नाजि़ल किया
24 तो तुम अपने रब के हुक्म के इन्तज़ार में सब्र किए रहो और उन लोगों में से गुनाहगार और नाशुक्रे की पैरवी न करना
25 सुबह शाम अपने रब का नाम लेते रहो
26 और कुछ रात गए उसका सजदा करो और बड़ी रात तक उसकी तस्बीह करते रहो
27 ये लोग यक़ीनन दुनिया को पसन्द करते हैं और बड़े भारी दिन को अपने पसे पुश्त छोड़ बैठे हैं
28 हमने उनको पैदा किया और उनके आज़अ को मज़बूत बनाया और अगर हम चाहें तो उनके बदले उन्हीं के जैसे लोग ले आएँ
29 बेशक ये सरासर नसीहत है तो जो चाहे अपने रब की राह ले
30 और जब तक अल्लाह को मंज़ूर न हो तुम लोग कुछ भी चाह नहीं सकते बेशक अल्लाह बड़ा वाकि़फकार दाना है
31 जिसको चाहे अपनी रहमत में दाखि़ल कर ले और ज़ालिमों के वास्ते उसने दर्दनाक अज़ाब तैयार कर रखा है (99) 65 सूरए अत तलाक़
1 ऐ रसूल जब तुम अपनी बीवियों को तलाक़ दो तो उनकी इद्दत के वक़्त तलाक़ दो और इद्दा का शुमार रखो और अपने रब अल्लाह से डरो और उनके घर से उन्हें न निकालो और वह ख़ुद भी घर से न निकलें मगर जब वह कोई सरीही बेहयाई का काम कर बैठें और ये अल्लाह की हदें हैं और जो अल्लाह की हदों से तजाउज़ करेगा तो उसने अपने ऊपर आप ज़ुल्म किया तो तुम नहीं जानते शायद अल्लाह उसके बाद कोई बात पैदा करे 2 तो जब ये अपना इद्दा पूरा करने के करीब पहुँचे तो या तुम उन्हें उनवाने शाइस्ता से रोक लो या अच्छी तरह रूख़सत ही कर दो और अपने लोगों में से दो आदिलों को गवाह क़रार दे लो और गवाहों तुम अल्लाह के वास्ते ठीक ठीक गवाही देना इन बातों से उस को नसीहत की जाती है जो अल्लाह और रोजे़ आख़ेरत पर ईमान रखता हो और जो अल्लाह से डरेगा तो अल्लाह उसके लिए नजात की सूरत निकाल देगा
3 और उसको ऐसी जगह से रिज़्क़ देगा जहाँ से वहम भी न हो और जिसने अल्लाह पर भरोसा किया तो वह उसके लिए काफी है बेशक अल्लाह अपने काम को पूरा करके रहता है अल्लाह ने हर चीज़ का एक अन्दाज़ा मुक़र्रर कर रखा है
4 और जो औरतें हैज़ से मायूस हो चुकी अगर तुम को उनके इद्दे में शक होवे तो उनका इद्दा तीन महीने है और वह औरतें जिनको हैज़ हुआ ही नहीं और हामेला औरतों का इद्दा उनका बच्चा जनना है और जो अल्लाह से डरता है अल्लाह उसके काम मे सहूलित पैदा करेगा
5 ये अल्लाह का हुक़्म है जो अल्लाह ने तुम पर नाजि़ल किया है और जो ख़ुद डरता रहेगा तो वह उसके गुनाह उससे दूर कर देगा और उसे बड़ा दरजा देगा
6 मुतलक़ा औरतों को अपने मक़दूर मुताबिक दे रखो जहाँ तुम ख़ुद रहते हो और उनको तंग करने के लिए उनको तकलीफ न पहुँचाओ और अगर वह हामेला हो तो बच्चा जनने तक उनका खर्च देते रहो फिर अगर वह बच्चे को तुम्हारी ख़ातिर दूध पिलाए तो उन्हें उनकी उजरत दे दो और बाहम सलाहियत से दस्तूर के मुताबिक बात चीत करो और अगर दिकक़त हो तो बच्चे को उसके ख़ातिर से कोई और औरत दूध पिला देगी
7 गुन्जाइश वाले को अपनी गुन्जाइश के मुताबिक़ ख़र्च करना चाहिए और जिसकी रोज़ी तंग हो वह जितना अल्लाह ने उसे दिया है उसमें से खर्च करे अल्लाह ने जिसको जितना दिया है बस उसी के मुताबिक़ तकलीफ़ दिया करता है अल्लाह अनकरीब ही तंगी के बाद फ़राख़ी अता करेगा
8 और कितनी ही बस्तियों ने अपने रब और उसके रसूलों के हुक़्म से सरकशी की तो हमने उनका बड़ी सख़्ती से हिसाब लिया और उन्हें बुरे अज़ाब की सज़ा दी
9 तो उन्होने अपने काम की सज़ा का मज़ा चख लिया और उनके काम का अन्जाम घाटा ही था
10 अल्लाह ने उनके लिए सख़्त अज़ाब तैयार कर रखा है तो ऐ अक़्ल वालों जो इमान ला चुके हो अल्लाह से डरते रहो अल्लाह ने तुम्हारे पास ज़िक्र भेजा है
11 रसूल जो तुम्हारे सामने वाज़ेए आयतें पढ़ता है ताकि जो लोग ईमान लाए और अच्छे अच्छे काम करते रहे उनको तारिकि़यों से ईमान की रौशनी की तरफ़ निकाल लाए और जो अल्लाह पर ईमान लाए और अच्छे अच्छे काम करे तो अल्लाह उसको बाग़ (जन्नत) में दाखिल करेगा जिनके नीचे नहरें जारी हैं और वह उसमें अबादुल आबाद तक रहेंगे अल्लाह ने उनको अच्छी अच्छी रोज़ी दी है
अल्लाह ही तो है जिसने सात आसमान पैदा किए और उन्हीं के बराबर ज़मीन को भी उनमें अल्लाह का हुक़्म नाजि़ल होता रहता है - ताकि तुम लोग जान लो कि अल्लाह हर चीज़ पर कादिर है और बेशक अल्लाह अपने इल्म से हर चीज़ पर हावी है (100) 98 सूरए अल बय्यनह
1 अहले किताब और मुशरिकों से जो लोग काफिर थे जब तक कि उनके पास खुली हुयी दलीलें न पहुँचे वह बाज़ आने वाले न थे
2 अल्लाह के रसूल जो पाक औराक़ पढ़ते हैं
3 उनमें पुरज़ोर और दरूस्त बातें लिखी हुयी हैं
4 अहले किताब मुताफ़र्रिक़ हुए भी तो जब उनके पास खुली हुयी दलील आ चुकी दीन है क्या ?
5 और उन्हें तो बस ये हुक्म दिया गया था कि निरा ख़ुरा उसी का एतक़ाद रख के बातिल से कतरा के अल्लाह की इबादत करे और पाबन्दी से नमाज़ पढ़े और ज़कात अदा करता रहे और यही सच्चा दीन है
6 बेशक अहले किताब और मुशरेकीन से जो लोग काफि़र हैं वह जहन्नम की आग में हमेशा उसी में रहेंगे यही लोग बदतरीन ख़लाएक़ हैं
7 बेशक जो लोग ईमान लाए और अच्छे काम करते रहे यही लोग बेहतरीन ख़लाएक़ हैं
8 उनकी जज़ा उनके रब के यहाँ हमेशा रहने के लिए बाग़ (जन्नत) हैं जिनके नीचे नहरें जारी हैं और वह आबादुल आबाद हमेशा उसी में रहेंगे अल्लाह उनसे राज़ी और वह अल्लाह से ख़ुश ये ख़ास उस की है जो अपने रब से डरे
(101) 59 सूरए अल हश्र
1 जो कुछ आसमानों में है और जो चीज़ ज़मीन में है अल्लाह की तस्बीह करते हैं और वही ग़ालिब हिकमत वाला है
2 वही तो है जिसने कुफ़्फ़ार एहले किताब को पहले हश्र में उनके घरों से निकाल बाहर किया तुमको तो ये वहम भी न था कि वह निकल जाएँगे और वह लोग ये समझे हुये थे कि उनके कि़ले उनको अल्लाह से बचा लेंगे मगर जहाँ से उनको ख़्याल भी न था अल्लाह ने उनको आ लिया और उनके दिलों मे को रौब डाल दिया कि वह लोग ख़ुद अपने हाथों से और मोमिनीन के हाथों से अपने घरों को उजाड़ने लगे तो ऐ आँख वालों इबरत हासिल करो
3 और अल्लाह ने उनकी किसमत में जि़ला वतनी न लिखा होता तो उन पर दुनिया में भी अज़ाब करता और आख़ेरत में तो उन पर आग का अज़ाब है ही
4 ये इसलिए कि उन लोगों ने अल्लाह और उसके रसूल की मुख़ालेफ़त की और जिसने अल्लाह की मुख़ालेफ़त की तो अल्लाह बड़ा सख़्त अज़ाब देने वाला है
5 खजूर का दरख़्त जो तुमने काट डाला या जूँ का तूँ से उनकी जड़ों पर खड़ा रहने दिया तो अल्लाह ही के हुक़्म से और मतलब ये था कि वह नाफ़रमानों को रूसवा करे
6 जो माल अल्लाह ने अपने रसूल को उन लोगों से बे लड़े दिलवा दिया उसमें तुम्हार हक़ नहीं क्योंकि तुमने उसके लिए कुछ दौड़ धूप तो की ही नहीं, न घोड़ों से न ऊँटों से, मगर अल्लाह अपने पैग़म्बरों को जिस पर चाहता है ग़लबा अता फ़रमाता है और अल्लाह हर चीज़ पर क़ादिर है
7 तो जो माल अल्लाह ने अपने रसूल को देहात वालों से बे लड़े दिलवाया है वह ख़ास अल्लाह और उसके रसूल और क़राबतदारों और यतीमों और मोहताजों और परदेसियों का है ताकि जो लोग तुममें से दौलतमन्द हैं हिर फिर कर दौलत उन्हीं में न रहे, हाँ जो तुमको रसूल दें दें वह ले लिया करो और जिससे मना करें उससे बाज़ रहो और अल्लाह से डरते रहो बेशक अल्लाह सख़्त अज़ाब देने वाला है
8 उन मुफलिस मुहाजिरों का हिस्सा भी है जो अपने घरों से और मालों से निकाले गए अल्लाह के फ़ज़ल व ख़ुशनूदी के तलबगार हैं और अल्लाह की और उसके रसूल की मदद करते हैं यही लोग सच्चे इमानदार हैं 9 और जो लोग मोहाजेरीन से पहले घर में मुक़ीम हैं और ईमान में (मुसतकि़ल) रहे और जो लोग हिजरत करके उनके पास आए उनसे मोहब्बत करते हैं और जो कुछ उनको मिला उसके लिए अपने दिलों में कुछ ग़रज़ नहीं पाते और अगरचे अपने ऊपर तंगी ही क्यों न हो दूसरों को अपने नफ़्स पर तरजीह देते हैं और जो शख़्स अपने नफ्स की हिर्स से बचा लिया गया तो ऐसे ही लोग अपनी दिली मुरादें पाएँगे
10 और जो लोग उन के बाद आए दुआ करते हैं कि परवरदिगारा हमारी और उन लोगों की जो हमसे पहले ईमान ला चुके मग़फे़रत कर और मोमिनों की तरफ से हमारे दिलों में किसी तरह का कीना न आने दे रब बेशक तू बड़ा शफीक़ निहायत रहम वाला है
11 क्या तुमने उन मुनाफि़कों की हालत पर नज़र नहीं की जो अपने काफि़र भाइयों एहले किताब से कहा करते हैं कि अगर कहीं तुम निकाले गए तो यक़ीन जानों कि हम भी तुम्हारे साथ निकल खड़े होंगे और तुम्हारे बारे में कभी किसी की इताअत न करेंगे और अगर तुमसे लड़ाई होगी तो ज़रूर तुम्हारी मदद करेंगे, मगर अल्लाह बयान किए देता है कि ये लोग यक़ीनन झूठे हैं
12 अगर निकाले भी जाएँ तो ये उनके साथ न निकलेंगे और अगर उनसे लड़ाई हुयी तो उनकी मदद भी न करेंगे और यक़ीनन करेंगे भी तो पीठ फेर कर भाग जाएँगे
13 फिर उनको कहीं से कुमक भी न मिलेगी तुम्हारी हैबत उनके दिलों में अल्लाह से भी बढ़कर है, ये इस वजह से कि ये लोग समझ नहीं रखते
14 ये सब के सब मिलकर भी तुमसे नहीं लड़ सकते, मगर हर तरफ से महफूज़ बस्तियों में या दीवारों की आड़ में इनकी आपस में तो बड़ी धाक है कि तुम ख़्याल करोगे कि सब के सब हैं मगर उनके दिल एक दूसरे से फटे हुए हैं ये इस वजह से कि ये लोग बेअक़्ल हैं
15 उनका हाल उन लोगों का सा है जो उनसे कुछ ही पेशतर अपने कामों की सज़ा का मज़ा चख चुके हैं और उनके लिए दर्दनाक अज़ाब है
16 मिसाल शैतान की सी है कि इन्सान से कहता रहा कि काफि़र हो जाओ, फिर जब वह काफि़र हो गया तो कहने लगा मैं तुमसे बेज़ार हूँ मैं सारे जहाँ के रब से डरता हूँ
17 तो दोनों का नतीजा ये हुआ कि दोनों आग में जाएँगे और उसमें हमेशा रहेंगे और यही तमाम ज़ालिमों की सज़ा है
18 ऐ ईमान लाने वालों अल्लाह से डरो, और हर एक को ग़ौर करना चाहिए कि कल क़यामत के वास्ते उसने पहले से क्या भेजा है और अल्लाह ही से डरते रहो बेशक जो कुछ तुम करते हो अल्लाह उससे बाख़बर है
19 और उन लोगों के जैसे न हो जाओ जो अल्लाह को भुला बैठे तो अल्लाह ने उन्हें ऐसा कर दिया कि वह अपने आपको भूल गए यही लोग तो बद किरदार हैं
20 असहाबे नार और असहाबे बाग़ (जन्नत) किसी तरह बराबर नहीं हो सकते असहाबे बाग़ (जन्नत) ही तो कामयाबी हासिल करने वाले हैं
21 अगर हम इस क़ुरआन को किसी पहाड़ पर नाजि़ल करते तो तुम उसको देखते कि अल्लाह के डर से झुका और फटा जाता है ये मिसालें हम लोगों के लिए बयान करते हैं ताकि वह ग़ौर करें
22 वही अल्लाह है जिसके सिवा कोई माबूद नहीं, पोशीदा और ज़ाहिर का जानने वाला वही बड़ा मेहरबान निहायत रहम वाला है
23 वही वह अल्लाह है जिसके सिवा कोई क़ाबिले इबादत नहीं बादशाह, पाक ज़ात बरी अमन देने वाला निगेहबान, ग़ालिब ज़बरदस्त बड़ाई वाला ये लोग जिसको शरीक ठहराते हैं उससे पाक है 24 वही अल्लाह मुजिद सूरतों का बनाने वाला उसी के अच्छे अच्छे नाम हैं जो चीज़े सारे आसमान व ज़मीन में हैं सब उसी की तसबीह करती हैं, और वही ग़ालिब हिकमत वाला है (102) 24 सूरए अन नूर
1 एक सूरा है जिसे हमने नाजि़ल किया है और उस को फर्ज़ कर दिया है और इसमें हमने वाज़ेए व रौशन आयतें नाजि़ल की हैं ताकि तुम नसीहत हासिल करो
2 ज़िना करने वाली औरत और जि़ना करने वाले मर्द इन दोनों में से हर एक को सौ कोड़े मारो और अगर तुम अल्लाह और रोजे़ आखि़रत पर इमान रखते हो तो हुक्मे अल्लाह के नाफिज़ करने में तुमको उनके बारे में किसी तरह की तरस का लिहाज़ न होने पाए और उन दोनों की सज़ा के वक़्त मोमिन की एक जमाअत को मौजूद रहना चाहिए
3 जि़ना करने वाला मर्द तो जि़ना करने वाली औरत या मुशरिका से निकाह करेगा और जि़ना करने वाली औरत भी बस जि़ना करने वाले ही मर्द या मुशरिक से निकाह करेगी और सच्चे इमानदारों पर तो इस कि़स्म के ताल्लुक़ात हराम हैं
4 और जो लोग पाक दामन औरतों पर तोहमत लगाएँ फिर चार गवाह पेश न करें तो उन्हें अस्सी कोड़ें मारो और फिर कभी उनकी गवाही कु़बूल न करो और ये लोग ख़ुद बदकार हैं
5 मगर हाँ जिन लोगों ने उसके बाद तौबा कर ली और अपनी इसलाह की तो बेशक अल्लाह बड़ा बख़्शने वाला मेहरबान है
6 और जो लोग अपनी बीवियों पर का ऐब लगाएँ और अपने सिवा उनका कोई गवाह न हो तो ऐसे लोगों में से एक की गवाही चार मरतबा इस तरह होगी कि वह अल्लाह की क़सम खाकर बयान करे कि वह ज़रूर सच्चा है
7 और पाँचवी यूँ अगर वह झूट बोलता हो तो उस पर अल्लाह की लानत
8 और औरत इस तरह सज़ा टल सकती है कि वह चार मरतबा अल्लाह की क़सम खा कर बयान कर दे कि ये ज़रुर झूठा है
9 और पाँचवी मरतबा यूँ करेगी कि अगर ये सच्चा हो तो मुझ पर अल्लाह का ग़ज़ब पड़े
10 और अगर तुम पर अल्लाह का फज़ल और उसकी मेहरबानी न होती तो देखते कि तोहमत लगाने वालों का क्या हाल होता और इसमें शक ही नहीं कि अल्लाह बड़ा तौबा क़ुबूल करने वाला हकीम है
11 बेशक जिन लोगों ने झूठी तोहमत लगायी वह तुम्ही में से एक गिरोह है तुम अपने हक़ में इस तोहमत को बड़ा न समझो बल्कि ये तुम्हारे हक़ में बेहतर है इनमें से जिस ने जितना गुनाह समेटा वह उस खुद भुगतेगा और उनमें से जिस ने तोहमत का बड़ा हिस्सा लिया उसके लिए बड़ी सज़ा होगी
12 और जब तुम लोगो ने उसको सुना था तो उसी वक़्त इमान वाले मर्दों और इमान वाली औरतों ने अपने लोगों पर भलाई का गुमान क्यो न किया और ये क्यों न बोल उठे कि ये तो खुला हुआ बोहतान है
13 और जिन लोगों ने तोहमत लगायी थी अपने दावे के सुबूत में चार गवाह क्यों न पेश किए फिर जब इन लोगों ने गवाह न पेश किये तो अल्लाह के नज़दीक यही लोग झूठे हैं
14 और अगर तुम लोगों पर दुनिया और आखि़रत में अल्लाह का फज़ल और उसकी रहमत न होती तो जिस बात का तुम लोगों ने चर्चा किया था उस की वजह से तुम पर कोई बड़ा अज़ाब आ पहुँचता
15 कि तुम अपनी ज़बानों से इसको एक दूसरे से बयान करने लगे और अपने मुँह से ऐसी बात कहते थे जिसका तुम्हें इल्म व यक़ीन न था तुमने इसको एक आसान बात समझी थी हालांकि वह अल्लाह के नज़दीक बड़ी सख़्त बात थी
16 और जब तुमने ऐसी बात सुनी थी तो तुमने लोगों से क्यों न कह दिया कि हमको ऐसी बात मुँह से निकालनी मुनासिब नहीं सुबहान अल्लाह ये बड़ा भारी बोहतान है
17 अल्लाह तुम्हारी नसीहत करता है कि अगर तुम सच्चे इमानदार हो तो ख़बरदार फिर कभी ऐसा न करना
18 और अल्लाह तुम से एहकाम साफ साफ बयान करता है और अल्लाह तो बड़ा वाकि़फकार हकीम है
19 जो लोग ये चाहते हैं कि इमानदारों में बदकारी का चर्चा फैल जाए बेशक उनके लिए दुनिया और आखि़रत में दर्दनाक अज़ाब है और अल्लाह ख़ूब जानता है और तुम लोग नहीं जानते हो
20 और अगर ये बात न होती कि तुम पर अल्लाह का फ़ज़ल और उसकी रहमत से और ये कि अल्लाह बड़ा शफीक़ मेहरबान है
21 ऐ इमानदारों शैतान के क़दम ब क़दम न चलो और जो शैतान के क़दम ब क़दम चलेगा तो वह यक़ीनन उसे बदकारी और बुरी बात का हुक्म देगा औार अगर तुम पर अल्लाह का फ़ज़ल और उसकी रहमत न होती तो तुममें से कोई भी कभी पाक साफ न होता मगर अल्लाह तो जिसे चहता है पाक साफ़ कर देता है और अल्लाह बड़ा सुनने वाला वाकिफ़कार है
22 और तुममें से जो लोग ज़्यादा दौलत और मुक़द्दर वालें है क़राबतदारों और मोहताजों और अल्लाह की राह में हिजरत करने वालों को कुछ देने से क़सम न खा बैठें बल्कि उन्हें चाहिए कि माफ कर दें और दरगुज़र करें क्या तुम ये नहीं चाहते हो कि अल्लाह तुम्हारी ख़ता माफ करे और अल्लाह तो बड़ा बख़्शने वाला मेहरबान है
23 बेशक जो लोग पाक दामन बेख़बर और इमानदार औरतों पर तोहमत लगाते हैं पर दुनिया और आखि़रत में लानत है और उन पर बड़ा अज़ाब होगा
24 जिस दिन उनके खि़लाफ उनकी ज़बानें और उनके हाथ उनके पावँ उनकी कारस्तानियों की गवाही देगें
25 उस दिन अल्लाह उनको ठीक-ठीक उनका पूरा पूरा बदला देगा और जान जाएँगें कि अल्लाह बिल्कुल बरहक़ और ज़ाहिर करने वाला है
26 ख़बीस औरते ख़बीस मर्दों के लिए हैं और ख़बीस मर्द ख़बीस औरतो के लिए और पाक औरतें पाक मर्दों के लिए हैं और पाक मर्द पाक औरतों के लिए लोग जो कुछ उनकी निस्बत बका करते हैं उससे ये लोग बुरी उल जि़म्मा हैं उन ही के लिए बख़शिश है और इज़्ज़त की रोज़ी
27 ऐ इमान वालों अपने घरों के सिवा दूसरे घरों में न चले जाओ यहाँ तक कि उनसे इजाज़त ले लो और उन घरों के रहने वालों से साहब सलामत कर लो यही तुम्हारे हक़ में बेहतर है ताकि तुम याद रखो पस
28 अगर तुम उन घरों में किसी को न पाओ तो तावाक़फियत कि तुम को इजाज़त न हासिल हो जाए उन में न जाओ और अगर तुम से कहा जाए कि फिर जाओ तो तुम फिर जाओ यही तुम्हारे वास्ते ज़्यादा सफाई की बात है और तुम जो कुछ भी करते हो अल्लाह उससे खूब वाकिफ़ है
29 इसमें अलबत्ता तुम पर इल्ज़ाम नहीं कि ग़ैर आबाद मकानात में जिसमें तुम्हारा कोई असबाब हो चले जाओ और जो कुछ खुल्लम खुल्ला करते हो और जो कुछ छिपाकर करते हो अल्लाह जानता है
30 इमान वालों से कह दो कि अपनी नज़रों को नीची रखें और अपनी शर्मगाहों की हिफाज़त करें यही उनके वास्ते ज़्यादा सफाई की बात है ये लोग जो कुछ करते हैं अल्लाह उससे यक़ीनन ख़ूब वाकि़फ है
31 और इमान वाली औरतों से भी कह दो कि वह भी अपनी नज़रें नीची रखें और अपनी शर्मगाहों की हिफाज़त करें और अपने बनाव सिंगार को ज़ाहिर न होने दें मगर जो खुद ब खुद ज़ाहिर हो जाता हो और अपनी ओढ़नियों को अपने गरेबानों पर डाले रहें और अपने शौहर या अपने बाप दादाओं या आपने शौहर के बाप दादाओं या अपने बेटों या अपने शौहर के बेटों या अपने भाइयों या अपने भतीजों या अपने भांजों या अपने औरतों या अपनी या अपनी लौंडियों या नौकर चाकर जो मर्द सूरत हैं मगर औरतों से कुछ मतलब नहीं रखते या पह कमसिन लड़के जो औरतों के पर्दे की बात से आगाह नहीं हैं उनके सिवा अपना बनाव सिंगार ज़ाहिर न होने दिया करें और चलने में अपने पाँव ज़मीन पर इस तरह न रखें कि लोगों को उनके पोशीदा बनाव सिंगार की ख़बर हो जाए और ऐ इमान वालों तुम सबके सब अल्लाह की बारगाह में तौबा करो ताकि तुम फलाह पाओ
32 और अपनी बेशौहर औरतों और अपने नेक बख़्त गुलामों और लौंडियों का निकाह कर दिया करो अगर ये लोग मोहताज होंगे तो अल्लाह अपने फज़ल व से उन्हें मालदार बना देगा और अल्लाह तो बड़ी गुनजाइश वाला वाकि़फ कार है
33 और जो लोग निकाह करने का मक़दूर नहीं रखते उनको चाहिए कि पाक दामिनी एख़्तियार करें यहाँ तक कि अल्लाह उनको अपने फज़ल से मालदार बना दे और तुम्हारी लौन्डी ग़ुलामों में से जो मकातबत होने की ख़्वाहिश करें तो तुम अगर उनमें कुछ सलाहियत देखो तो उनको मकातिब कर दो और अल्लाह के माल से जो उसने तुम्हें अता किया है उनको भी दो और तुम्हारी लौन्डियाँ जो पाक दामन ही रहना चाहती हैं उनको दुनियावी जि़न्दगी के फायदे हासिल करने की ग़रज़ से हराम कारी पर मजबूर न करो और जो उनको मजबूर करेगा तो इसमें शक नहीं कि अल्लाह उसकी बेबसी के बाद बड़ा बख़्शने वाले मेहरबान है
34 और हमने तो तुम्हारे पास वाज़ेए व रौशन आयतें और जो लोग तुमसे पहले गुज़र चुके हैं उनकी हालतें और परहेज़गारों के लिए नसीहत नाजि़ल की
35 अल्लाह तो सारे आसमान और ज़मीन का नूर है उसके नूर की मिसल है जैसे एक ताक़ है जिसमे एक रौशन चिराग़ हो और चिराग़ एक शीशे की क़न्दील में हो क़न्दील गोया एक जगमगाता हुआ रौशन सितारा जै़तून के मुबारक दरख़्त से रौशन किया जाए जो न पूरब की तरफ हो और न पच्छिम की तरफ उसका तेल शफ्फाफ हो कि अगरचे आग उसे छुए भी नही ताहम ऐसा मालूम हो कि आप ही आप रौशन हो जाएगा नूर आला नूर अल्लाह अपने नूर की तरफ जिसे चाहता है हिदायत करता है और अल्लाह तो हर चीज़ से खूब वाकि़फ है
36 उन घरों में रौशन है जिनकी निस्बत अल्लाह ने हुक्म दिया कि उनकी ताज़ीम की जाए और उनमें उसका नाम लिया जाए जिनमें सुबह व शाम वह लोग उसकी तस्बीह किया करते हैं
37 ऐसे लोग जिनको अल्लाह के जि़क्र और नमाज़ पढ़ने और ज़कात अदा करने से न तो तिजारत ही ग़ाफिल कर सकती है न वह लोग उस दिन से डरते हैं जिसमें ख़ौफ के मारे दिल और आँखें उलट जाएँगी
38 ताकि अल्लाह उन्हें उनके आमाल का बेहतर से बेहतर बदला अता फरमाए और अपने फज़ल व करम से कुछ और ज़्यादा भी दे और अल्लाह तो जिसे चाहता है बेहिसाब रोज़ी देता है
39 और जिन लोगों ने कुफ्र एख़्तेयार किया उनकी कारस्तानियाँ जैसे एक चटियल मैदान का चमकता हुआ बालू का प्यासा उस को दूर से देखे तो पानी ख़्याल करता है यहाँ तक कि जब उसके पास आया तो उसको कुछ भी न पाया और अल्लाह को अपने पास मौजूद पाया तो उसने उसका हिसाब पूरा पूरा चुका दिया और अल्लाह तो बहुत जल्द हिसाब लेने वाला है
40 उस बड़े गहरे दरिया की तारिकियों की सी है- जैसे एक लहर उसके ऊपर दूसरी लहर उसके ऊपर अब्र ढाके हुए हो तारिकियाँ है कि एक से ऊपर एक चली आती हैं कि अगर कोइ अपना हाथ निकाले तो उसे देख न सके और जिसे खुद अल्लाह ही ने रौशनी न दी हो तो उसके लिए कहीं कोई रौशनी नहीं है
41 क्या तुम ने इतना भी नहीं देखा कि जितनी मख़लूक़ात सारे आसमान और ज़मीन में हैं और परिन्दें पर फैलाए उसी को तस्बीह किया करते हैं सब के सब अपनी नमाज़ और अपनी तस्बीह का तरीक़ा खूब जानते हैं और जो कुछ ये किया करते हैं अल्लाह उससे खू़ब वाकि़फ है
42 और सारे आसमान व ज़मीन की सल्तनत ख़ास अल्लाह ही की है और अल्लाह ही की तरफ लौट कर जाना है
43 क्या तुम ने उस पर भी नज़र नहीं की कि यक़ीनन अल्लाह ही अब्र को चलाता है फिर वही बाहम उसे जोड़ता है-फिर वही उसे तह ब तह रखता है तब तो तू बारिश उसके दरम्यिान से निकलते हुए देखता है और आसमान में जो पहाड़ है उनमें से वही उसे बरसाता है- फिर उन्हें जिस पर चाहता है पहुँचा देता है- और जिस से चाहता है टाल देता है- क़रीब है कि उसकी बिजली की कौन्द आखों की रौशनी उचके लिये जाती है
44 अल्लाह ही रात और दिन को फेर बदल करता रहता है- बेशक इसमें आँख वालों के लिए बड़ी इबरत है
45 और अल्लाह ही ने तमाम ज़मीन पर चलने वाले को पानी से पैदा किया उनमें से बाज़ तो ऐसे हैं जो अपने पेट के बल चलते हैं और बाज़ उनमें से ऐसे हैं जो दो पाँव पर चलते हैं और बाज़ उनमें से ऐसे हैं जो चार पावों पर चलते हैं- अल्लाह जो चाहता है पैदा करता है इसमें शक नहीं कि अल्लाह हर चीज़ पर क़ादिर है
46 हम ही ने यक़ीनन वाजे़ए व रौशन आयतें नाजि़ल की और अल्लाह ही जिसको चाहता है सीधी राह की हिदायत करता है
47 और कहते हैं कि अल्लाह पर और रसूल पर इमान लाए और हमने इताअत क़ुबूल की- फिर उसके बाद उन में से कुछ लोग मुँह फेर लेते हैं और ये लोग इमानदार थे ही नहीं
48 और जब वह लोग अल्लाह और उसके रसूल की तरफ बुलाए जाते हैं ताकि रसूल उनके आपस के झगड़े का फैसला कर दें तो उनमें का एक फरीक रूगरदानी करता है
49 और अगर हक़ उनकी तरफ होता तो गर्दन झुकाए रसूल के पास दौड़े हुए आते
50 क्या उन के दिल में मर्ज़ है या शक में पड़े हैं या इस बात से डरते हैं कि अल्लाह और उसका रसूल उन पर ज़ुल्म कर बैठेगा- बल्कि यही लोग ज़ालिम हैं
51 इमान वालों का क़ौल तो बस ये है कि जब उनको अल्लाह और उसके रसूल के पास बुलाया जाता है ताकि उनके बाहमी झगड़ों का फैसला करो तो कहते हैं कि हमने सुना और मान लिया और यही लोग कामयाब होने वाले हैं
52 और जो अल्लाह और उसके रसूल का हुक्म माने और अल्लाह से डरे और उस से बचता रहेगा तो ऐसे ही लोग अपनी मुराद को पहुँचेगें
53 और उन ने तुम्हारी इताअत की अल्लाह की सख़्त से सख़्त क़समें खाई कि अगर तुम उन्हें हुक्म दो तो बिला उज़्र निकल खडे़ हों- तुम कह दो कि क़समें न खाओ दस्तूर के मुवाफिक़ इताअत और बेशक तुम जो कुछ करते हो अल्लाह उससे ख़बरदार है
54 तुम कह दो कि अल्लाह की इताअत करो और रसूल की इताअत करो इस पर भी अगर तुम सरताबी करोगे तो बस रसूल पर इतना ही वाजिब है जिसके वह जि़म्मेदार किए गए हैं और जिसके जि़म्मेदार तुम बनाए गए हो तुम पर वाजिब है और अगर तुम उसकी इताअत करोगे तो हिदायत पाओगे और रसूल पर तो सिर्फ साफ तौर पर पहुँचाना फर्ज़ है
55 तुम में से जिन लोगों ने इमान क़ुबूल किया और अच्छे अच्छे काम किए उन से अल्लाह ने वायदा किया कि उन को दिन रुए ज़मीन पर ज़रुर नाएब मुक़र्रर करेगा जिस तरह उन लोगों को नाएब बनाया जो उनसे पहले गुज़र चुके हैं और जिस दीन को उसने उनके लिए पसन्द फरमाया है उस पर उन्हें ज़रुर ज़रुर पूरी क़ुदरत देगा और उनके ख़ाएफ़ होने के बाद अमन से ज़रुर बदल देगा कि वह मेरी ही इबादत करेंगे और किसी को हमारा शरीक न बनाएँगे और जो इसके बाद भी नाशुक्री करे तो ऐसे ही लोग बदकार हैं
56 और नमाज़ पाबन्दी से पढ़ा करो और ज़कात दिया करो और रसूल की इताअत करो ताकि तुम पर रहम किया जाए
57 और तुम ये ख़्याल न करो कि कुफ्फार ज़मीन मे आजिज़ कर देगें और उनका ठिकाना तो आग है और क्या बुरा ठिकाना है
58 ऐ इमान वालों तुम्हारी लौन्डी ग़ुलाम और वह लड़के जो अभी तक बुलूग़ की हद तक नहीं पहुँचे हैं उनको भी चाहिए कि तीन मरतबा तुमसे इजाज़त ले लिया करें तब आएँ नमाज़ सुबह से पहले और जब तुम दोपहर को कपड़े उतार दिया करते हो नमाजे़ इशा के बाद तीन तुम्हारे परदे के हैं इन अवक़ात के अलावा न तुम पर कोई इल्ज़ाम है-न उन पर उन अवक़ात के अलावा लोग एक दूसरे के पास चक्कर लगाया करते हैं- यँ अल्लाह एहकाम तुम से साफ साफ बयान करता है और अल्लाह तो बड़ा वाकिफ़कार हकीम है
59 और जब तुम्हारे लड़के हदे बुलूग को पहुँचें तो जिस तरह उन के कब्ल वाले इजाज़त ले लिया करते थे उसी तरह ये लोग भी इजाज़त ले लिया करें-यूँ अल्लाह अपने एहकाम साफ साफ बयान करता है और अल्लाह तो बड़ा वाकिफकार हकीम है
60 और बूढ़ी बूढ़ी औरतें जो निकाह की ख़्वाहिश नही रखती वह अगर अपने कपड़े उतार डालें तो उसमें उन पर कुछ गुनाह नही है- बशर्ते कि उनको अपना बनाव सिंगार दिखाना मंज़ूर न हो और बचें तो उनके लिए और बेहतर है और अल्लाह तो सुनता और जानता है
61 इस बात में न तो अँधे आदमी के लिए मज़ाएक़ा है और न लँगड़ें आदमी पर कुछ इल्ज़ाम है- और न बीमार पर कोई गुनाह है और न ख़ुद तुम लोगो पर कि अपने घरों से खाना खाओ या अपने बाप दादा नाना बग़ैरह के घरों से या अपनी माँ दादी नानी वगै़रह के घरों से या अपने भाइयों के घरों से या अपनी बहनों के घरों से या अपने चचाओं के घरों से या अपनी फूफि़यों के घरों से या अपने मामूओं के घरों से या अपनी खा़लाओं के घरों से या उस घर से जिसकी कुन्जियाँ तुम्हारे हाथ में है या अपने दोस्तों से इस में भी तुम पर कोई इल्ज़ाम नहीं कि सब के सब मिलकर खाओ या अलग अलग फिर जब तुम घर वालों में जाने लगो तो ख़ुद अपने ही ऊपर सलाम कर लिया करो जो अल्लाह की तरफ से एक मुबारक पाक व पाकीज़ा तोहफा है- अल्लाह यूँ एहकाम तुमसे साफ साफ बयान करता है ताकि तुम समझो
62 सच्चे इमान वाले तो सिर्फ वह लोग हैं जो अल्लाह और उसके रसूल पर इमान लाए और जब किसी ऐसे काम के लिए जिसमें लोगों के जमा होने की ज़रुरत है- रसूल के पास होते हैं जब तक उससे इजाज़त न ले ली न गए जो लोग तुम से इजाज़त ले लेते हैं वे ही लोग अल्लाह और उसके रसूल पर इमान लाए हैं तो जब ये लोग अपने किसी काम के लिए तुम से इजाज़त माँगें तो तुम उनमें से जिसको चाहो इजाज़त दे दिया करो और अल्लाह उसे उसकी बखशिश की दुआ भी करो बेशक अल्लाह बड़ा बख्शने वाला मेहरबान है
63 जिस तरह तुम में से एक दूसरे को बुलाया करते हैं उस तरह आपस में रसूल का बुलाना न समझो अल्लाह उन लोगों को खू़ब जानता है जो तुम में से आँख बचा के खिसक जाते हैं- तो जो लोग उसके हुक्म की मुख़ालफत करते हैं उनको इस बात से डरते रहना चाहिए कि उन पर कोई मुसीबत आ पडे़ या उन पर कोई दर्दनाक अज़ाब नाजि़ल हो
64 ख़बरदार जो कुछ सारे आसमान व ज़मीन में है यक़ीनन अल्लाह ही का है जिस हालत पर तुम हो अल्लाह ख़ूब जानता है और जिस दिन उसके पास ये लोग लौटा कर लाएँ जाएँगें तो जो कुछ उन लोगों ने किया कराया है बता देगा और अल्लाह तो हर चीज़ से खू़ब वाकिफ है
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