मेरे साथ 1400 वर्ष पूर्व
मदीने का सफ़र कीजिये और सच्चे इस्लाम और मोमिनों को पहचानिए – 16
(113) 9 सूरए तौबा 1 अल्लाह और उसके रसूल की तरफ से उनसे बेज़ारी है जिन मुशरिकों से तुम लोगों ने सुलह का एहद किया था
2 तुम चार महीने रूए ज़मीन में सैरो सियाहत (घूम फिर) कर लो और ये समझ लो कि तुम अल्लाह को आजिज़ नहीं कर सकते और ये भी कि अल्लाह काफि़रों को ज़रूर रूसवा करके रहेगा
3 अल्लाह और उसके रसूल की तरफ से हज अकबर के दिन लोगों को ऐलान कि अल्लाह और उसका रसूल मुशरिकों से बरी है तो अगर तुम लोगों ने तौबा की तो तुम्हारे हक़ में यही बेहतर है और अगर तुम लोगों ने मुह मोड़ा तो समझ लो कि तुम लोग अल्लाह को हरगिज़ आजिज़ नहीं कर सकते और जिन लोगों ने कुफ्र इख़्तेयार किया उनको दर्दनाक अज़ाब की ख़ुश ख़बरी दे दो
4 सिवाय उनके जिन मुशरिकों से तुमने एहदो पैमान किया था फिर उन लोगों ने भी कभी कुछ तुमसे कमी नहीं की और न तुम्हारे मुक़ाबले में किसी की मदद की हो तो उनके एहद व पैमान को जितनी मुद्द्त के वास्ते मुक़र्रर किया है पूरा कर दो अल्लाह परहेज़गारों को यक़ीनन दोस्त रखता है
5 फिर जब हुरमत के चार महीने गुज़र जाएँ तो मुशरिको को जहाँ पाओ कत्ल करो और उनको गिरफ्तार कर लो और उनको कै़द करो और हर घात की जगह में उनकी ताक में बैठो फिर अगर वह लोग बाज़ आए और नमाज़ पढ़ने लगें और ज़कात दे तो उनकी राह छोड़ दो बेशक अल्लाह बड़ा बख़्शने वाला मेहरबान है
6 और अगर मुशरिकीन में से कोई तुमसे पनाह मागें तो उसको पनाह दो यहाँ तक कि वह अल्लाह का कलाम सुन ले फिर उसे उसकी अमन की जगह वापस पहुँचा दो ये इस वजह से कि ये लोग नादान हैं 7 मुशरिकीन का कोई एहदो पैमान अल्लाह के नज़दीक और उसके रसूल के नज़दीक क्योंकर रह सकता है मगर जिन लोगों से तुमने खानाए काबा के पास मुआहेदा किया था तो वह लोग तुमसे क़ायम रखना चाहें तो तुम भी उन से क़ायम रखो बेशक अल्लाह परहेज़ करने वालों को दोस्त रखता है
8 कैसे जब कि अगर तुम पर ग़लबा पा जाए तो तुम्हारे में न तो रिश्ते नाते ही का लिहाज़ करेगें और न अपने क़ौल व क़रार का ये लोग तुम्हें अपनी ज़बानी खुश कर देते हैं हालाँकि उनके दिल नहीं राज़ी हैं और उनमें के बहुतेरे तो बदचलन हैं 9 और उन लोगों ने अल्लाह की आयतों के बदले थोड़ी सी क़ीमत हासिल करके उसकी राह से रोक दिया बेशक ये लोग जो कुछ करते हैं ये बहुत ही बुरा है
10 ये लोग किसी मोमिन के बारे में न तो रिश्ता नाता ही कर लिहाज़ करते हैं और न क़ौल का क़रार का और यही लोग ज़्यादती करते हैं
11 तो अगर तौबा करें और नमाज़ पढ़ने लगें और ज़कात दें तो तुम्हारे दीनी भाई हैं और हम अपनी आयतों को वाकि़फकार लोगों के वास्ते तफ़सीलन बयान करते हैं 12 और अगर ये लोग एहद कर चुकने के बाद अपनी क़समें तोड़ डालें और तुम्हारे दीन में तुमको ताना दें तो तुम कुफ्र के इमामों से खूब लड़ाई करो उनकी क़समें कुछ नहीं ताकि ये लोग बाज़ आएँ
13 भला तुम उन लोगों से क्यों नहीं लड़ते जिन्होंने अपनी क़समों को तोड़ डाला और रसूल को निकाल बाहर करना ठान लिया था और तुमसे पहले छेड़ भी उन्होंने ही शुरू की थी क्या तुम उनसे डरते हो तो अगर तुम सच्चे ईमानदार हो तो अल्लाह उनसे कहीं बढ़ कर तुम्हारे डरने के क़ाबिल है
14 इनसे लड़ो अल्लाह तुम्हारे हाथों उनकी सज़ा करेगा और उन्हें रूसवा करेगा और तुम्हें उन पर फतेह अता करेगा और इमानदार लोगों के कलेजे ठन्डे करेगा
15 और दिल के क्रोध को दफ़ा कर देगा और अल्लाह जिसकी चाहे तौबा क़ुबूल करे और अल्लाह बड़ा वाकि़फकार हिकमत वाला है
16 क्या तुमने ये समझ लिया है कि तुम छोड़ दिए जाओगे और अभी तक तो अल्लाह ने उन लोगों को छांटा ही नहीं जो तुम में से जिहाद करते हैं और अल्लाह और उसके रसूल और मोमेनीन के सिवा किसी को अपना राज़दार दोस्त नहीं बनाते और जो कुछ भी तुम करते हो अल्लाह उससे बाख़बर है
17 मुशरेकीन का ये काम नहीं कि जब वह अपने कुफ्ऱ का ख़ुद इक़रार करते है तो अल्लाह की मस्जिदों को आबाद करे यही वह लोग हैं जिनका किया कराया सब अकारत हुआ और ये लोग हमेशा जहन्नुम में रहेंगे 18 अल्लाह की मस्जिदों को बस सिर्फ वहीं आबाद कर सकता है जो अल्लाह और रोजे़ आखि़रत पर ईमान लाए और नमाज़ पढ़ा करे और ज़कात देता रहे और अल्लाह के सिवा किसी से न डरो तो अनक़रीब यही लोग हिदायत याफ़्ता लोगों मे से हो जाएंगे 19 क्या तुम लोगों ने हाजियों को पानी पिलाने और मस्जिदुल हराम के रख-रखाव को उस के बराबर बना दिया है जो अल्लाह और रोज़े आख़ेरत के दिन पर ईमान लाया और अल्लाह के राह में जेहाद किया अल्लाह के नज़दीक तो ये लोग बराबर नहीं और अल्लाह ज़ालिम लोगों की हिदायत नहीं करता है
20 जिन लोगों ने ईमान क़़ुबूल किया और हिजरत एख़्तियार की और अपने मालों से और अपनी जानों से अल्लाह की राह में जिहाद किया वह लोग अल्लाह के नज़दीक दर्जें में कही बढ़ कर हैं और यही लोग फायज़ होने वाले हैं
21 उनका रब उनको अपनी मेहरबानी और ख़ुशनूदी और ऐसे बाग़ों की ख़ुशख़बरी देता है जिसमें उनके लिए दाइमी ऐश होगा 22 और ये लोग उन बाग़ों में हमेशा अब्दआलाबाद तक रहेंगे बेशक अल्लाह के पास तो बड़ा बड़ा अज्र है 23 ऐ ईमान लाने वालों अगर तुम्हारे माँ बाप और तुम्हारे भाई ईमान के मुक़ाबले कुफ्ऱ को तरजीह देते हो तो तुम उनको अपना वली न बनाओ और तुममें जो उन्हें वली बनाएगा तो यही लोग ज़ालिम है
24 कह दो तुम्हारे बाप दादा और तुम्हारे बेटे और तुम्हारे भाई बन्द और तुम्हारी बीबियाँ और तुम्हारे कुनबे वाले और वह माल जो तुमने कमा के रख छोड़ा हैं और वह तिजारत जिसके मन्द पड़ जाने का तुम्हें अन्देशा है और वह मकानात जिन्हें तुम पसन्द करते हो अगर तुम्हें अल्लाह से और उसके रसूल से और उसकी राह में जिहाद करने से ज़्यादा अज़ीज़ है तो तुम ज़रा ठहरो यहाँ तक कि अल्लाह अपना हुक्म मौजूद करे और अल्लाह नाफरमान लोगों की हिदायत नहीं करता
25 अल्लाह ने तुम्हारी बहुतेरे मक़ामात पर इमदाद की और जंग हुनैन के दिन जब तुम्हें अपनी क़सरत ने मग़रूर कर दिया था फिर वह क़सरत तुम्हें कुछ भी काम न आयी और ज़मीन बावजूद उस वसअत के तुम पर तंग हो गई तुम पीठ कर भाग निकले” इन आयतों को पढ़ कर लगता है कि पहली पीढ़ी के मुसलामानों में भी बेशतर कितने ज़लील फितरत लोग थे
“ 26 तब अल्लाह ने अपने रसूल पर और मोमिनीन पर अपनी तसकीन नाजि़ल फरमाई और लश्कर भेजे जिन्हें तुम देखते भी नहीं थे और कुफ़्फ़ार पर अज़ाब नाजि़ल फरमाया और काफिरों की यही सज़ा है
27 उसके बाद अल्लाह जिसकी चाहे तौबा क़ुबूल करे और अल्लाह बड़ा बख़्शने वाला मेहरबान है
28 ऐ ईमान लाने वालों मुशरेकीन तो निरे नजिस हैं तो अब वह उस साल के बाद मस्जिदुल हराम के पास फिर न आने पाएँ और अगर तुम फक़रों फाक़ा से डरते हो तो अनकरीब ही अल्लाह तुमको अगर चाहेगा तो अपने फज़ल से ग़नीकर देगा बेशक अल्लाह बड़ा वाकि़फकार हिकमत वाला है
29 एहले किताब में से जो लोग न तो अल्लाह ही पर इमान रखते हैं और न रोज़े आखि़रत पर और न अल्लाह और उसके रसूल की हराम की हुयी चीज़ों को हराम समझते हैं और न सच्चे दीन ही को एख़्तियार करते हैं उन लोगों से लड़े जाओ यहाँ तक कि वह जजि़या देने लगें
30 यहूद तो कहते हैं कि उजैर अल्लाह के बेटे हैं और नुसैरा कहते हैं कि मसीह अल्लाह के बेटे हैं ये तो उनकी बात है और उन्हीं के मुँह से ये लोग भी उन्हीं काफि़रों की सी बातें बनाने लगे जो उनसे पहले गुज़र चुके हैं अल्लाह की लानत - कहाँ से कहाँ भटके जा रहे हैं
31 उन लोगों ने तो अपने अल्लाह को छोड़कर अपनी आलिमों को और अपने ज़ाहिदों को और मरियम के बेटे मसीह को अपना रब बना डाला हालाकि उन्होनें सिवाए इसके और हुक्म ही नहीं दिया गया कि अल्लाह ए यकता की इबादत करें उसके सिवा कोई माबूद नहीं पाक है जिनसे वे शरीक बनाते हैं
32 ये लोग चाहते हैं कि अपने मुँह से अल्लाह के नूर को बुझा दें और अल्लाह नहीं करेगा सिवाय अपने नूर को पूरा करने के अगरचे कुफ़्फ़ार बुरा माना करें 33 वही तो है कि जिसने अपने रसूल को हिदायत और सच्चे दीन के साथ भेजा कि उसको तमाम दीनो पर ग़ालिब करे अगरचे मुशरेकीन बुरा माना करे आलिमों जाहिदों की करतूतें
34 ऐ ईमान लाने वालों इसमें उसमें शक नहीं कि बहुतेरे आलिम ज़ाहिद लेागों के मालेनाहक़ खा जाते है और अल्लाह की राह से रोकते हैं और जो लोग सोना और चाँदी जमा करते जाते हैं और उसको अल्लाह की राह में खर्च नहीं करते तो उन को दर्दनाक अज़ाब की ख़ुशखबरी सुना दो 35जहन्नुम की आग में गर्म किया जाएगा फिर उससे उनकी पेशानियाँ और उनके पहलू और उनकी पीठें दाग़ी जाएगी ये वह है जिसे तुमने अपने लिए जमा करके रखा था तो अपने जमा किए का मज़ा चखो
36 महीनों की गिनती बारह है अल्लाह की किताब में उसी दिन से जिस दिन आसमान व ज़मीन को पैदा किया उनमें से चार महीने हुरमत के हैं यही दीन सीधी राह है इन में तुम अपने ऊपर ज़़ुल्म न करो I और लड़ो मुशरेकीन से एक साथ मिल कर जिस तरह तुम से सबके सब मिलकर लड़ते हैं ये जान लो कि अल्लाह तो यक़ीनन परहेज़गारों के साथ है
37 महीनों का आगे पीछे कर देना भी कुफ्ऱ ही की ज़्यादती है कि उनकी बदौलत कुफ़्फ़ार बहक जाते हैं एक बरस तो उसी एक महीने को हलाल समझ लेते हैं और दूसरे साल उसी महीने को हराम कहते हैं ताकि अल्लाह ने जो हराम किए हैं उनकी गिनती ही पूरी कर लें और अल्लाह की हराम की हुयी चीज़ को हलाल कर लें उनकी बुरी कारस्तानिया उन्हें भली कर दिखाई गई हैं और अल्लाह काफिर लोगो को मंजि़ले मक़सूद तक नहीं पहुँचाया करता पहली पीढ़ी के मुसलामानों का हाल
38 ऐ ईमान लाने वालों तुम्हें क्या हो गया है कि जब तुमसे कहा जाता है कि अल्लाह की राह में निकलो तो तुम लदधड़ हो कर ज़मीन की तरफ झुके पड़ते हो क्या तुम आखि़रत के बनिस्बत दुनिया की जिन्दगी को पसन्द करते थे तो दुनिया की जि़न्दगी का साज़ो सामान ऐश व आराम के मुक़ाबले में बहुत ही थोड़ा है
39 अगर तुम न निकलोगे तो अल्लाह तुम पर दर्दनाक अज़ाब नाजि़ल फरमाएगा और तुम्हारे बदले किसी दूसरी क़ौम को ले आएगा और तुम उसका कुछ भी बिगाड़ नहीं सकते और अल्लाह हर चीज़ पर क़ादिर है
40 अगर तुम उस रसूल की मदद न करोगे तो उसने तो अपने रसूल की उस वक़्त मदद की जब उसकी कुफ़्फ़ार ने निकल बाहर किया उस वक़्त सिर्फ दो में दूसरे रसूल थे जब वह दोनो ग़ार में थे जब अपने साथी को समझा रहे थे कि घबराओ नहीं अल्लाह यक़ीनन हमारे साथ है तो अल्लाह ने उन पर अपनी तसकीन नाजि़ल फरमाई और ऐसे लश्कर से उनकी मदद की जिनको तुम लोगों ने देखा तक नहीं और अल्लाह ने काफिरों की बात नीची कर दिखाई और अल्लाह ही का बोल बाला है और अल्लाह तो ग़ालिब हिकमत वाला है
41 तुम हलके फुलके हो या भारी भरकम बहर हाल जब तुमको हुक्म दिया जाए फौरन चल खड़े हो और अपनी जानों से अपने मालों से अल्लाह की राह में जिहाद करो अगर तुम समझ लो कि यही तुम्हारे हक़ में बेहतर है
42 अगर सरे दस्त फ़ायदा और सफर आसान होता तो यक़ीनन ये लोग तुम्हारा साथ देते मगर इन पर मुसाफ़त की मशक़क़त तूलानी हो गई और अगर पीछे रह जाने की वज़ह से पूछोगे तो ये लोग फौरन अल्लाह की क़समें खाएगें कि अगर हम में सकत होती तो हम भी ज़रूर तुम लोगों के साथ ही चल खड़े होते ये लोग झूठी कसमें खाकर अपनी जान आप हलाक किए डालते हैं और अल्लाह तो जानता है कि ये लोग बेशक झूठे हैं
43 अल्लाह तुमसे दरगुज़र फरमाए तुमने उन्हें इजाज़त ही क्यों दी ताकि अगर ऐसा न करते तो तुम पर सच बोलने वाले ज़ाहिर हो जाते और तुम झूटों को मालूम कर लेते
44 जो लोग अल्लाह और रोज़े आखि़रत पर ईमान रखते हैं वह तो अपने माल से और अपनी जानों से जिहाद करने से कोई छूट नहीं मागते और अल्लाह परहेज़गारों से खूब वाकि़फ है
45 छूट तो बस वही लोग मागेंगे जो अल्लाह और रोजे़ आखि़रत पर ईमान नहीं रखते और उनके दिल में शक है तो वह अपने शक में डावा डोल हो रहे हैं
46 और अगर ये लोग निकलने की ठान लेते तो कुछ तैय्यारी तो करते मगर अल्लाह ने उनके साथ भेजने को नापसन्द किया तो उनको रोक दिया और उनसे कह दिया गया कि तुम बैठने वालों के साथ बैठे रहो
47 अगर ये लोग तुममें निकलते भी तो बस तुममे फ़साद ही बरपा कर देते और तुम्हारे हक़ में फि़तना कराने की ग़रज़ से तुम्हारे दरम्यिान घोड़े दौड़ाते फिरते और तुममें से उनके जासूस भी हैं और अल्लाह शरीरों से ख़ूब वाकि़फ़ 48 इसमें तो शक नहीं कि उन लोगों ने पहले ही फ़साद डालना चाहा था और तुम्हारी बहुत सी बातें उलट पुलट के यहा तक कि हक़ आ पहुचा और अल्लाह ही का हुक्म ग़ालिब रहा और उनको नागवार ही रहा” यह जिन लोगों की बात हो रही है वे कोई थोड़े से और कमज़ोर मामूली मुसलमान नहीं हैं इतनी आयतों में इनका ज़िक्र इसी लिए है कि यह कसीर तादाद में साहिबे हैसियत लोग थे – यही वे लोग हैं जो आज भी इस्लाम पर काबिज़ हैं I
49 उन लोगों में से बाज़ ऐसे भी हैं जो साफ कहते हैं कि मुझे तो इजाज़त दीजिए और मुझ बला में न फॅसाइए I आगाह हो कि ये लोग खुद बला में गिर पड़े और जहन्नुम तो काफिरों का यक़ीनन घेरे हुए ही हैं
50 तुमको कोई फायदा पहुचा तो उन को बुरा मालूम होता है और अगर तुम पर कोई मुसीबत आ पड़ती तो ये लोग कहते हैं कि हमने अपना काम पहले ही ठीक कर लिया था और ख़ुश वापस लौटतें है
51 तुम कह दो कि हम पर हरगिज़ कोई मुसीबत पड़ नही सकती मगर जो अल्लाह ने लिख दिया है वही हमारा मालिक है और ईमान लाने वालों को चाहिए भी कि अल्लाह ही पर भरोसा रखें 52 तुम मुनाफिकों से कह दो कि तुम तो हमारे वास्ते दो भलाइयों में से एक के ख़्वाह मख़्वाह मुन्तजि़र ही हो और हम तुम्हारे वास्ते उसके मुन्तजि़र हैं कि अल्लाह तुम पर अपने ही से कोई अज़ाब नाजि़ल करे या हमारे हाथों से फिर तुम भी इन्तेज़ार करो हम भी तुम्हारे साथ इन्तेज़ार करते हैं
53 कह दो कि तुम लोग ख़्वाह ख़ुशी से खर्च करो या मजबूरी से तुम्हारी ख़ैरात तो कभी कु़बूल की नहीं जाएगी तुम यक़ीनन बदकार लोग हो
54 और उनकी ख़ैरात के क़ुबूल किए जाने में और कोई वजह मायने नहीं मगर यही कि उन लोगों ने अल्लाह और उसके रसूल की नाफ़रमानी की और नमाज़ को आते भी हैं तो अलकसाए हुए और अल्लाह की राह में खर्च करते भी हैं तो बे दिली से
55 तुम को न तो उनके माल हैरत में डाले और न उनकी औलाद अल्लाह तो ये चाहता है कि उनको आल व माल की वजह से दुनिया की जि़न्दगी में मुबितलाए अज़ाब करे और जब उनकी जानें निकलें तब भी वह काफिर रहें
56 और ये लोग अल्लाह की क़सम खाएगें फिर वह तुममें ही के हैं हालाकि वह लोग तुममें के नहीं हैं मगर हैं ये लोग बुज़दिल हैं
57 गर कहीं ये लोग पनाह की जगह या ग़ार या घुस बैठने की कोई जगह पा जाए तो उसी तरफ रस्सियाँ तोड़ाते हुए भाग जाएँ” रसूल पर नाइंसाफी का इल्ज़ाम
58 उनमें से कुछ तो ऐसे भी हैं जो तुम्हें ख़ैरात में इल्ज़ाम देते हैं फिर अगर उनमे से कुछ दे दिया गया तो खुश हो गए और अगर उसमें से उन्हें कुछ नहीं दिया गया तो बस फौरन ही बिगड़ बैठे
59 और जो कुछ अल्लाह ने और उसके रसूल ने उनको अता फरमाया था अगर ये लोग उस पर राज़ी रहते और कहते कि अल्लाह हमारे वास्ते काफी है अनक़रीब ही अल्लाह हमें अपने फज़ल व करम से उसका रसूल दे ही देगा हम तो यक़ीनन अल्लाह ही की तरफ लौ लगाए बैठे हैं
60 ख़ैरात तो बस ख़ास फकीरों का हक़ है और मोहताजों का और उस के कारिन्दों का और जिनकी तालीफ़ क़लब की गई है और गर्दनों को छुड़ाने मे और क़र्ज़दारों का और अल्लाह की राह में और परदेसियों की किफ़ालत में ख़र्च करना चाहिए ये हुकूक़ अल्लाह की तरफ से मुक़र्रर किए हुए हैं और अल्लाह बड़ा वाकि़फ कार हिकमत वाला है रसूल को कान कहने वाले
61 और उसमें से बाज़ ऐसे भी हैं जो रसूल को सताते हैं और कहते हैं कि बस ये कान ही हैं तुम कह दो कि तुम्हारी भलाई सुनने के कान हैं कि अल्लाह पर ईमान रखते हैं और मोमिनीन का यक़ीन रखते हैं और तुममें से जो लोग ईमान ला चुके हैं उनके लिए रहमत और जो लोग रसूले अल्लाह को सताते हैं उनके लिए दर्दनाक अज़ाब हैं
62 ये लोग तुम्हारे सामने अल्लाह की क़समें खाते हैं ताकि तुम्हें राज़ी कर ले हालाकि अगर ये लोग सच्चे ईमानदार है तो अल्लाह और उसका रसूल कहीं ज़्यादा हक़दार है कि उसको राज़ी रखें 63 क्या ये लोग ये भी नहीं जानते कि जिसने अल्लाह और उसके रसूल की मुख़ालेफ़त की तो इसमें शक ही नहीं कि उसके लिए जहन्नुम की आग है जिसमें वह हमेशा रहेगा यही तो बड़ी रूसवाई है 64 मुनाफे़क़ीन इस बात से डरतें हैं कि कोई सूरा नाजि़ल हो जाए जो उनको जो कुछ उनके दिल में है बता दे तुम कह दो कि तुम मसख़रापन किए जाओ
जिससे तुम डरते हो अल्लाह उसे ज़रूर ज़ाहिर कर देगा 65 और अगर तुम उनसे पूछो तो ज़रूर यूही कहेगें कि हम तो यूही हंसी मज़ाक कर रहे थे तुम कहो कि क्या तुम अल्लाह से और उसकी आयतों से और उसके रसूल से हॅसी कर रहे थे
66 अब बातें न बनाओं हक़ तो ये हैं कि तुम ईमान लाने के बाद काफि़र हो बैठे अगर हम तुममें से कुछ लोगों से दरगुज़र भी करें तो हम कुछ लोगों को सज़ा ज़रूर देगें इस वजह से कि ये लोग कुसूरवार ज़रूर हैं” कुछ औरतें भी निफ़ाक़ पर थीं
“67 मुनाफिक़ मर्द और मुनाफिक़ औरतें एक दूसरे के बाहम जिन्स हैं कि बुरे काम का तो हुक्म करते हैं और नेक कामों से रोकते हैं और अपने हाथ बन्द रखते हैं ये लोग अल्लाह को भूल बैठे तो अल्लाह ने भी उन्हें भुला दिया बेशक मुनाफि़क़ बदचलन है
68 मुनाफिक़ मर्द और मुनाफिक़ औरतें और काफिरों से अल्लाह ने जहन्नुम की आग का वायदा तो कर लिया है कि ये लोग हमेशा उसी में रहेगें और यही उन के लिए काफ़ी है और अल्लाह ने उन पर लानत की है और उन्हीं के लिए दाइमी अज़ाब है
69 उनकी मसल है जो तुमसे पहले थे वह लोग तुमसे कू़वत में ज़्यादा थे और औलाद में कही बढ़ कर तो वह अपने हिस्से से भी फ़ायदा उठा हो चुके तो जिस तरह तुम से पहले लोग अपने हिस्से से फायदा उठा चुके हैं इसी तरह तुम ने अपने हिस्से से फायदा उठा लिया और जिस तरह वह बातिल में घुसे रहे उसी तरह तुम भी घुसे रहे ये वह लोग हैं जिन का सब किया धरा दुनिया और आखि़रत में अकारत हुआ और यही लोग घाटे में हैं
70 क्या इन मुनाफिक़ों को उन लोगों की ख़बर नहीं पहुँची है जो उनसे पहले हो गुज़रे हैं नूह की क़ौम और आद और समूद और इबराहीम की क़ौम और मदियन वाले और उलटी हुयी बस्तियों के रहने वाले कि उनके पास उनके रसूल वाजेए मौजिज़े लेाकर आए तो और अल्लाह ने उन पर जुल्म नहीं किया मगर ये लोग ख़ुद अपने ऊपर जुल्म करते थे
71 और ईमान वाले मर्द और ईमान वाली औरते उनमें से बाज़ के बाज़ रफीक़ है और नामज़ पाबन्दी से पढ़ते हैं और ज़कात देते हैं और अल्लाह और उसके रसूल की फरमाबरदारी करते हैं यही लोग हैं जिन पर अल्लाह अनक़रीब रहम करेगा बेशक अल्लाह ग़ालिब हिकमत वाला है
72 अल्लाह ने ईमान वाले मर्दों और ईमान वाली औरतों से उन बाग़ों का वायदा कर लिया है जिनके नीचे नहरें जारी हैं और वह उनमें हमेशा रहेगें और बाग़ो में उम्दा उम्दा मकानात का और अल्लाह की ख़़ुशनूदी उन सबसे बालातर है- यही तो बड़ी कामयाबी है
73 ऐ रसूल कुफ़्फ़ार के साथ और मुनाफिकों के साथ जिहाद करो और उन पर सख़्ती करो और उनका ठिकाना तो जहन्नुम ही है और वह बुरी जगह है
74 ये मुनाफे़क़ीन अल्लाह की क़समें खाते है कि नहीं कही हालाकि उन लोगों ने कुफ्ऱ का कलमा ज़रूर कहा और अपने इस्लाम के बाद काफिर हो गए और जिस बात पर क़ाबू न पा सके उसे ठान बैठे और उन लोगें ने सिर्फ इस वजह से अदावत की कि अपने फज़ल व करम से अल्लाह और उसके रसूल ने दौलत मन्द बना दिया है तो उनके लिए उसमें ख़ैर है कि ये लोग अब भी तौबा कर लें और अगर ये न मानेगें तो अल्लाह उन पर दुनिया और आखि़रत में दर्दनाक अज़ाब नाजि़ल फरमाएगा और तमाम दुनिया में उन का न कोई हामी होगा और न मददगार
75 और इन में से बाज़ ऐसे भी हैं जो अल्लाह से क़ौल क़रार कर चुके थे कि अगर हमें अपने फज़ल से देगा तो हम ज़रूर ख़ैरात किया करेगें और नेकोकार बन्दे हो जाएगें
76 तो जब अल्लाह ने अपने फज़ल से उन्हें अता फरमाया-तो लगे उसमें बुख़्ल करने और कतराकर मुह फेरने
77 फिर उनसे उनके ख़ामयाजे़ में अपनी मुलाक़ात के दिन तक उनके दिल में निफाक डाल दिया इस वजह से उन लोगों ने जो अल्लाह से वायदा किया था उसके खि़लाफ किया और इस वजह से कि झूठ बोला करते थे
78 क्या वह लोग इतना भी न जानते थे कि अल्लाह सारे भेद और उनकी सरगोशी जानता है और ये कि ग़ैब की बातों से ख़ूब आगाह है
79 जो लोग दिल खोलकर ख़ैरात करने वाले मोमिनीन पर और उन मोमिनीन पर जो सिर्फ अपनी मशक्कत की मज़दूरी पाते इल्ज़ाम लगाते हैं फिर उनसे मसख़रापन करते तो अल्लाह भी उन से मसख़रापन करेगा और उनके लिए दर्दनाक अज़ाब है” रसूल की दुआ भी काम न आएगी
80 ख़्वाह तुम उन के लिए मग़फिरत की दुआ मागों या उनके लिए मग़फिरत की दुआ न मागों तुम उनके लिए सत्तर बार भी बखि़्शश की दुआ मांगोगे तो भी अल्लाह उनको हरगिज़ न बख़्शेगा ये इस सबब से है कि उन लोगों ने अल्लाह और उसके रसूल के साथ कुफ्र किया और अल्लाह बदकार लोगों को मंजि़लें मकसूद तक नहीं पहुँचाया करता
81 रसूले अल्लाह के पीछे रह जाने वाले अपनी जगह बैठ रहने से ख़ुश हुए और अपने माल और आपनी जानों से अल्लाह की राह में जिहाद करना उनको मकरू मालूम हुआ और कहने लगे गर्मी में न निकलो तुम कह दो कि जहन्नुम की आग उससे कहीं ज़्यादा गर्म है
82 अगर वह कुछ समझें जो कुछ वह किया करते थे उसके बदले उन्हें चाहिए कि वह बहुत कम हॅसें और बहुत रोएँ
83 तो अगर अल्लाह तुम इन मुनाफेक़ीन के किसी गिरोह की तरफ वापस लाए फिर तुमसे निकलने की इजाज़त माँगें तो तुम साफ़ कह दो कि तुम मेरे साथ हरगिज़ न निकलने पाओगे और न हरगिज़ दुश्मन से मेरे साथ लड़ने पाओगे जब तुमने पहली मरतबा बैठे रहना पसन्द किया तो पीछे रह जाने वालों के साथ बैठे रहो
84 और उन मुनाफिक़ीन में से जो मर जाए तो कभी ना किसी पर नमाजे़ जनाज़ा पढ़ना और न उसकी क़ब्र पर खडे़ होना इन लोगों ने यक़ीनन अल्लाह और उसके रसूल के साथ कुफ्ऱ किया और बदकारी की हालत में मर गए
85 और उनके माल और उनकी औलाद तुम्हें ताज्जुब में न डाले अल्लाह तो बस ये चाहता है कि दुनिया में भी उनके माल और औलाद की बदौलत उनको अज़ाब में मुब्तिला करे और उनकी जान निकालने लगे तो उस वक़्त भी ये काफि़र रहें
86 और जब कोई सूरा इस बारे में नाजि़ल हुआ कि अल्लाह को मानों और उसके रसूल के साथ जिहाद करो तो जो उनमें से दौलत वाले हैं वह तुमसे इजाज़त मांगते हैं और कहते हैं कि हमें कि हम भी बैठने वालो के साथ रहें
87 ये इस बात से ख़ुश हैं कि पीछे रह जाने वालों रहें और उनके दिल पर मोहर कर दी गई तो ये कुछ नहीं समझतें
88 मगर रसूल और जो लोग उनके साथ ईमान लाए हैं उन लोगों ने अपने अपने माल और अपनी अपनी जानों से जिहाद किया- यही वह लोग हैं जिनके लिए भलाइयाँ हैं और यही लोग कामयाब होने वाले हैं
89 अल्लाह ने उनके वास्ते के वह बाग़ तैयार कर रखे हैं जिनके नीचे नहरे जारी हैं इसमें हमेशा रहेंगें यही तो बड़ी कामयाबी हैं
90 और कुछ हीला करने वाले गवार देहाती आ मौजदू हुए ताकि उनको भी इजाज़त दी जाए और जिन लोगों ने अल्लाह और उसके रसूल से झूठ कहा था वह बैठ रहे उनमें से जिन लोंगों ने कुफ्ऱ एख़्तेयार किया अनक़रीब ही उन पर दर्दनाक अज़ाब आ पहुँचेगा
91 न तो कमज़ोरों पर कुछ गुनाह है न बीमारों पर और न उन लोगों पर जो कुछ नहीं पाते कि ख़र्च करें बशर्ते कि ये लोग अल्लाह और उसके रसूल की ख़ैर ख़्वाही करें नेकी करने वालों पर कोई सबील नहीं और अल्लाह बड़ा बख़्शने वाला मेहरबान है
92 और न उन्हीं लोगों पर कोई इल्ज़ाम है जो तुम्हारे पास आए कि तुम उनके लिए सवारी बाहम पहुँचा दो और तुमने कहा कि मेरे पास मौजूद नहीं कि तुमको उस पर सवार करूँ तो वह लोग फिर गए और हसरत उसे उस ग़म में कि उन को ख़र्च मयस्सर न आया उनकी आँखों से आँसू जारी थे 93 सबील तो सिर्फ उन्हीं लोगों पर है जिन्होंने बावजूद मालदार होने के तुमसे न जाने की इजाज़त चाही और उनके पीछे रह जाने वाले के साथ रहना पसन्द आया और अल्लाह ने उनके दिलों पर मोहर कर दी है तो ये लोग कुछ नहीं जानते
94 जब तुम उनके पास वापस आओगे तो ये तुमसे माअज़रत करेंगे तुम कह दो कि बातें न बनाओ हम हरगि़ज़ तुम्हारी बात न मानेंगे हमे तो अल्लाह ने तुम्हारे हालात से आगाह कर दिया है अनक़ीरब अल्लाह और उसका रसूल तुम्हारी कारस्तानी को मुलाहज़ा फरमाएगें फिर तुम ज़ाहिर व बातिन के जानने वालों की हुज़ूरी में लौटा दिए जाओगे तो जो कुछ तुम करते थे बता देगा
95 जब तुम उनके पास वापस आओगे तो तुम्हारे सामने अल्लाह की क़समें खाएगें ताकि तुम उनसे दरगुज़र करो तो तुम उनकी तरफ से मुँह फेर लो बेशक ये लोग नापाक हैं और उनका ठिकाना जहन्नुम है सज़ा है उसकी जो ये किया करते थे” रसूल राज़ी भी हो जाएँ अल्लाह राज़ी नहीं होगा
“96 तुम्हारे सामने ये लोग क़समें खाते हैं ताकि तुम उनसे राज़ी हो जाओ तो अल्लाह बदकार लोगों से हरगिज़ कभी राज़ी नहीं होगा
97 एअराब कुफ्र व निफाक़ में बड़े सख़्त हैं और इसी क़ाबिल हैं कि जो किताब अल्लाह ने अपने रसूल पर नाजि़ल फरमाई है उसके एहक़ाम न जानें और अल्लाह तो बड़ा दाना हकीम है
98 और कुछ एअराब राह में खर्च करते हैं उसे तावान समझते हैं और तुम्हारे हक़ में गर्दिशों के मुन्तजि़र हैं उन्हीं पर बुरी गर्दिश पड़े और अल्लाह तो सब कुछ सुनता जानता है
99 और कुछ एअराब ऐसे भी हैं जो अल्लाह और आखि़रत पर ईमान रखते हैं और जो कुछ खर्च करते है उसे अल्लाह की नज़दीकी और रसूल की दुआओं का ज़रिया समझते हैं आगाह रहो वाक़ई ये ज़रूर उनके तक़र्रुब का बाइस है अल्लाह उन्हें बहुत जल्द अपनी रहमत में दाखि़ल करेगा बेशक अल्लाह बड़ा बख़्शने वाला मेहरबान है
100 और मुहाजिरीन व अन्सार में से सबक़त करने वाले और वह लोग जिन्होंने नेक नीयती से उनका साथ दिया अल्लाह उनसे राज़ी और वह अल्लाह से ख़ुश और उनके वास्ते अल्लाह ने बाग़ जिन के नीचे नहरें जारी हैं तैयार कर रखे हैं वह हमेशा अब्दआलाबाद तक उनमें रहेगें यही तो बड़ी कामयाबी हैं
101 एअराब में से बाज़ मुनाफिक़ हैं और ख़ुद मदीने के रहने वालों मे से भी जो निफ़ाक पर अड़ गए हैं तुम उन को नहीं जानते हम उनको जानते हैं अनक़रीब हम उनकी दोहरी सज़ा करेगें फिर ये लोग एक बड़े अज़ाब की तरफ लौटाए जाएगें
102 और कुछ लोग हैं जिन्होंने अपने गुनाहों का एकरार किया उन लोगों ने भले काम को और कुछ बुरे काम को मिला जुला कर दिया क़रीब है कि अल्लाह उनकी तौबा कु़बूल करे अल्लाह तो यक़ीनी बड़ा बख्शने वाला मेहरबान हैं
103 तुम उनके माल की ज़कात लो इसकी बदौलत उनको पाक साफ करों और उनके वास्ते दुआए ख़ैर करो क्योंकि तुम्हारी दुआ इन लोगों के हक़ में इत्मेनान और अल्लाह तो सुनता जानता है
104 क्या इन लोगों ने इतने भी नहीं जाना यक़ीनन अल्लाह बन्दों की तौबा क़़ुबूल करता है और वही ख़ैरातें लेता है और इसमें शक नहीं कि वही तौबा का बड़ा कु़बूल करने वाला मेहरबान है
105 और कह दो कि तुम लोग अपने अपने काम किए जाओ अभी तो अल्लाह और उसका रसूल और मोमिनीन तुम्हारे कामों को देखेगें और बहुत जल्द ज़ाहिर व बातिन के जानने वाले की तरफ लौटाए जाएगें तब वह जो कुछ भी तुम करते थे तुम्हें बता देगा
106 और कुछ लोग हैं जो हुक्मे अल्लाह के उम्मीदवार किए गए हैं ख़्वाह उन पर अज़ाब करे या उन पर मेहरबानी करे और अल्लाह बड़ा वाकिफकार हिकमत वाला है
107 और जिन्होने नुकसान पहुचाने और कुफ्ऱ करने वाले और मोमिनीन के दरम्यिान तफरक़ा डालते और उस शख़्स की घात में बैठने के वास्ते मस्जिद बनाकर खड़ी की है जो अल्लाह और उसके रसूल से पहले लड़ चुका है ज़रूर क़समें खाएगें कि हमने भलाई के सिवा कुछ और इरादा ही नहीं किया और अल्लाह ख़ुद गवाही देता है ये लोग यक़ीनन झूठे है 108 तुम इस में कभी खड़े भी न होना वह मस्जिद जिसकी बुनियाद अव्वल रोज़ से परहेज़गारी पर रखी गई है वह ज़रूर उसकी ज़्यादा हक़दार है कि तुम उसमें खडे़ होकर उसमें वह लोग हैं जो पाक व पाकीज़ा रहने को पसन्द करते हैं और अल्लाह भी पाक व पाकीज़ा रहने वालों को दोस्त रखता है
109 क्या जिसने अल्लाह के ख़ौफ और ख़ुशनूदी पर अपनी इमारत की बुनियाद डाली हो वह ज़्यादा अच्छा है या वह जिसने अपनी इमारत की बुनियाद इस बोदे किनारे के लब पर रखी हो जिसमें दरार पड़ चुकी हो और अगर वह चाहता हो फिर उसे ले दे के जहन्नुम की आग में फट पडे़ और अल्लाह ज़ालिम लोगों को मंजि़लें मक़सूद तक नहीं पहुचाया करता
110 बुनियाद जो उन लोगों ने क़ायम की उसके सबब से उनके दिलो में हमेशा धरपकड़ रहेगी यहाँ तक कि उनके दिलों के परख़चे उड़ जाएँ और अल्लाह तो बड़ा वाकि़फकार हकीम हैं
111 इसमें तो शक ही नहीं कि अल्लाह ने मोमिनीन से उनकी जानें और उनके माल इस बात पर ख़रीद लिए हैं कि उनके लिए बाग़ (जन्नत) है ये लोग अल्लाह की राह में लड़ते हैं तो मारते हैं और ख़ुद मारे जाते हैं पक्का वायदा है अल्लाह पर लाजि़म है और ऐसा पक्का है कि तौरैत और इन्जील और क़ुरान में और अपने एहद का पूरा करने वाला अल्लाह से बढ़कर कौन है तुम तो अपनी ख़रीद फरोख़्त से जो तुमने अल्लाह से की है खुशियाँ मनाओ यही तो बड़ी कामयाबी है
112 तौबा करने वाले इबादत गुज़ार हम्दो सना करने वाले सफर करने वाले रूकूउ करने वाले सजदा करने वाले नेक काम का हुक्म करने वाले और बुरे काम से रोकने वाले और अल्लाह की हदो को निगाह रखने वाले हैं और उन मोमिनीन को खुशखबरी दे दो
113 नबी और मोमिनीन पर जब ज़ाहिर हो चुका कि मुशरेकीन जहन्नुमी है तो उसके बाद मुनासिब नहीं कि उनके लिए मग़फिरत की दुआए माँगें अगरचे वह मुशरेकीन उनके क़राबतदार हो
114 और इबराहीम का अपने बाप के लिए मग़फिरत की दुआ माँगना सिर्फ इस वायदे की वजह से था जो उन्होंने अपने बाप से कर लिया था फिर जब उनको मालूम हो गया कि वह यक़ीनी अल्लाह का दुश्मन है तो उससे बेज़ार हो गए, बेशक इबराहीम यक़ीनन बड़े दर्दमन्द बुर्दबार थे
115 अल्लाह की ये शान नहीं कि किसी क़ौम को जब उनकी हिदायत कर चुका हो उसके बाद बेशक अल्लाह उन्हें गुमराह कर दे हता कि वह उन्हीं चीज़ों को बता दे जिससे वह परहेज़ करें बेशक अल्लाह हर चीज़ से है
116 इसमें तो शक ही नहीं कि सारे आसमान व ज़मीन की हुकूमत अल्लाह ही के लिए ख़ास है वही जिलाता है और मारता है और तुम लोगों का अल्लाह के सिवा न कोई सरपरस्त है न मददगार
117 अलबत्ता अल्लाह ने नबी और उन मुहाजिरीन अन्सार पर बड़ा फज़ल किया जिन्होंने तंगदस्ती के वक़्त रसूल का साथ दिया और वह भी उसके बाद कि क़रीब था कि उनमे से कुछ लोगों के दिल जगमगा जाएँ फिर अल्लाह ने उन पर फज़ल किया इसमें शक नहीं कि वह उन लोगों पर पड़ा तरस खाने वाला मेहरबान है
118 और उन तीनों पर जो यहाँ तक कि ज़मीन बावजूद उस वसअत के उन पर तंग हो गई और उनकी जानें उन पर तंग हो गई और उन लोगों ने समझ लिया कि अल्लाह के सिवा और कहीं पनाह की जगह नहीं फिर अल्लाह ने उनको तौबा की तौफीक दी ताकि वह रूजू करें बेशक अल्लाह ही बड़ा तौबा क़ुबूल करने वाला मेहरबान है
119 ऐ ईमान लाने वालों अल्लाह से डरो और सच्चों के साथ हो जाओ 120 मदीने के रहने वालों और उनके गिर्दोनवा के एअराब को ये जायज़ न था कि रसूल अल्लाह का साथ छोड़ दें और न ये कि रसूल की जान से बेपरवा होकर अपनी जानों के बचाने की फ्रिक करें ये हुक्म उसी सब्ब से था कि उन को अल्लाह की राह में जो तकलीफ़ प्यास की या मेहनत या भूख की शिद्दत की पहुँचती है या ऐसी राह चलते हैं जो कुफ़्फ़ार के ग़ैज़ हो तो बस उसके ऐवज़ में एक नेक काम लिख दिया जाएगा बेशक अल्लाह नेकी करने वालों का अज्र बरबाद नहीं करता है
121 और ये लोग थोड़ा या बहुत माल नहीं खर्च करते और किसी मैदान को नहीं क़तआ करते मगर फौरन उनके नाम लिख दिया जाता है ताकि अल्लाह उनकी कारगुज़ारियों का उन्हें अच्छे से अच्छा बदला अता फरमाए
122 और ये भी मुनासिब नहीं कि मोमिननि कुल के कुल निकल खड़े हों उनमें से हर गिरोह की एक जमाअत क्यों नहीं निकलती ताकि इल्मे दीन हासिल करे और जब अपनी क़ौम की तरफ पलट के आवे तो उनको डराए ताकि ये लोग डरें
123 ऐ इमान वालों कुफ्फार में से जो लोग तुम्हारे आस पास के है उन से लड़ों और चाहिए कि वह लोग तुम में करारापन महसूस करें और जान रखो कि बेशुबहा अल्लाह परहेज़गारों के साथ है 124 और जब कोई सूरा नाजि़ल किया गया तो उन मुनाफिक़ीन में से पूछता है कि भला इस सूरे ने तुममें से किसी का ईमान बढ़ा दिया तो जो लोग ईमान ला चुके हैं उनका तो इस सूरे ने ईमान बढ़ा दिया और वह वहा उसकी खुशियाँ मनाते है
125 मगर जिन लोगों के दिल में बीमारी है तो उन ख़बासत पर इस सूरो ने एक ख़बासत और बढ़ा दी और ये लोग कुफ्ऱ ही की हालत में मर गए
126 क्या वह लोग नहीं देखते कि हर साल एक मरतबा या दो मरतबा बला में मुबितला किए जाते हैं फिर भी न तो ये लोग तौबा ही करते हैं और न नसीहत ही मानते हैं
127 और जब कोई सूरा नाजि़ल किया गया तो उसमें से एक की तरफ एक देखने लगा तुम को देखता तो नहीं है फिर पलट जाते हैं अल्लाह ने उनके दिलों को पलट दिया है इस सबब से कि ये बिल्कुल नासमझ लोग हैं
128 लोगों तुम ही में से एक रसूल तुम्हारे पास आ चुका उस पर शाक़ है कि तुम तकलीफ उठाओ और उसे तुम्हारी भलाई का हौका है इमानदारो पर हद दर्जे शफीक़ मेहरबान हैं
129 ऐ रसूल अगर इस पर भी ये लोग मुँह फेरें तो तुम कह दो कि मेरे लिए अल्लाह काफी है उसके सिवा कोई माबूद नहीं मैने उस पर भरोसा रखा है वही अर्श का मालिक है (114) 110 सूरए अन नस्र
1 जब अल्लाह की मदद आ पहुचेंगी
2 तुम लोगों को देखोगे कि गोल के गोल अल्लाह के दीन में दाखि़ल हो रहे हैं
3 तो तुम अपने रब की तारीफ़ के साथ तसबीह करना और उसी से मग़फे़रत की दुआ माँगना वह बेशक बड़ा माफ़ करने वाला है
(113) 9 सूरए तौबा 1 अल्लाह और उसके रसूल की तरफ से उनसे बेज़ारी है जिन मुशरिकों से तुम लोगों ने सुलह का एहद किया था
2 तुम चार महीने रूए ज़मीन में सैरो सियाहत (घूम फिर) कर लो और ये समझ लो कि तुम अल्लाह को आजिज़ नहीं कर सकते और ये भी कि अल्लाह काफि़रों को ज़रूर रूसवा करके रहेगा
3 अल्लाह और उसके रसूल की तरफ से हज अकबर के दिन लोगों को ऐलान कि अल्लाह और उसका रसूल मुशरिकों से बरी है तो अगर तुम लोगों ने तौबा की तो तुम्हारे हक़ में यही बेहतर है और अगर तुम लोगों ने मुह मोड़ा तो समझ लो कि तुम लोग अल्लाह को हरगिज़ आजिज़ नहीं कर सकते और जिन लोगों ने कुफ्र इख़्तेयार किया उनको दर्दनाक अज़ाब की ख़ुश ख़बरी दे दो
4 सिवाय उनके जिन मुशरिकों से तुमने एहदो पैमान किया था फिर उन लोगों ने भी कभी कुछ तुमसे कमी नहीं की और न तुम्हारे मुक़ाबले में किसी की मदद की हो तो उनके एहद व पैमान को जितनी मुद्द्त के वास्ते मुक़र्रर किया है पूरा कर दो अल्लाह परहेज़गारों को यक़ीनन दोस्त रखता है
5 फिर जब हुरमत के चार महीने गुज़र जाएँ तो मुशरिको को जहाँ पाओ कत्ल करो और उनको गिरफ्तार कर लो और उनको कै़द करो और हर घात की जगह में उनकी ताक में बैठो फिर अगर वह लोग बाज़ आए और नमाज़ पढ़ने लगें और ज़कात दे तो उनकी राह छोड़ दो बेशक अल्लाह बड़ा बख़्शने वाला मेहरबान है
6 और अगर मुशरिकीन में से कोई तुमसे पनाह मागें तो उसको पनाह दो यहाँ तक कि वह अल्लाह का कलाम सुन ले फिर उसे उसकी अमन की जगह वापस पहुँचा दो ये इस वजह से कि ये लोग नादान हैं 7 मुशरिकीन का कोई एहदो पैमान अल्लाह के नज़दीक और उसके रसूल के नज़दीक क्योंकर रह सकता है मगर जिन लोगों से तुमने खानाए काबा के पास मुआहेदा किया था तो वह लोग तुमसे क़ायम रखना चाहें तो तुम भी उन से क़ायम रखो बेशक अल्लाह परहेज़ करने वालों को दोस्त रखता है
8 कैसे जब कि अगर तुम पर ग़लबा पा जाए तो तुम्हारे में न तो रिश्ते नाते ही का लिहाज़ करेगें और न अपने क़ौल व क़रार का ये लोग तुम्हें अपनी ज़बानी खुश कर देते हैं हालाँकि उनके दिल नहीं राज़ी हैं और उनमें के बहुतेरे तो बदचलन हैं 9 और उन लोगों ने अल्लाह की आयतों के बदले थोड़ी सी क़ीमत हासिल करके उसकी राह से रोक दिया बेशक ये लोग जो कुछ करते हैं ये बहुत ही बुरा है
10 ये लोग किसी मोमिन के बारे में न तो रिश्ता नाता ही कर लिहाज़ करते हैं और न क़ौल का क़रार का और यही लोग ज़्यादती करते हैं
11 तो अगर तौबा करें और नमाज़ पढ़ने लगें और ज़कात दें तो तुम्हारे दीनी भाई हैं और हम अपनी आयतों को वाकि़फकार लोगों के वास्ते तफ़सीलन बयान करते हैं 12 और अगर ये लोग एहद कर चुकने के बाद अपनी क़समें तोड़ डालें और तुम्हारे दीन में तुमको ताना दें तो तुम कुफ्र के इमामों से खूब लड़ाई करो उनकी क़समें कुछ नहीं ताकि ये लोग बाज़ आएँ
13 भला तुम उन लोगों से क्यों नहीं लड़ते जिन्होंने अपनी क़समों को तोड़ डाला और रसूल को निकाल बाहर करना ठान लिया था और तुमसे पहले छेड़ भी उन्होंने ही शुरू की थी क्या तुम उनसे डरते हो तो अगर तुम सच्चे ईमानदार हो तो अल्लाह उनसे कहीं बढ़ कर तुम्हारे डरने के क़ाबिल है
14 इनसे लड़ो अल्लाह तुम्हारे हाथों उनकी सज़ा करेगा और उन्हें रूसवा करेगा और तुम्हें उन पर फतेह अता करेगा और इमानदार लोगों के कलेजे ठन्डे करेगा
15 और दिल के क्रोध को दफ़ा कर देगा और अल्लाह जिसकी चाहे तौबा क़ुबूल करे और अल्लाह बड़ा वाकि़फकार हिकमत वाला है
16 क्या तुमने ये समझ लिया है कि तुम छोड़ दिए जाओगे और अभी तक तो अल्लाह ने उन लोगों को छांटा ही नहीं जो तुम में से जिहाद करते हैं और अल्लाह और उसके रसूल और मोमेनीन के सिवा किसी को अपना राज़दार दोस्त नहीं बनाते और जो कुछ भी तुम करते हो अल्लाह उससे बाख़बर है
17 मुशरेकीन का ये काम नहीं कि जब वह अपने कुफ्ऱ का ख़ुद इक़रार करते है तो अल्लाह की मस्जिदों को आबाद करे यही वह लोग हैं जिनका किया कराया सब अकारत हुआ और ये लोग हमेशा जहन्नुम में रहेंगे 18 अल्लाह की मस्जिदों को बस सिर्फ वहीं आबाद कर सकता है जो अल्लाह और रोजे़ आखि़रत पर ईमान लाए और नमाज़ पढ़ा करे और ज़कात देता रहे और अल्लाह के सिवा किसी से न डरो तो अनक़रीब यही लोग हिदायत याफ़्ता लोगों मे से हो जाएंगे 19 क्या तुम लोगों ने हाजियों को पानी पिलाने और मस्जिदुल हराम के रख-रखाव को उस के बराबर बना दिया है जो अल्लाह और रोज़े आख़ेरत के दिन पर ईमान लाया और अल्लाह के राह में जेहाद किया अल्लाह के नज़दीक तो ये लोग बराबर नहीं और अल्लाह ज़ालिम लोगों की हिदायत नहीं करता है
20 जिन लोगों ने ईमान क़़ुबूल किया और हिजरत एख़्तियार की और अपने मालों से और अपनी जानों से अल्लाह की राह में जिहाद किया वह लोग अल्लाह के नज़दीक दर्जें में कही बढ़ कर हैं और यही लोग फायज़ होने वाले हैं
21 उनका रब उनको अपनी मेहरबानी और ख़ुशनूदी और ऐसे बाग़ों की ख़ुशख़बरी देता है जिसमें उनके लिए दाइमी ऐश होगा 22 और ये लोग उन बाग़ों में हमेशा अब्दआलाबाद तक रहेंगे बेशक अल्लाह के पास तो बड़ा बड़ा अज्र है 23 ऐ ईमान लाने वालों अगर तुम्हारे माँ बाप और तुम्हारे भाई ईमान के मुक़ाबले कुफ्ऱ को तरजीह देते हो तो तुम उनको अपना वली न बनाओ और तुममें जो उन्हें वली बनाएगा तो यही लोग ज़ालिम है
24 कह दो तुम्हारे बाप दादा और तुम्हारे बेटे और तुम्हारे भाई बन्द और तुम्हारी बीबियाँ और तुम्हारे कुनबे वाले और वह माल जो तुमने कमा के रख छोड़ा हैं और वह तिजारत जिसके मन्द पड़ जाने का तुम्हें अन्देशा है और वह मकानात जिन्हें तुम पसन्द करते हो अगर तुम्हें अल्लाह से और उसके रसूल से और उसकी राह में जिहाद करने से ज़्यादा अज़ीज़ है तो तुम ज़रा ठहरो यहाँ तक कि अल्लाह अपना हुक्म मौजूद करे और अल्लाह नाफरमान लोगों की हिदायत नहीं करता
25 अल्लाह ने तुम्हारी बहुतेरे मक़ामात पर इमदाद की और जंग हुनैन के दिन जब तुम्हें अपनी क़सरत ने मग़रूर कर दिया था फिर वह क़सरत तुम्हें कुछ भी काम न आयी और ज़मीन बावजूद उस वसअत के तुम पर तंग हो गई तुम पीठ कर भाग निकले” इन आयतों को पढ़ कर लगता है कि पहली पीढ़ी के मुसलामानों में भी बेशतर कितने ज़लील फितरत लोग थे
“ 26 तब अल्लाह ने अपने रसूल पर और मोमिनीन पर अपनी तसकीन नाजि़ल फरमाई और लश्कर भेजे जिन्हें तुम देखते भी नहीं थे और कुफ़्फ़ार पर अज़ाब नाजि़ल फरमाया और काफिरों की यही सज़ा है
27 उसके बाद अल्लाह जिसकी चाहे तौबा क़ुबूल करे और अल्लाह बड़ा बख़्शने वाला मेहरबान है
28 ऐ ईमान लाने वालों मुशरेकीन तो निरे नजिस हैं तो अब वह उस साल के बाद मस्जिदुल हराम के पास फिर न आने पाएँ और अगर तुम फक़रों फाक़ा से डरते हो तो अनकरीब ही अल्लाह तुमको अगर चाहेगा तो अपने फज़ल से ग़नीकर देगा बेशक अल्लाह बड़ा वाकि़फकार हिकमत वाला है
29 एहले किताब में से जो लोग न तो अल्लाह ही पर इमान रखते हैं और न रोज़े आखि़रत पर और न अल्लाह और उसके रसूल की हराम की हुयी चीज़ों को हराम समझते हैं और न सच्चे दीन ही को एख़्तियार करते हैं उन लोगों से लड़े जाओ यहाँ तक कि वह जजि़या देने लगें
30 यहूद तो कहते हैं कि उजैर अल्लाह के बेटे हैं और नुसैरा कहते हैं कि मसीह अल्लाह के बेटे हैं ये तो उनकी बात है और उन्हीं के मुँह से ये लोग भी उन्हीं काफि़रों की सी बातें बनाने लगे जो उनसे पहले गुज़र चुके हैं अल्लाह की लानत - कहाँ से कहाँ भटके जा रहे हैं
31 उन लोगों ने तो अपने अल्लाह को छोड़कर अपनी आलिमों को और अपने ज़ाहिदों को और मरियम के बेटे मसीह को अपना रब बना डाला हालाकि उन्होनें सिवाए इसके और हुक्म ही नहीं दिया गया कि अल्लाह ए यकता की इबादत करें उसके सिवा कोई माबूद नहीं पाक है जिनसे वे शरीक बनाते हैं
32 ये लोग चाहते हैं कि अपने मुँह से अल्लाह के नूर को बुझा दें और अल्लाह नहीं करेगा सिवाय अपने नूर को पूरा करने के अगरचे कुफ़्फ़ार बुरा माना करें 33 वही तो है कि जिसने अपने रसूल को हिदायत और सच्चे दीन के साथ भेजा कि उसको तमाम दीनो पर ग़ालिब करे अगरचे मुशरेकीन बुरा माना करे आलिमों जाहिदों की करतूतें
34 ऐ ईमान लाने वालों इसमें उसमें शक नहीं कि बहुतेरे आलिम ज़ाहिद लेागों के मालेनाहक़ खा जाते है और अल्लाह की राह से रोकते हैं और जो लोग सोना और चाँदी जमा करते जाते हैं और उसको अल्लाह की राह में खर्च नहीं करते तो उन को दर्दनाक अज़ाब की ख़ुशखबरी सुना दो 35जहन्नुम की आग में गर्म किया जाएगा फिर उससे उनकी पेशानियाँ और उनके पहलू और उनकी पीठें दाग़ी जाएगी ये वह है जिसे तुमने अपने लिए जमा करके रखा था तो अपने जमा किए का मज़ा चखो
36 महीनों की गिनती बारह है अल्लाह की किताब में उसी दिन से जिस दिन आसमान व ज़मीन को पैदा किया उनमें से चार महीने हुरमत के हैं यही दीन सीधी राह है इन में तुम अपने ऊपर ज़़ुल्म न करो I और लड़ो मुशरेकीन से एक साथ मिल कर जिस तरह तुम से सबके सब मिलकर लड़ते हैं ये जान लो कि अल्लाह तो यक़ीनन परहेज़गारों के साथ है
37 महीनों का आगे पीछे कर देना भी कुफ्ऱ ही की ज़्यादती है कि उनकी बदौलत कुफ़्फ़ार बहक जाते हैं एक बरस तो उसी एक महीने को हलाल समझ लेते हैं और दूसरे साल उसी महीने को हराम कहते हैं ताकि अल्लाह ने जो हराम किए हैं उनकी गिनती ही पूरी कर लें और अल्लाह की हराम की हुयी चीज़ को हलाल कर लें उनकी बुरी कारस्तानिया उन्हें भली कर दिखाई गई हैं और अल्लाह काफिर लोगो को मंजि़ले मक़सूद तक नहीं पहुँचाया करता पहली पीढ़ी के मुसलामानों का हाल
38 ऐ ईमान लाने वालों तुम्हें क्या हो गया है कि जब तुमसे कहा जाता है कि अल्लाह की राह में निकलो तो तुम लदधड़ हो कर ज़मीन की तरफ झुके पड़ते हो क्या तुम आखि़रत के बनिस्बत दुनिया की जिन्दगी को पसन्द करते थे तो दुनिया की जि़न्दगी का साज़ो सामान ऐश व आराम के मुक़ाबले में बहुत ही थोड़ा है
39 अगर तुम न निकलोगे तो अल्लाह तुम पर दर्दनाक अज़ाब नाजि़ल फरमाएगा और तुम्हारे बदले किसी दूसरी क़ौम को ले आएगा और तुम उसका कुछ भी बिगाड़ नहीं सकते और अल्लाह हर चीज़ पर क़ादिर है
40 अगर तुम उस रसूल की मदद न करोगे तो उसने तो अपने रसूल की उस वक़्त मदद की जब उसकी कुफ़्फ़ार ने निकल बाहर किया उस वक़्त सिर्फ दो में दूसरे रसूल थे जब वह दोनो ग़ार में थे जब अपने साथी को समझा रहे थे कि घबराओ नहीं अल्लाह यक़ीनन हमारे साथ है तो अल्लाह ने उन पर अपनी तसकीन नाजि़ल फरमाई और ऐसे लश्कर से उनकी मदद की जिनको तुम लोगों ने देखा तक नहीं और अल्लाह ने काफिरों की बात नीची कर दिखाई और अल्लाह ही का बोल बाला है और अल्लाह तो ग़ालिब हिकमत वाला है
41 तुम हलके फुलके हो या भारी भरकम बहर हाल जब तुमको हुक्म दिया जाए फौरन चल खड़े हो और अपनी जानों से अपने मालों से अल्लाह की राह में जिहाद करो अगर तुम समझ लो कि यही तुम्हारे हक़ में बेहतर है
42 अगर सरे दस्त फ़ायदा और सफर आसान होता तो यक़ीनन ये लोग तुम्हारा साथ देते मगर इन पर मुसाफ़त की मशक़क़त तूलानी हो गई और अगर पीछे रह जाने की वज़ह से पूछोगे तो ये लोग फौरन अल्लाह की क़समें खाएगें कि अगर हम में सकत होती तो हम भी ज़रूर तुम लोगों के साथ ही चल खड़े होते ये लोग झूठी कसमें खाकर अपनी जान आप हलाक किए डालते हैं और अल्लाह तो जानता है कि ये लोग बेशक झूठे हैं
43 अल्लाह तुमसे दरगुज़र फरमाए तुमने उन्हें इजाज़त ही क्यों दी ताकि अगर ऐसा न करते तो तुम पर सच बोलने वाले ज़ाहिर हो जाते और तुम झूटों को मालूम कर लेते
44 जो लोग अल्लाह और रोज़े आखि़रत पर ईमान रखते हैं वह तो अपने माल से और अपनी जानों से जिहाद करने से कोई छूट नहीं मागते और अल्लाह परहेज़गारों से खूब वाकि़फ है
45 छूट तो बस वही लोग मागेंगे जो अल्लाह और रोजे़ आखि़रत पर ईमान नहीं रखते और उनके दिल में शक है तो वह अपने शक में डावा डोल हो रहे हैं
46 और अगर ये लोग निकलने की ठान लेते तो कुछ तैय्यारी तो करते मगर अल्लाह ने उनके साथ भेजने को नापसन्द किया तो उनको रोक दिया और उनसे कह दिया गया कि तुम बैठने वालों के साथ बैठे रहो
47 अगर ये लोग तुममें निकलते भी तो बस तुममे फ़साद ही बरपा कर देते और तुम्हारे हक़ में फि़तना कराने की ग़रज़ से तुम्हारे दरम्यिान घोड़े दौड़ाते फिरते और तुममें से उनके जासूस भी हैं और अल्लाह शरीरों से ख़ूब वाकि़फ़ 48 इसमें तो शक नहीं कि उन लोगों ने पहले ही फ़साद डालना चाहा था और तुम्हारी बहुत सी बातें उलट पुलट के यहा तक कि हक़ आ पहुचा और अल्लाह ही का हुक्म ग़ालिब रहा और उनको नागवार ही रहा” यह जिन लोगों की बात हो रही है वे कोई थोड़े से और कमज़ोर मामूली मुसलमान नहीं हैं इतनी आयतों में इनका ज़िक्र इसी लिए है कि यह कसीर तादाद में साहिबे हैसियत लोग थे – यही वे लोग हैं जो आज भी इस्लाम पर काबिज़ हैं I
49 उन लोगों में से बाज़ ऐसे भी हैं जो साफ कहते हैं कि मुझे तो इजाज़त दीजिए और मुझ बला में न फॅसाइए I आगाह हो कि ये लोग खुद बला में गिर पड़े और जहन्नुम तो काफिरों का यक़ीनन घेरे हुए ही हैं
50 तुमको कोई फायदा पहुचा तो उन को बुरा मालूम होता है और अगर तुम पर कोई मुसीबत आ पड़ती तो ये लोग कहते हैं कि हमने अपना काम पहले ही ठीक कर लिया था और ख़ुश वापस लौटतें है
51 तुम कह दो कि हम पर हरगिज़ कोई मुसीबत पड़ नही सकती मगर जो अल्लाह ने लिख दिया है वही हमारा मालिक है और ईमान लाने वालों को चाहिए भी कि अल्लाह ही पर भरोसा रखें 52 तुम मुनाफिकों से कह दो कि तुम तो हमारे वास्ते दो भलाइयों में से एक के ख़्वाह मख़्वाह मुन्तजि़र ही हो और हम तुम्हारे वास्ते उसके मुन्तजि़र हैं कि अल्लाह तुम पर अपने ही से कोई अज़ाब नाजि़ल करे या हमारे हाथों से फिर तुम भी इन्तेज़ार करो हम भी तुम्हारे साथ इन्तेज़ार करते हैं
53 कह दो कि तुम लोग ख़्वाह ख़ुशी से खर्च करो या मजबूरी से तुम्हारी ख़ैरात तो कभी कु़बूल की नहीं जाएगी तुम यक़ीनन बदकार लोग हो
54 और उनकी ख़ैरात के क़ुबूल किए जाने में और कोई वजह मायने नहीं मगर यही कि उन लोगों ने अल्लाह और उसके रसूल की नाफ़रमानी की और नमाज़ को आते भी हैं तो अलकसाए हुए और अल्लाह की राह में खर्च करते भी हैं तो बे दिली से
55 तुम को न तो उनके माल हैरत में डाले और न उनकी औलाद अल्लाह तो ये चाहता है कि उनको आल व माल की वजह से दुनिया की जि़न्दगी में मुबितलाए अज़ाब करे और जब उनकी जानें निकलें तब भी वह काफिर रहें
56 और ये लोग अल्लाह की क़सम खाएगें फिर वह तुममें ही के हैं हालाकि वह लोग तुममें के नहीं हैं मगर हैं ये लोग बुज़दिल हैं
57 गर कहीं ये लोग पनाह की जगह या ग़ार या घुस बैठने की कोई जगह पा जाए तो उसी तरफ रस्सियाँ तोड़ाते हुए भाग जाएँ” रसूल पर नाइंसाफी का इल्ज़ाम
58 उनमें से कुछ तो ऐसे भी हैं जो तुम्हें ख़ैरात में इल्ज़ाम देते हैं फिर अगर उनमे से कुछ दे दिया गया तो खुश हो गए और अगर उसमें से उन्हें कुछ नहीं दिया गया तो बस फौरन ही बिगड़ बैठे
59 और जो कुछ अल्लाह ने और उसके रसूल ने उनको अता फरमाया था अगर ये लोग उस पर राज़ी रहते और कहते कि अल्लाह हमारे वास्ते काफी है अनक़रीब ही अल्लाह हमें अपने फज़ल व करम से उसका रसूल दे ही देगा हम तो यक़ीनन अल्लाह ही की तरफ लौ लगाए बैठे हैं
60 ख़ैरात तो बस ख़ास फकीरों का हक़ है और मोहताजों का और उस के कारिन्दों का और जिनकी तालीफ़ क़लब की गई है और गर्दनों को छुड़ाने मे और क़र्ज़दारों का और अल्लाह की राह में और परदेसियों की किफ़ालत में ख़र्च करना चाहिए ये हुकूक़ अल्लाह की तरफ से मुक़र्रर किए हुए हैं और अल्लाह बड़ा वाकि़फ कार हिकमत वाला है रसूल को कान कहने वाले
61 और उसमें से बाज़ ऐसे भी हैं जो रसूल को सताते हैं और कहते हैं कि बस ये कान ही हैं तुम कह दो कि तुम्हारी भलाई सुनने के कान हैं कि अल्लाह पर ईमान रखते हैं और मोमिनीन का यक़ीन रखते हैं और तुममें से जो लोग ईमान ला चुके हैं उनके लिए रहमत और जो लोग रसूले अल्लाह को सताते हैं उनके लिए दर्दनाक अज़ाब हैं
62 ये लोग तुम्हारे सामने अल्लाह की क़समें खाते हैं ताकि तुम्हें राज़ी कर ले हालाकि अगर ये लोग सच्चे ईमानदार है तो अल्लाह और उसका रसूल कहीं ज़्यादा हक़दार है कि उसको राज़ी रखें 63 क्या ये लोग ये भी नहीं जानते कि जिसने अल्लाह और उसके रसूल की मुख़ालेफ़त की तो इसमें शक ही नहीं कि उसके लिए जहन्नुम की आग है जिसमें वह हमेशा रहेगा यही तो बड़ी रूसवाई है 64 मुनाफे़क़ीन इस बात से डरतें हैं कि कोई सूरा नाजि़ल हो जाए जो उनको जो कुछ उनके दिल में है बता दे तुम कह दो कि तुम मसख़रापन किए जाओ
जिससे तुम डरते हो अल्लाह उसे ज़रूर ज़ाहिर कर देगा 65 और अगर तुम उनसे पूछो तो ज़रूर यूही कहेगें कि हम तो यूही हंसी मज़ाक कर रहे थे तुम कहो कि क्या तुम अल्लाह से और उसकी आयतों से और उसके रसूल से हॅसी कर रहे थे
66 अब बातें न बनाओं हक़ तो ये हैं कि तुम ईमान लाने के बाद काफि़र हो बैठे अगर हम तुममें से कुछ लोगों से दरगुज़र भी करें तो हम कुछ लोगों को सज़ा ज़रूर देगें इस वजह से कि ये लोग कुसूरवार ज़रूर हैं” कुछ औरतें भी निफ़ाक़ पर थीं
“67 मुनाफिक़ मर्द और मुनाफिक़ औरतें एक दूसरे के बाहम जिन्स हैं कि बुरे काम का तो हुक्म करते हैं और नेक कामों से रोकते हैं और अपने हाथ बन्द रखते हैं ये लोग अल्लाह को भूल बैठे तो अल्लाह ने भी उन्हें भुला दिया बेशक मुनाफि़क़ बदचलन है
68 मुनाफिक़ मर्द और मुनाफिक़ औरतें और काफिरों से अल्लाह ने जहन्नुम की आग का वायदा तो कर लिया है कि ये लोग हमेशा उसी में रहेगें और यही उन के लिए काफ़ी है और अल्लाह ने उन पर लानत की है और उन्हीं के लिए दाइमी अज़ाब है
69 उनकी मसल है जो तुमसे पहले थे वह लोग तुमसे कू़वत में ज़्यादा थे और औलाद में कही बढ़ कर तो वह अपने हिस्से से भी फ़ायदा उठा हो चुके तो जिस तरह तुम से पहले लोग अपने हिस्से से फायदा उठा चुके हैं इसी तरह तुम ने अपने हिस्से से फायदा उठा लिया और जिस तरह वह बातिल में घुसे रहे उसी तरह तुम भी घुसे रहे ये वह लोग हैं जिन का सब किया धरा दुनिया और आखि़रत में अकारत हुआ और यही लोग घाटे में हैं
70 क्या इन मुनाफिक़ों को उन लोगों की ख़बर नहीं पहुँची है जो उनसे पहले हो गुज़रे हैं नूह की क़ौम और आद और समूद और इबराहीम की क़ौम और मदियन वाले और उलटी हुयी बस्तियों के रहने वाले कि उनके पास उनके रसूल वाजेए मौजिज़े लेाकर आए तो और अल्लाह ने उन पर जुल्म नहीं किया मगर ये लोग ख़ुद अपने ऊपर जुल्म करते थे
71 और ईमान वाले मर्द और ईमान वाली औरते उनमें से बाज़ के बाज़ रफीक़ है और नामज़ पाबन्दी से पढ़ते हैं और ज़कात देते हैं और अल्लाह और उसके रसूल की फरमाबरदारी करते हैं यही लोग हैं जिन पर अल्लाह अनक़रीब रहम करेगा बेशक अल्लाह ग़ालिब हिकमत वाला है
72 अल्लाह ने ईमान वाले मर्दों और ईमान वाली औरतों से उन बाग़ों का वायदा कर लिया है जिनके नीचे नहरें जारी हैं और वह उनमें हमेशा रहेगें और बाग़ो में उम्दा उम्दा मकानात का और अल्लाह की ख़़ुशनूदी उन सबसे बालातर है- यही तो बड़ी कामयाबी है
73 ऐ रसूल कुफ़्फ़ार के साथ और मुनाफिकों के साथ जिहाद करो और उन पर सख़्ती करो और उनका ठिकाना तो जहन्नुम ही है और वह बुरी जगह है
74 ये मुनाफे़क़ीन अल्लाह की क़समें खाते है कि नहीं कही हालाकि उन लोगों ने कुफ्ऱ का कलमा ज़रूर कहा और अपने इस्लाम के बाद काफिर हो गए और जिस बात पर क़ाबू न पा सके उसे ठान बैठे और उन लोगें ने सिर्फ इस वजह से अदावत की कि अपने फज़ल व करम से अल्लाह और उसके रसूल ने दौलत मन्द बना दिया है तो उनके लिए उसमें ख़ैर है कि ये लोग अब भी तौबा कर लें और अगर ये न मानेगें तो अल्लाह उन पर दुनिया और आखि़रत में दर्दनाक अज़ाब नाजि़ल फरमाएगा और तमाम दुनिया में उन का न कोई हामी होगा और न मददगार
75 और इन में से बाज़ ऐसे भी हैं जो अल्लाह से क़ौल क़रार कर चुके थे कि अगर हमें अपने फज़ल से देगा तो हम ज़रूर ख़ैरात किया करेगें और नेकोकार बन्दे हो जाएगें
76 तो जब अल्लाह ने अपने फज़ल से उन्हें अता फरमाया-तो लगे उसमें बुख़्ल करने और कतराकर मुह फेरने
77 फिर उनसे उनके ख़ामयाजे़ में अपनी मुलाक़ात के दिन तक उनके दिल में निफाक डाल दिया इस वजह से उन लोगों ने जो अल्लाह से वायदा किया था उसके खि़लाफ किया और इस वजह से कि झूठ बोला करते थे
78 क्या वह लोग इतना भी न जानते थे कि अल्लाह सारे भेद और उनकी सरगोशी जानता है और ये कि ग़ैब की बातों से ख़ूब आगाह है
79 जो लोग दिल खोलकर ख़ैरात करने वाले मोमिनीन पर और उन मोमिनीन पर जो सिर्फ अपनी मशक्कत की मज़दूरी पाते इल्ज़ाम लगाते हैं फिर उनसे मसख़रापन करते तो अल्लाह भी उन से मसख़रापन करेगा और उनके लिए दर्दनाक अज़ाब है” रसूल की दुआ भी काम न आएगी
80 ख़्वाह तुम उन के लिए मग़फिरत की दुआ मागों या उनके लिए मग़फिरत की दुआ न मागों तुम उनके लिए सत्तर बार भी बखि़्शश की दुआ मांगोगे तो भी अल्लाह उनको हरगिज़ न बख़्शेगा ये इस सबब से है कि उन लोगों ने अल्लाह और उसके रसूल के साथ कुफ्र किया और अल्लाह बदकार लोगों को मंजि़लें मकसूद तक नहीं पहुँचाया करता
81 रसूले अल्लाह के पीछे रह जाने वाले अपनी जगह बैठ रहने से ख़ुश हुए और अपने माल और आपनी जानों से अल्लाह की राह में जिहाद करना उनको मकरू मालूम हुआ और कहने लगे गर्मी में न निकलो तुम कह दो कि जहन्नुम की आग उससे कहीं ज़्यादा गर्म है
82 अगर वह कुछ समझें जो कुछ वह किया करते थे उसके बदले उन्हें चाहिए कि वह बहुत कम हॅसें और बहुत रोएँ
83 तो अगर अल्लाह तुम इन मुनाफेक़ीन के किसी गिरोह की तरफ वापस लाए फिर तुमसे निकलने की इजाज़त माँगें तो तुम साफ़ कह दो कि तुम मेरे साथ हरगिज़ न निकलने पाओगे और न हरगिज़ दुश्मन से मेरे साथ लड़ने पाओगे जब तुमने पहली मरतबा बैठे रहना पसन्द किया तो पीछे रह जाने वालों के साथ बैठे रहो
84 और उन मुनाफिक़ीन में से जो मर जाए तो कभी ना किसी पर नमाजे़ जनाज़ा पढ़ना और न उसकी क़ब्र पर खडे़ होना इन लोगों ने यक़ीनन अल्लाह और उसके रसूल के साथ कुफ्ऱ किया और बदकारी की हालत में मर गए
85 और उनके माल और उनकी औलाद तुम्हें ताज्जुब में न डाले अल्लाह तो बस ये चाहता है कि दुनिया में भी उनके माल और औलाद की बदौलत उनको अज़ाब में मुब्तिला करे और उनकी जान निकालने लगे तो उस वक़्त भी ये काफि़र रहें
86 और जब कोई सूरा इस बारे में नाजि़ल हुआ कि अल्लाह को मानों और उसके रसूल के साथ जिहाद करो तो जो उनमें से दौलत वाले हैं वह तुमसे इजाज़त मांगते हैं और कहते हैं कि हमें कि हम भी बैठने वालो के साथ रहें
87 ये इस बात से ख़ुश हैं कि पीछे रह जाने वालों रहें और उनके दिल पर मोहर कर दी गई तो ये कुछ नहीं समझतें
88 मगर रसूल और जो लोग उनके साथ ईमान लाए हैं उन लोगों ने अपने अपने माल और अपनी अपनी जानों से जिहाद किया- यही वह लोग हैं जिनके लिए भलाइयाँ हैं और यही लोग कामयाब होने वाले हैं
89 अल्लाह ने उनके वास्ते के वह बाग़ तैयार कर रखे हैं जिनके नीचे नहरे जारी हैं इसमें हमेशा रहेंगें यही तो बड़ी कामयाबी हैं
90 और कुछ हीला करने वाले गवार देहाती आ मौजदू हुए ताकि उनको भी इजाज़त दी जाए और जिन लोगों ने अल्लाह और उसके रसूल से झूठ कहा था वह बैठ रहे उनमें से जिन लोंगों ने कुफ्ऱ एख़्तेयार किया अनक़रीब ही उन पर दर्दनाक अज़ाब आ पहुँचेगा
91 न तो कमज़ोरों पर कुछ गुनाह है न बीमारों पर और न उन लोगों पर जो कुछ नहीं पाते कि ख़र्च करें बशर्ते कि ये लोग अल्लाह और उसके रसूल की ख़ैर ख़्वाही करें नेकी करने वालों पर कोई सबील नहीं और अल्लाह बड़ा बख़्शने वाला मेहरबान है
92 और न उन्हीं लोगों पर कोई इल्ज़ाम है जो तुम्हारे पास आए कि तुम उनके लिए सवारी बाहम पहुँचा दो और तुमने कहा कि मेरे पास मौजूद नहीं कि तुमको उस पर सवार करूँ तो वह लोग फिर गए और हसरत उसे उस ग़म में कि उन को ख़र्च मयस्सर न आया उनकी आँखों से आँसू जारी थे 93 सबील तो सिर्फ उन्हीं लोगों पर है जिन्होंने बावजूद मालदार होने के तुमसे न जाने की इजाज़त चाही और उनके पीछे रह जाने वाले के साथ रहना पसन्द आया और अल्लाह ने उनके दिलों पर मोहर कर दी है तो ये लोग कुछ नहीं जानते
94 जब तुम उनके पास वापस आओगे तो ये तुमसे माअज़रत करेंगे तुम कह दो कि बातें न बनाओ हम हरगि़ज़ तुम्हारी बात न मानेंगे हमे तो अल्लाह ने तुम्हारे हालात से आगाह कर दिया है अनक़ीरब अल्लाह और उसका रसूल तुम्हारी कारस्तानी को मुलाहज़ा फरमाएगें फिर तुम ज़ाहिर व बातिन के जानने वालों की हुज़ूरी में लौटा दिए जाओगे तो जो कुछ तुम करते थे बता देगा
95 जब तुम उनके पास वापस आओगे तो तुम्हारे सामने अल्लाह की क़समें खाएगें ताकि तुम उनसे दरगुज़र करो तो तुम उनकी तरफ से मुँह फेर लो बेशक ये लोग नापाक हैं और उनका ठिकाना जहन्नुम है सज़ा है उसकी जो ये किया करते थे” रसूल राज़ी भी हो जाएँ अल्लाह राज़ी नहीं होगा
“96 तुम्हारे सामने ये लोग क़समें खाते हैं ताकि तुम उनसे राज़ी हो जाओ तो अल्लाह बदकार लोगों से हरगिज़ कभी राज़ी नहीं होगा
97 एअराब कुफ्र व निफाक़ में बड़े सख़्त हैं और इसी क़ाबिल हैं कि जो किताब अल्लाह ने अपने रसूल पर नाजि़ल फरमाई है उसके एहक़ाम न जानें और अल्लाह तो बड़ा दाना हकीम है
98 और कुछ एअराब राह में खर्च करते हैं उसे तावान समझते हैं और तुम्हारे हक़ में गर्दिशों के मुन्तजि़र हैं उन्हीं पर बुरी गर्दिश पड़े और अल्लाह तो सब कुछ सुनता जानता है
99 और कुछ एअराब ऐसे भी हैं जो अल्लाह और आखि़रत पर ईमान रखते हैं और जो कुछ खर्च करते है उसे अल्लाह की नज़दीकी और रसूल की दुआओं का ज़रिया समझते हैं आगाह रहो वाक़ई ये ज़रूर उनके तक़र्रुब का बाइस है अल्लाह उन्हें बहुत जल्द अपनी रहमत में दाखि़ल करेगा बेशक अल्लाह बड़ा बख़्शने वाला मेहरबान है
100 और मुहाजिरीन व अन्सार में से सबक़त करने वाले और वह लोग जिन्होंने नेक नीयती से उनका साथ दिया अल्लाह उनसे राज़ी और वह अल्लाह से ख़ुश और उनके वास्ते अल्लाह ने बाग़ जिन के नीचे नहरें जारी हैं तैयार कर रखे हैं वह हमेशा अब्दआलाबाद तक उनमें रहेगें यही तो बड़ी कामयाबी हैं
101 एअराब में से बाज़ मुनाफिक़ हैं और ख़ुद मदीने के रहने वालों मे से भी जो निफ़ाक पर अड़ गए हैं तुम उन को नहीं जानते हम उनको जानते हैं अनक़रीब हम उनकी दोहरी सज़ा करेगें फिर ये लोग एक बड़े अज़ाब की तरफ लौटाए जाएगें
102 और कुछ लोग हैं जिन्होंने अपने गुनाहों का एकरार किया उन लोगों ने भले काम को और कुछ बुरे काम को मिला जुला कर दिया क़रीब है कि अल्लाह उनकी तौबा कु़बूल करे अल्लाह तो यक़ीनी बड़ा बख्शने वाला मेहरबान हैं
103 तुम उनके माल की ज़कात लो इसकी बदौलत उनको पाक साफ करों और उनके वास्ते दुआए ख़ैर करो क्योंकि तुम्हारी दुआ इन लोगों के हक़ में इत्मेनान और अल्लाह तो सुनता जानता है
104 क्या इन लोगों ने इतने भी नहीं जाना यक़ीनन अल्लाह बन्दों की तौबा क़़ुबूल करता है और वही ख़ैरातें लेता है और इसमें शक नहीं कि वही तौबा का बड़ा कु़बूल करने वाला मेहरबान है
105 और कह दो कि तुम लोग अपने अपने काम किए जाओ अभी तो अल्लाह और उसका रसूल और मोमिनीन तुम्हारे कामों को देखेगें और बहुत जल्द ज़ाहिर व बातिन के जानने वाले की तरफ लौटाए जाएगें तब वह जो कुछ भी तुम करते थे तुम्हें बता देगा
106 और कुछ लोग हैं जो हुक्मे अल्लाह के उम्मीदवार किए गए हैं ख़्वाह उन पर अज़ाब करे या उन पर मेहरबानी करे और अल्लाह बड़ा वाकिफकार हिकमत वाला है
107 और जिन्होने नुकसान पहुचाने और कुफ्ऱ करने वाले और मोमिनीन के दरम्यिान तफरक़ा डालते और उस शख़्स की घात में बैठने के वास्ते मस्जिद बनाकर खड़ी की है जो अल्लाह और उसके रसूल से पहले लड़ चुका है ज़रूर क़समें खाएगें कि हमने भलाई के सिवा कुछ और इरादा ही नहीं किया और अल्लाह ख़ुद गवाही देता है ये लोग यक़ीनन झूठे है 108 तुम इस में कभी खड़े भी न होना वह मस्जिद जिसकी बुनियाद अव्वल रोज़ से परहेज़गारी पर रखी गई है वह ज़रूर उसकी ज़्यादा हक़दार है कि तुम उसमें खडे़ होकर उसमें वह लोग हैं जो पाक व पाकीज़ा रहने को पसन्द करते हैं और अल्लाह भी पाक व पाकीज़ा रहने वालों को दोस्त रखता है
109 क्या जिसने अल्लाह के ख़ौफ और ख़ुशनूदी पर अपनी इमारत की बुनियाद डाली हो वह ज़्यादा अच्छा है या वह जिसने अपनी इमारत की बुनियाद इस बोदे किनारे के लब पर रखी हो जिसमें दरार पड़ चुकी हो और अगर वह चाहता हो फिर उसे ले दे के जहन्नुम की आग में फट पडे़ और अल्लाह ज़ालिम लोगों को मंजि़लें मक़सूद तक नहीं पहुचाया करता
110 बुनियाद जो उन लोगों ने क़ायम की उसके सबब से उनके दिलो में हमेशा धरपकड़ रहेगी यहाँ तक कि उनके दिलों के परख़चे उड़ जाएँ और अल्लाह तो बड़ा वाकि़फकार हकीम हैं
111 इसमें तो शक ही नहीं कि अल्लाह ने मोमिनीन से उनकी जानें और उनके माल इस बात पर ख़रीद लिए हैं कि उनके लिए बाग़ (जन्नत) है ये लोग अल्लाह की राह में लड़ते हैं तो मारते हैं और ख़ुद मारे जाते हैं पक्का वायदा है अल्लाह पर लाजि़म है और ऐसा पक्का है कि तौरैत और इन्जील और क़ुरान में और अपने एहद का पूरा करने वाला अल्लाह से बढ़कर कौन है तुम तो अपनी ख़रीद फरोख़्त से जो तुमने अल्लाह से की है खुशियाँ मनाओ यही तो बड़ी कामयाबी है
112 तौबा करने वाले इबादत गुज़ार हम्दो सना करने वाले सफर करने वाले रूकूउ करने वाले सजदा करने वाले नेक काम का हुक्म करने वाले और बुरे काम से रोकने वाले और अल्लाह की हदो को निगाह रखने वाले हैं और उन मोमिनीन को खुशखबरी दे दो
113 नबी और मोमिनीन पर जब ज़ाहिर हो चुका कि मुशरेकीन जहन्नुमी है तो उसके बाद मुनासिब नहीं कि उनके लिए मग़फिरत की दुआए माँगें अगरचे वह मुशरेकीन उनके क़राबतदार हो
114 और इबराहीम का अपने बाप के लिए मग़फिरत की दुआ माँगना सिर्फ इस वायदे की वजह से था जो उन्होंने अपने बाप से कर लिया था फिर जब उनको मालूम हो गया कि वह यक़ीनी अल्लाह का दुश्मन है तो उससे बेज़ार हो गए, बेशक इबराहीम यक़ीनन बड़े दर्दमन्द बुर्दबार थे
115 अल्लाह की ये शान नहीं कि किसी क़ौम को जब उनकी हिदायत कर चुका हो उसके बाद बेशक अल्लाह उन्हें गुमराह कर दे हता कि वह उन्हीं चीज़ों को बता दे जिससे वह परहेज़ करें बेशक अल्लाह हर चीज़ से है
116 इसमें तो शक ही नहीं कि सारे आसमान व ज़मीन की हुकूमत अल्लाह ही के लिए ख़ास है वही जिलाता है और मारता है और तुम लोगों का अल्लाह के सिवा न कोई सरपरस्त है न मददगार
117 अलबत्ता अल्लाह ने नबी और उन मुहाजिरीन अन्सार पर बड़ा फज़ल किया जिन्होंने तंगदस्ती के वक़्त रसूल का साथ दिया और वह भी उसके बाद कि क़रीब था कि उनमे से कुछ लोगों के दिल जगमगा जाएँ फिर अल्लाह ने उन पर फज़ल किया इसमें शक नहीं कि वह उन लोगों पर पड़ा तरस खाने वाला मेहरबान है
118 और उन तीनों पर जो यहाँ तक कि ज़मीन बावजूद उस वसअत के उन पर तंग हो गई और उनकी जानें उन पर तंग हो गई और उन लोगों ने समझ लिया कि अल्लाह के सिवा और कहीं पनाह की जगह नहीं फिर अल्लाह ने उनको तौबा की तौफीक दी ताकि वह रूजू करें बेशक अल्लाह ही बड़ा तौबा क़ुबूल करने वाला मेहरबान है
119 ऐ ईमान लाने वालों अल्लाह से डरो और सच्चों के साथ हो जाओ 120 मदीने के रहने वालों और उनके गिर्दोनवा के एअराब को ये जायज़ न था कि रसूल अल्लाह का साथ छोड़ दें और न ये कि रसूल की जान से बेपरवा होकर अपनी जानों के बचाने की फ्रिक करें ये हुक्म उसी सब्ब से था कि उन को अल्लाह की राह में जो तकलीफ़ प्यास की या मेहनत या भूख की शिद्दत की पहुँचती है या ऐसी राह चलते हैं जो कुफ़्फ़ार के ग़ैज़ हो तो बस उसके ऐवज़ में एक नेक काम लिख दिया जाएगा बेशक अल्लाह नेकी करने वालों का अज्र बरबाद नहीं करता है
121 और ये लोग थोड़ा या बहुत माल नहीं खर्च करते और किसी मैदान को नहीं क़तआ करते मगर फौरन उनके नाम लिख दिया जाता है ताकि अल्लाह उनकी कारगुज़ारियों का उन्हें अच्छे से अच्छा बदला अता फरमाए
122 और ये भी मुनासिब नहीं कि मोमिननि कुल के कुल निकल खड़े हों उनमें से हर गिरोह की एक जमाअत क्यों नहीं निकलती ताकि इल्मे दीन हासिल करे और जब अपनी क़ौम की तरफ पलट के आवे तो उनको डराए ताकि ये लोग डरें
123 ऐ इमान वालों कुफ्फार में से जो लोग तुम्हारे आस पास के है उन से लड़ों और चाहिए कि वह लोग तुम में करारापन महसूस करें और जान रखो कि बेशुबहा अल्लाह परहेज़गारों के साथ है 124 और जब कोई सूरा नाजि़ल किया गया तो उन मुनाफिक़ीन में से पूछता है कि भला इस सूरे ने तुममें से किसी का ईमान बढ़ा दिया तो जो लोग ईमान ला चुके हैं उनका तो इस सूरे ने ईमान बढ़ा दिया और वह वहा उसकी खुशियाँ मनाते है
125 मगर जिन लोगों के दिल में बीमारी है तो उन ख़बासत पर इस सूरो ने एक ख़बासत और बढ़ा दी और ये लोग कुफ्ऱ ही की हालत में मर गए
126 क्या वह लोग नहीं देखते कि हर साल एक मरतबा या दो मरतबा बला में मुबितला किए जाते हैं फिर भी न तो ये लोग तौबा ही करते हैं और न नसीहत ही मानते हैं
127 और जब कोई सूरा नाजि़ल किया गया तो उसमें से एक की तरफ एक देखने लगा तुम को देखता तो नहीं है फिर पलट जाते हैं अल्लाह ने उनके दिलों को पलट दिया है इस सबब से कि ये बिल्कुल नासमझ लोग हैं
128 लोगों तुम ही में से एक रसूल तुम्हारे पास आ चुका उस पर शाक़ है कि तुम तकलीफ उठाओ और उसे तुम्हारी भलाई का हौका है इमानदारो पर हद दर्जे शफीक़ मेहरबान हैं
129 ऐ रसूल अगर इस पर भी ये लोग मुँह फेरें तो तुम कह दो कि मेरे लिए अल्लाह काफी है उसके सिवा कोई माबूद नहीं मैने उस पर भरोसा रखा है वही अर्श का मालिक है (114) 110 सूरए अन नस्र
1 जब अल्लाह की मदद आ पहुचेंगी
2 तुम लोगों को देखोगे कि गोल के गोल अल्लाह के दीन में दाखि़ल हो रहे हैं
3 तो तुम अपने रब की तारीफ़ के साथ तसबीह करना और उसी से मग़फे़रत की दुआ माँगना वह बेशक बड़ा माफ़ करने वाला है
सफ़र पूरा हुआ – इंशाल्लाह अब वापस
आज के ज़माने में लौट कर देखेंगे – आज की दुनिया और आज का इस्लाम
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