मेरे साथ 1400 वर्ष पूर्व
मदीने का सफ़र कीजिये और सच्चे इस्लाम और मोमिनों को पहचानिए – 9
(92) 4 सूरए निसा
“1 ऐ लोगों अपने पालने वाले से डरो जिसने तुम सबको एक वाहिद नफस से पैदा किया और उसकी जौजा बनायीं और उन से बहुत से मर्द और औरतें फैला दिये और उस अल्लाह से डरो जिस से तुम सवाल करते हो और अरहाम बेशक अल्लाह तुम पर रकीब है” मुनाफिकों तुम कहते हो कुरान काफी है और तुम कहते हो कुरान में कोई तब्दीली नहीं हुयी है – कुछ छूटा नहीं है तो इस आयत का मतलब बताओ – अरहाम और रकीब का ?
“2 और यतीमों को उनके माल दे दो और बुरी चीज़ को भली चीज़ से न बदलो और न उनके माल अपने मालों में मिलाकर खा जाओ क्योंकि ये बहुत बड़ा गुनाह है” जंग में उम्माह के कई मर्द शहीद हुए होंगे और वैसे भी दुनिया में कुछ लोग वक़्त के पहले मौत का शिकार हो कर बेवा यतीम छोड़ जाते हैं जिनकी देखभाल कुनबों के इलावा उम्माह की भी है और यह कोई नयी बात नहीं इस्लाम के पहले भी यह मुशाहिदा रहा होगा कि यतीमों की देखभाल करने के बहाने लोग उनका माल खा जाते होंगे और उनका बहतर माल ले कर अपना घटिया माल उनके लिए रख देते होंगे – कपड़े , जूते , बर्तन , जेवर वगेरा I
“3 और अगर तुमको अन्देशा हो कि तुम यतीम लड़कियों में इन्साफ न कर सकोगे तो और औरतों में अपनी हैसियत के मुताबिक दो दो और तीन तीन और चार चार निकाह कर लो I” अन्देशा हो कि इन्साफ न कर सकोगे तो एक ही पर इक्तेफ़ा करो या जो तुम्हारी मिलकियत में हो I ये तदबीर बेइन्साफ़ी न करने की बहुत क़रीने क़यास है I” क्या पूरा मतलब है इस आयत का ? “4 और औरतों को उनके महर ख़ुशी ख़ुशी दे डालो फिर अगर वह ख़ुशी ख़ुशी तुम्हें कुछ छोड़ दे तो शौक़ से खाओ पियो
“5 और अपने वह माल जिनपर अल्लाह ने तुम्हारी गुज़र क़रार दी है उन बेवकूफ़ों को न दे बैठो हाँ उसमें से उन्हें खिलाओ और उनको पहनाओ और उनसे अच्छी तरह बात करो” एक मसला यह भी है उन कम अक्ल यतीमों का जो खुद अपनी देखभाल नहीं कर सकते I
“ 6 और यतीमों को आजमाओ यहाँ तक के ब्याहने के क़ाबिल हों फिर उस वक़्त तुम उन्हे होशियार पाओ तो उनका माल उनके हवाले कर दो और ऐसा न करना कि इस ख़ौफ़ से कि कहीं ये बड़े हो जाएंगे फ़ुज़ूल ख़र्ची करके झटपट उनका माल चट कर जाओ और जो दौलतमन्द हो तो वह बचता रहे और जो मोहताज हो वह अलबत्ता दस्तूर के मुताबिक़ खा सकता है पस जब उनके माल उनके हवाले करने लगो तो लोगों को उनका गवाह बना लो और हिसाब लेने को अल्लाह काफ़ी ही है” यतीमों का सरपरस्त अगर दौलतमंद है तो यतीमों के माल खर्च करने से बचे और अगर तंगदस्त हो तो दस्तूर के मुताबिक खर्च कर ले
“ 7 माँ बाप और क़राबतदारों के तरके में कुछ हिस्सा ख़ास मर्दों का है और उसी तरह माँ बाप और क़राबतदारो के तरके में कुछ हिस्सा ख़ास औरतों का भी है ख़्वाह तरका कम हो या ज़्यादा हिस्सा मुक़र्रर किया हुआ है
8 और जब तक़सीम के वक़्त क़राबतदार और यतीम बच्चे और मोहताज लोग आ जाएं तो उन्हे भी कुछ उसमें से दे दो और उसे अच्छी तरह बात करो I” ऐसा होता है कि बटवारे का सुन कर और लोग भी आ जाते हैं तो उनसे भी शाइस्ता गुफ्तगू करना है और कुछ दे देना है I “ 9 और उन लोगों को डरना है कि अगर वह लोग ख़ुद अपने बाद नातवाँ बच्चे छोड़ जाते तो उन पर तरस आता बस उनको अल्लाह से डरना चाहिये और उनसे सीधी तरह बात करना चाहिए
“ 10 जो लोग यतीमों के माल नाहक़ चट कर जाया करते हैं वह अपने पेट में बस अंगारे भरते हैं और अनक़रीब जहन्नुम वासिल होंगे
11 अल्लाह तुम्हारी औलाद के हक़ में तुमसे वसीयत करता है कि लड़के का हिस्सा दो लड़कियों के बराबर है और अगर औलाद में सिर्फ लड़कियां ही हों दो या ज़्यादा तो उनका कुल तरके का दो तिहाई है और अगर एक लड़की हो तो उसका आधा है और मय्यत के बाप माँ हर एक का अगर मय्यत की कोई औलाद मौजूद हो तो तरके के माल में से छटा हिस्सा है और अगर मय्यत के कोई औलाद न हो और उसके सिर्फ माँ बाप ही वारिस हों तो माँ का एक तिहाई हिस्सा तय है और बाक़ी बाप का लेकिन अगर मय्यत के भाई भी मौजूद हों तो उस वक़्त माँ का हिस्सा छठा ही होगा यह सब मय्यत नें जिसके बारे में वसीयत की है या क़र्ज़ अदायगी के बाद I तुम्हारे माँ बाप हों या बेटे तुम तो यह नहीं जानते हों कि उसमें कौन तुम्हारी नफ़े में ज़्यादा क़रीब है -हिस्सा तो सिर्फ अल्लाह की तरफ़ से मुअय्यन होता है क्योंकि अल्लाह तो ज़रूर हर चीज़ को जानता और तदबीर वाला है
12 और जो कुछ तुम्हारी बीवियां छोड़ कर जाए बस अगर उनके कोई औलाद न हो तो तुम्हारा आधा है और अगर उनके कोई औलाद हो तो जो कुछ वह तरका छोड़े उसमें से बाज़ चीज़ों में चौथाई तुम्हारा है औरत ने जिसकी वसीयत की हो और क़र्ज़ के बाद अगर तुम्हारे कोई औलाद न हो तो तुम्हारे तरके में से तुम्हारी बीवियों का बाज़ चीज़ों में चैथाई है और अगर तुम्हारी कोई औलाद हो तो तुम्हारे तरके में से उनका ख़ास चीज़ों में आठवाँ हिस्सा है तुमने जिसके बारे में वसीयत की है उसकी तामील और क़र्ज़ के बाद और अगर कोई मर्द या औरत भाई या बहन को वारिस छोड़े तो उनमें से हर एक का ख़ास चीजों में छठा हिस्सा है और अगर उससे ज़्यादा हो तो सबके सब एक ख़ास तिहाई में शरीक़ रहेंगे और मय्यत ने जिसके बारे में वसीयत की है उसकी तामील और क़र्ज़ के बाद मगर हाँ वह वसीयत नुक़्सान पहुँचाने वाली न हो I ये वसीयत अल्लाह की तरफ़ से है और अल्लाह तो हर चीज़ का जानने वाला और बुर्दबार है
13 यह अल्लाह की हदें हैं और अल्लाह और रसूल की इताअत करे उसको अल्लाह आख़ेरत में ऐसे बाग़ों में पहुँचा देगा जिसके नीचे नहरें जारी होंगी और वह उनमें हमेशा रहेंगे और यही तो बड़ी कामयाबी है
14 और जिस ने अल्लाह व रसूल की नाफ़रमानी की और उसकी हदों से गुज़़र गया तो बस अल्लाह उसको जहन्नुम में दाखि़ल करेगा और वह उसमें हमेशा अपना किया भुगतता रहेगा और उसके लिए बड़ी रूसवाई का अज़ाब है” दो औरतों के बीच जिंसी ताल्लुक की सजा : “15 और तुम्हारी औरतों में से जो औरतें बदकारी करें तो उनकी बदकारी पर अपने लोगों में से चार गवाही लो और फिर अगर चारों गवाह उसकी तसदीक़ करें तो उनको घरों में बन्द रखो यहाँ तक कि मौत आ जाए या अल्लाह उनकी कोई राह निकाले” दो मर्दों के बीच जिंसी ताल्लुक की सजा :
“16 और तुम लोगों में से जिनसे बदकारी सरज़द हुयी हो उनको मारो पीटो फिर अगर वह दोनों तौबा करें और इस्लाह कर लें तो उनको छोड़ दो बेशक अल्लाह बड़ा तौबा कुबूल करने वाला मेहरबान है
17 मगर अल्लाह की बारगाह में तौबा तो सिर्फ उन्हीं लोगों की है जो नादानिस्ता बुरी हरकत कर बैठे फिर जल्दी से तौबा कर ले तो अल्लाह भी ऐसे लोगों की तौबा क़ुबूल कर लेता है और अल्लाह तो बड़ा जानने वाला हकीम है” मुस्लिम मुल्कों में और उनके इतिहास से यह मालूम पड़ता है कि ज़िम्मेदार लोगों के लड़कों और जवानों से ताल्लुकात रहते थे और कई मशहूर किस्से भी हैं इन ताल्लुकात के – मुनाफ़िक़ औरतों को सजा देने में बहुत तेज़ हैं और इसके बरखिलाफ बाइबिल में ईसा मसीह का कितना अच्छा किस्सा है जब उन्होंने कहा पहला पत्थर वह मारे जिसने कोई गुनाह न किया हो
“ 18 और तौबा उन लोगों के लिये नहीं है जो तो बुरे काम करते रहे यहाँ तक कि जब उनमें से किसी के सर पर मौत आ खड़ी हुयी तो कहने लगे अब मैंने तौबा की और उन लोगों के लिए नहीं है जो कुफ़्र ही की हालत में मर गये ऐसे ही लोगों के वास्ते हमने दर्दनाक अज़ाब तैयार कर रखा है” औरतों के हुकूक : लोग विरासत हड़पने के लिए किसी की वारिस औरत से ज़बरदस्ती निकाह कर लेते थे या किसी और से निकाह करने से रोक दिया करते थे “ 19 ऐ ईमान लाने वालों तुमको ये जायज़ नहीं कि औरतों के ज़बरदस्ती वारिस बन जाओ और न रोको हाँ जब वह खुल्लम खुल्ला कोई बदकारी करें और बीवियों के साथ अच्छा सुलूक करते रहो और अगर तुम किसी वजह से उन्हें नापसन्द करो अजब नहीं कि किसी चीज़ को तुम नापसन्द करते हो और अल्लाह तुम्हारे लिए उसमें बहुत बेहतरी कर दे “
20 और अगर तुम एक बीवी की जगह दूसरी बीवी तबदील करना चाहो तो अगरचे तुम बहुत सा माल दे चुके हो तो तुम उनमें से कुछ वापस न लो I क्या तुम बोहतान या सरीही जुर्म लगाकर वापस लोगे
21 कैसे लोगे जब एक दूसरे में जा चुके हो और वे तुम से पक्का क़रार ले चुकी हैं
22 और जिन औरतों से तुम्हारे बाप दादाओं से निकाह किया हो तुम उनसे निकाह न करो मगर जो हो चुका I यह बदकारी और अल्लाह की नाख़ुशी की बात ज़रूर थी और बहुत बुरा तरीक़ा था
23 हराम हैं तुम पर तुम्हारी माएं और तुम्हारी बेटियाँ नवासियाँ और तुम्हारी बहनें और तुम्हारी फुफियाँ और तुम्हारी ख़ालाएं और भतीजियाँ और भंजियाँ और तुम्हारी वह माएं जिन्होंने तुमको दूध पिलाया है और तुम्हारी रज़ाई बहनें और तुम्हारी बीवीयों की माँए और वह लड़कियां जो तुम्हारी गोद में परवरिश पा चुकी हो और उन औरतों से हैं जिनसे तुम हमबिस्तरी कर चुके हो हाँ अगर तुमने उन बीवियों से हमबिस्तरी न की तो अलबत्ता उन निकाह तुम पर कुछ गुनाह नहीं है और तुम्हारे सुलबी लड़को की बीवियाँ और दो बहनों को एक साथ मगर जो हो चुका बेशक अल्लाह बड़ा बख़्शने वाला मेहरबान है 24 और शौहरदार औरतें सिवाए उनके जो तुम्हारे कब्ज़े में हों I अल्लाह का तहरीरी हुक्म तुमपर है I और उन औरतों के सिवा तुम्हारे लिए जायज़ हैं बशर्ते इफ़्फ़त व पाकदामिनी की ग़रज़ से , बदकारी व जि़ना नहीं, बल्कि तुम अपने माल के बदले चाहो हाँ जिन औरतों से तुमने जिन्सी मिलाप किया हो तो उन्हें जो मुअय्यन किया है दे दो और मेहर के मुक़र्रर होने के बाद अगर आपस में राज़ी हो जाओ तो उसमें तुमपर कुछ गुनाह नहीं है बेशक अल्लाह वाकि़फ़ और मसलेहतों का पहचानने वाला है 25 और तुममें से जो शख़्स आज़ाद इफ़्फ़तदार औरतों से निकाह करने की माली हैसियत से क़ुदरत न रखता हो तो वह तुम्हारी उन मोमिना लौन्डियों से जो तुम्हारे कब्ज़े में हैं निकाह कर सकता है और अल्लाह तुम्हारे ईमान से ख़ूब वाकि़फ़ है तुममें एक दूसरे का हमजिन्स है बस उनके मालिकों की इजाज़त से लौन्डियों से निकाह करो और उनका मेहर हुस्ने सुलूक से दे दो मगर उन्हीं से निकाह करो जो इफ़्फ़त के साथ तुम्हारी पाबन्द रहें न तो खुले आम जि़ना करना चाहें और न चोरी छिपे से आशनाई फिर जब तुम्हारी पाबन्द हो चुकी उसके बाद कोई बदकारी करे तो जो सज़ा आज़ाद बीवियों को दी जाती है उसकी आधी लौन्डियों को दी जाएगी से निकाह कर भी सकता है तो वह शख़्स जिसको जि़ना में मुब्तिला हो जाने का ख़ौफ़ हो और सब्र करे तो तुम्हारे हक़ में ज़्यादा बेहतर है और अल्लाह बख़्शने वाला मेहरबान है
26 अल्लाह तो ये चाहता है कि एहकाम तुम लोगों से साफ़ साफ़ बयान कर दे और जो लोग तुमसे पहले गुज़र चुके हैं उनके तरीक़े पर चला दे और तुम्हारी तौबा कु़बूल करे और अल्लाह तो वाकि़फ़ और हिकमत वाला है
27 और अल्लाह तो चाहता है कि तुम्हारी तौबा क़ुबूल करे और जो लोग नफ़सियानी ख़्वाहिश के पीछे पड़े हैं वह ये चाहते हैं कि तुम लोग बहुत दूर भटक जाओ 28 और अल्लाह चाहता है कि तुमसे बार में तख़फ़ीफ़ कर दें क्योंकि आदमी तो बहुत कमज़ोर पैदा किया गया है
29 ए ईमानवालों आपस में एक दूसरे का माल नाहक़ न खा जाया करो लेकिन तुम लोगों की बाहमी रज़ामन्दी से तिजारत हो और अपने आप को हालाक मत करो अल्लाह तुम पर मेहरबान है
30 और जो जोरो ज़ुल्म से ऐसा करेगा तो हम बहुत जल्द उसको जहन्नुम की आग में झोंक देंगे यह अल्लाह के लिये आसान है” यतीमों पर माल की लालच में ज़ुल्म करने वालों के बाद वे लोग हैं जो माल की लालच में औरतों का हक मारते थे अब तीसरे वे लोग हैं जो जोर ज़बरदस्ती से या धोखे से दूसरों का माल खाते हैं यहाँ उनको तंबीह की जा रही है I “31 अगर तुम गुनाहे कबीरा से बचते रहे तो हम तुम्हारे गुनाहों से भी दरगुज़र करेगें और तुमको बहुत अच्छी इज़्ज़त की जगह पहुँचा देंगे
32 और अल्लाह ने जो तुममें से फजीलत एल पर दूसरे को दी है उसके पीछे न पड़ो I मर्दो को अपने किए का हिस्सा है और औरतों को अपने किए का हिस्सा और ये और बात है कि तुम अल्लाह से उसके फज़ल व करम की ख़्वाहिश करो अल्लाह तो हर चीज़े से वाकि़फ़ है
33 और माँ बाप और क़राबतदार जो तरका छोड़ जाए हमने हर एक का वारिस मुक़र्रर कर दिया है और जिन लोगों से तुमने मुस्तहकम एहद किया है उनका मुक़र्रर हिस्सा भी तुम दे दो बेशक अल्लाह तो हर चीज़ पर गवाह है
34 मर्दो का औरतों पर क़ाबू है क्योंकि अल्लाह ने बाज़ को बाज़ पर फ़ज़ीलत दी है औेर चूकी मर्दो ने औरतों पर अपना माल ख़र्च किया है बस नेक बख़्त बीवियाँ तो शौहरों की ताबेदारी करती हैं उनके पीठ पीछे जिस तरह अल्लाह ने हिफ़ाज़त की वह भी हिफ़ाज़त करती है और वह औरतें जिनके नाफरमान सरकश होने का तुम्हें अन्देशा हो तो पहले उन्हें समझाओ और तुम उनके साथ सोना छोड़ दो और मारो मगर इतना कि खू़न न निकले और कोई अज़ो न टूटे बस अगर वह तुम्हारी मुतीइ हो जाए तो तुम भी उनके नुक़सान की राह न ढूढो अल्लाह तो ज़रूर सबसे बरतर बुजु़र्ग है” मर्द औरत के रिश्ते का यह भी एक नाज़ुक पहलू है और शादी के कुछ दिनों के टकराव के बाद ज़्यादातर में आपसी समझ पैदा हो जाती है I
35 अगर तुम्हें मियाँ बीवी की पूरी नाइत्तेफ़ाक़ी का तरफै़न से अन्देशा हो तो एक सालिस मर्द के कुनबे में से एक और सालिस औरत के कुनबे में मुक़र्रर करो अगर ये दोनों सालिस दोनों में मेल करा देना चाहें तो अल्लाह उन दोनों के दरमियान उसका अच्छा बन्दोबस्त कर देगा अल्लाह तो बेशक वाकि़फ व ख़बरदार है
उम्माह कैसी हो , लोग कैसे हों ? “36 और अल्लाह ही की इबादत करो और किसी को उसका शरीक न बनाओ और माँ बाप और क़राबतदारों और यतीमों और मोहताजों और रिश्तेदारों पड़ोसियों और अजनबी पड़ोसियों और पहलू में बैठने वाले मुसाहिबों और पड़ोसियों और ज़र ख़रीद लौन्डी और गुलाम के साथ एहसान करो बेशक अल्लाह अकड़ के चलने वालों और शेख़ीबाज़ों को दोस्त नहीं रखता” और कौन लोग नापसंदीदा हैं ?
“37 ये वह लोग हैं जो ख़ुद तो बुख़्ल करते ही हैं और लोगों को भी बुख़्ल का हुक्म देते हैं और जो माल अल्लाह ने अपने फ़ज़ल व करम से उन्हें दिया है उसे छिपाते हैं और हमने तो कुफ़राने नेअमत करने वालों के वास्ते सख़्त जि़ल्लत का अज़ाब तैयार कर रखा है
38 और जो लोग महज़ लोगों को दिखाने के वास्ते अपने माल ख़र्च करते हैं और न अल्लाह ही पर ईमान रखते हैं और न रोजे़ आख़ेरत पर अल्लाह भी उनके साथ नहीं क्योंकि उनका साथी तो शैतान है और जिसका साथी शैतान हो तो क्या ही बुरा साथी है
39 अगर ये लोग अल्लाह और रोज़े आखि़रत पर ईमान लाते और जो कुछ अल्लाह ने उन्हें दिया है उसमें से राहे अल्लाह में ख़र्च करते तो उन पर क्या आफ़त आ जाती और अल्लाह तो उनसे ख़ूब वाकि़फ़ है
40 अल्लाह तो हरगिज़ ज़र्रा बराबर भी ज़ुल्म नहीं करता बल्कि अगर ज़र्रा बराबर भी किसी की कोई नेकी हो तो उसको दूना करता है और अपनी तरफ़ से बड़ा सवाब अता फ़रमाता है
41 भला उस वक़्त क्या हाल होगा जब हम हर गिरोह के गवाह तलब करेंगे और तुमको उन सब पर गवाह की हैसियत में तलब करेंगे
42 उस दिन जिन लोगों ने कुफ्र इख़्तेयार किया और रसूल की नाफ़रमानी की ये आरज़ू करेंगे कि काश उनके ऊपर से ज़मीन बराबर कर दी जाती और ये लोग अल्लाह से कोई बात उस दिन छुपा भी न सकेंगे” शराब, जनाबत और पाक होना:
43 ऐ ईमान लाने वालों तुम नशे की हालत में नमाज़ के क़रीब न जाओ ताकि तुम जो कुछ मुँह से कहो समझो भी तो और न जिनाबत की हालत में यहाँ तक कि ग़ुस्ल कर लो मगर राह गुज़र में हो बल्कि अगर तुम मरीज़ हो और पानी नुक़सान करे या सफ़र में हो तुममें से किसी का पैख़ाना निकल आए या औरतों से सोहबत की हो और तुमको पानी न मयस्सर हो तो पाक मिट्टी पर तैमूम कर लो और अपने मुँह और हाथों पर मिट्टी भरा हाथ फेरो तो बेशक अल्लाह माफ़ करने वाला है बख़्शने वाला है
44 क्या तुमने उन लोगों के हाल पर नज़र नहीं की जिन्हें किताबे अल्लाह का कुछ हिस्सा दिया गया था वह लोग गुमराही ख़रीदने लगे उनकी ऐन मुराद यह है कि तुम भी राहे रास्त से बहक जाओ
45 और अल्लाह तुम्हारे दुशमनों से ख़ूब वाकि़फ़ है और दोस्ती के लिए बस अल्लाह काफ़ी है और हिमायत के वास्ते भी अल्लाह ही काफ़ी है
46 यहूद से कुछ लोग ऐसे भी हैं जो बातों में उनके महल व मौक़े से हेर फेर डाल देते हैं और अपनी ज़बानों को मरोड़कर और दीन पर तानाज़नी की राह से तुमसे समेअना व असैना (हमने सुना और नाफ़रमानी की) और वसमअ गै़रा मुसमइन (तुम मेरी सुनो अल्लाह तुमको न सुनवाए) राअना (मेरा ख़्याल करो मेरे चरवाहे) कहा करते हैं और अगर वह इसके बदले समेअना व अताअना (हमने सुना और माना) और इसमाआ (मेरी सुनो) और (राअना) के एवज़ उनजुरना (हमपर निगाह रख) कहते तो उनके हक़ में कहीं बेहतर होता और बिल्कुल सीधी बात थी मगर उनपर तो उनके कुफ़्र की वजह से अल्लाह की फि़टकार है
47 बस उनमें से चन्द लोगों के सिवा और लोग ईमान ही न लाएंगे ऐ एहले किताब जो (किताब) हमने नाजि़ल की है और उस (किताब) की भी तस्दीक़ करती है जो तुम्हारे पास है उस पर इमान लाओ मगर क़ब्ल इसके कि हम कुछ लोगों के चेहरे बिगाड़कर उनके पुश्त की तरफ़ फेर दें या जिस तरह हमने असहाबे सबत (हफ़्ते वालों) पर फिटकार बरसायी वैसी ही फिटकार उनपर भी करें
और अल्लाह का हुक्म किया कराया हुआ काम समझो 48 अल्लाह उस जुर्म को तो अलबत्ता नहीं माफ़ करता कि उसके साथ शिर्क किया जाए हाँ उसके सिवा जो गुनाह हो जिसको चाहे माफ़ कर दे और जिसने अल्लाह का शरीक बनाया तो उसने बड़े गुनाह का तूफान बांधा” हर मजहब के ठेकेदार ऐसे ही मुक़द्दस होने का ढोंग रचते हैं आज यही हालत मुसलामानों में भी है :
“49 क्या तुमने उन लोगों के हाल पर नज़र नहीं की जो आप बड़े मुक़द्दस बनते हैं बल्कि अल्लाह जिसे चाहता है मुक़द्दस बनाता है और ज़ुल्म तो किसी पर धागे के बराबर हो ही गा नहीं
50 ज़रा देखो तो ये लोग अल्लाह पर कैसे कैसे झूठ तूफ़ान जोड़ते हैं और खुल्लम खुल्ला गुनाह के वास्ते तो यही काफ़ी है
51 क्या तुमने उन लोगों पर नज़र नहीं की जिन्हें किताबे अल्लाह का कुछ हिस्सा दिया गया था और वे जिब्त और ताकूत पर ईमान ले आये और जिन लोगों ने कुफ़्र इख़्तेयार किया है उनकी निस्बत कहने लगे कि ये तो इमान लाने वालों से ज़्यादा राहे रास्त पर हैं
52 यही वह लोग हैं जिनपर अल्लाह ने लानत की है और जिस पर अल्लाह ने लानत की है तुम उनका मददगार हरगिज़ किसी को न पाओगे
53 क्या दुनिया की मिलकियत में कुछ उनका भी हिस्सा है तो लोगों को तिनका भर भी न देंगे
54 यह अल्लाह ने जो अपने फ़ज़ल से लोगों को अता फ़रमाया है इसके रश्क पर जले जाते हैं ? हमने तो इबराहीम की औलाद को किताब और अक़्ल की बातें अता फ़रमायी हैं और उनको बहुत बड़ी सल्तनत भी दी 55 फिर कुछ लोग तो इस पर ईमान लाए और कुछ लोगों ने उससे इन्कार किया और इसकी सज़ा के लिए जहन्नुम की दहकती हुयी आग काफ़ी है
56 जिन लोगों ने हमारी आयतों से इन्कार किया उन्हें ज़रूर अनक़रीब जहन्नुम की आग में झोंक देंगे खालें जल जाएंगी तो हम उनके लिए दूसरी खालें देंगे ताकि वह अच्छी तरह अज़ाब का मज़ा चखें बेशक अल्लाह हरचीज़ पर ग़ालिब और हिकमत वाला है
57 और जो लोग ईमान लाए और अच्छे अच्छे काम किए हम उनको अनक़रीब ही ऐसे ऐसे बाग़ों में जा पहुँचाएंगे जिन के नीचे नहरें जारी होंगी और उनमें हमेशा रहेंगे वहां उनकी साफ़ सुथरी बीवियाँ होंगी और उन्हे घनी छाव में ले जाकर रखेंगे” अमानत अमानतदारों को लौटा दो :
“58 ऐ ईमान लाने वालों अल्लाह तुम्हें हुक्म देता है कि लोगों की अमानतें अमानत रखने वालों के हवाले कर दो और जब लोगों के बाहमी झगड़ों का फै़सला करने लगो तो इन्साफ़ से फै़सला करो इसकी क्या ही अच्छी नसीहत करता है इसमें तो शक नहीं कि अल्लाह सबकी सुनता है देखता है
59 ऐ ईमान लाने वालों अल्लाह की इताअत करो और रसूल की और जो तुममें से साहेबाने हुकूमत हों उनकी इताअत करो और अगर तुम किसी बात में झगड़ा करो बस अगर तुम अल्लाह और रोज़े आखि़रत पर इमान रखते हो तो इस अम्र में अल्लाह और रसूल की तरफ़ रूजू करो यही तुम्हारे हक़ में बेहतर है और अन्जाम की राह से बहुत अच्छा है “ यह कौन लोग हैं जो उम्माह की तशकील में रुकावटें डाल रहे हैं – शामिल भी हैं और मुखालिफ भी ?
“60 क्या तुमने उन लोगों पर नज़र नहीं की जो दावा तो यह करते हैं कि जो किताब तुम पर नाजि़ल की गयी और जो किताबें तुम से पहले नाजि़ल की गयी ईमान लाए और इरादा करते हैं कि तागूत को अपना हाकिम बनाएं हालांकि उनको हुक्म दिया गया कि उसकी बात न मानें और शैतान तो यह चाहता है कि उन्हें बहका के बहुत दूर ले जाए
61 और जब उनसे कहा जाता है कि अल्लाह ने जो किताब नाजि़ल की है उसकी तरफ़ और रसूल की तरफ़ रूजू करो तो तुम मुनाफि़क़ीन को देखते हो कि तुमसे किस तरह मुँह फेर लेते हैं
62 कैसे जब उनपर उनके करतूत की वजह से कोई मुसीबत पड़ती है तो फिर तुम्हारे पास अल्लाह की क़समें खाते हैं कि हमारा मतलब नेकी और मेल मिलाप के सिवा कुछ न था ये वह लोग हैं कि कुछ अल्लाह ही उनके दिल की हालत ख़ूब जानता है
63 बस तुम उनसे दरगुज़र करो और उनको नसीहत करो और उनसे उनके दिल में असर करने वाली बात कहो 64और हमने कोई रसूल नहीं भेजा मगर इस वास्ते कि अल्लाह के हुक्म से लोग उसकी इताअत करें और जब उन लोगों ने अपनी जानों पर जु़ल्म किया था अगर तुम्हारे पास चले आते और अल्लाह से माफ़ी माँगते और रसूल भी उनकी मग़फि़रत चाहते तो बेशक वह लोग अल्लाह को बड़ा तौबा क़ुबूल करने वाला मेहरबान पाते 65 बस तुम्हारे रब की क़सम ये लोग सच्चे मोमिन न होंगे जब तक कि अपने बाहमी झगड़ों में तुमको अपना हाकिम न बनाएं फिर जो कुछ तुम फै़सला करो उससे किसी तरह दिलतंग भी न हों बल्कि ख़ुशी ख़ुशी उसको मान लें
66 अगर उनपर ये हुक्म जारी कर देते कि तुम अपने आपको क़त्ल कर डालो या शहर बदर हो जाओ तो उनमें से चन्द आदमियों के सिवा ये लोग तो उसको न करते और अगर ये लोग इस बात पर अमल करते जिसकी उन्हें नसीहत की जाती है तो उनके हक़ में बहुत बेहतर होता और बहुत साबित क़दमी 67 और इस सूरत में हम भी अपनी तरफ़ से ज़रूर बड़ा अच्छा बदला देते और 68 हिदायत करते राहे रास्त की
69 और जिस ने अल्लाह और रसूल की इताअत की तो ऐसे लोग उन बन्दों के साथ होंगे जिन्हें अल्लाह ने अपनी नेअमतें दी हैं -अम्बिया और सिद्दीक़ीन और शोहदा और सालेहीन और ये लोग क्या ही अच्छे रफ़ीक़ हैं 70 ये अल्लाह का फ़ज़ल (व करम) है और अल्लाह तो काफी है सब जानने वाला” जिहाद और एहतियात : “71 ऐ ईमानवालों अपनी हिफ़ाज़त के अच्छी तरह देखभाल लो फिर चाहे दस्ता दस्ता निकलो या सबके सब इकट्ठे होकर निकल खड़े हो” मुनाफ़िक़ और जिहाद:
“72 और तुममें कोई ऐसा भी है जो पीछे रहेगा फिर अगर तुमपर कोई मुसीबत आ पड़ी तो कहने लगे अल्लाह ने हमपर बड़ा फ़ज़ल किया कि मैं उन के साथ मौजूद न हुआ
73 और अगर तुमपर अल्लाह ने फ़ज़ल किया तो इस तरह गोया तुममें उसमें कभी मोहब्बत ही न थी यॅू कहने लगा कि ऐ काश उनके साथ होता तो मैं भी बड़ी कामयाबी हासिल करता
74 बस उन्हें अल्लाह की राह में जेहाद करना चाहिए जो दुनिया की जि़न्दगी आख़ेरत के वास्ते दे बेच दे और जिसने अल्लाह की राह में जेहाद किया फिर शहीद हुआ या ग़ालिब आया तो हम उसको बड़ा अज्र अता फ़रमायेंगे
75 तुमको क्या हो गया है कि अल्लाह की राह में उन कमज़ोर और बेबस मर्दो और औरतों और बच्चों के वास्ते जेहाद नहीं करते जो अल्लाह से दुआएं मांग रहे हैं कि ऐ हमारे पालने वाले किसी तरह इस बस्ती से जिसके बाशिन्दे बड़े ज़ालिम हैं हमें निकाल और अपनी तरफ़ से किसी को हमारा सरपरस्त बना और अपनी तरफ से हमारा मददगार बना
76 ईमानवाले तो अल्लाह की राह में लड़ते हैं और कुफ़्फ़ार तागूत की राह में लड़ते हैं बस तुम शैतान के साथियों से लड़ो और शैतान का दाव तो बहुत ही बोदा है” जिहाद और कुछ ईमान के कमज़ोर लोग
77 क्या तुमने उन लोगों पर नज़र नहीं की जिनको हुक्म दिया गया था कि अपने हाथ रोके रहो और पाबन्दी से नमाज़ पढ़ो और ज़कात दिए जाओ मगर जब जिहाद का हुक्म दिया गया तो उनमें से कुछ लोग लोगों से इस तरह डरने लगे जैसे कोई अल्लाह से डरे बल्कि उससे कहीं ज़्यादा और कहने लगे अल्लाह तूने हमपर जेहाद क्यों वाजिब कर दिया हमको कुछ दिनों की और मोहलत क्यों न दी उनसे कह दो कि दुनिया की आसाइश बहुत थोड़ा सा है और जो तक्वा रखता है उसकी आख़ेरत उससे कहीं बेहतर है और वहां तो रेशा बराबर भी तुम लोगों पर जु़ल्म नहीं किया जाएगा 78 तुम चाहे जहाँ हो मौत तो तुमको ले डालेगी अगरचे तुम कैसे ही मज़बूत पक्के गुम्बदों में जा छुपो I और उनको अगर कोई भलाई पहुँचती है तो कहने लगते हैं कि ये अल्लाह की तरफ़ से है और अगर उनको कोई तकलीफ़ पहुँचती है तो कहने लगते हैं कि ये तुम्हारी बदौलत है तुम कह दो कि सब अल्लाह की तरफ़ से है बस उन लोगों को क्या हो गया है कि कोई बात समझने के करीब नहीं हैं
79 जब तुमको कोई तकलीफ़ पहुँचे तो अल्लाह की तरफ़ से है और जब तुमको कोई फ़ायदा पहुचे तो ख़ुद तुम्हारे नफस से है I और हमने तुमको लोगों के पास रसूल बनाकर भेजा है और अल्लाह ही गवाह काफ़ी है
80 जिसने रसूल की इताअत की तो उसने अल्लाह की इताअत की और जिसने रूगरदानी की तो हमने तुम को पासबान करके नहीं भेजा है “ कैसे हैं यह मुनाफ़िक़ :
81 वे कहते हैं कि हम फ़रमाबरदार हैं लेकिन जब तुम्हारे पास से बाहर निकले तो उनमें से कुछ लोग जो कुछ तुमसे कह चुके थे उसके खि़लाफ़ रातों को मशवरा करते हैं हालांकि जो करते हैं उसे अल्लाह लिखता जाता है उनसे अलग रहो अल्लाह पर भरोसा रखो और अल्लाह कारसाज़ी के लिए काफ़ी है
82 क्या ये लोग क़ुरान में भी ग़ौर नहीं करते कि अगर अल्लाह के सिवा किसी और की तरफ़ से होता तो ज़रूर उसमें बड़ा इख़्तेलाफ़ पाते
83 और जब उनके पास अमन या ख़ौफ़ की ख़बर आयी तो उसे फ़ौरन मशहूर कर देते हैं हालांकि अगर वह उसकी ख़बर को रसूल जो साहबाने अम्र तक पहुँचाते तो बेशक जो लोग उनमें से उसकी तहक़ीक़ करने वाले हैं उसको समझ लेते I और अगर तुमपर अल्लाह का फ़ज़ल और उसकी मेहरबानी न होती तो चन्द आदमियों के सिवा तुम सबके सब शैतान की पैरवी करने लगते
84 बस तुम अल्लाह की राह में जिहाद करो और तुम अपनी ज़ात के सिवा किसी और के ज़िम्मेदार नहीं हो और ईमान लाने वालों को जिहाद की तरग़ीब दो और अनक़रीब अल्लाह काफि़रों की ताक़त को रोक दे और अल्लाह की ताक़त सबसे ज़्यादा है और उसकी सज़ा बहुत सख़्त है
85 जो अच्छे काम की सिफ़ारिश करे तो उसको भी उस काम के सवाब से कुछ हिस्सा मिलेगा और जो बुरे काम की सिफ़ारिश करे तो उसको भी उसी काम की सज़ा का कुछ हिस्सा मिलेगा और अल्लाह तो हर चीज़ पर निगेहबान है” सलाम का जवाब बहतर सलाम:
86 और जब कोई सलाम करे तो तुम भी उसके जवाब में उससे बेहतर तरीक़े से सलाम करो या वही लफ़्ज़ जवाब में कह दो बेशक अल्लाह हर चीज़ का हिसाब करने वाला है
87 अल्लाह तो वही रब है जिसके सिवा कोई क़ाबिले परस्तिश नहीं वह तुमको क़यामत के दिन जिसमें ज़रा भी शक नहीं ज़रूर इकट्ठा करेगा और अल्लाह से बढ़कर बात में सच्चा कौन होगा मुनाफिकों के बारे में आज भी दो ग्रुप:
88 तुमको क्या हो गया है कि तुम मुनाफि़क़ों के बारे में दो फ़रीक़ हो गए हो हालांकि ख़ुद अल्लाह ने उनके करतूतों की बदौलत उनकी अक़्लों को उलट पुलट दिया है क्या तुम ये चाहते हो कि जिसको अल्लाह ने गुमराही में छोड़ दिया है तुम उसे राहे रास्त पर ले आओ हालांकि अल्लाह ने जिसको गुमराही में छोड़ दिया है उसके लिए तुममें से कोई रास्ता निकाल ही नहीं सकता” मक्का में ठहरे मुनाफ़िक़ :
“89 उन लोगों की ख़्वाहिश तो ये है कि जिस तरह वह काफि़र हो गए तुम भी काफि़र हो जाओ ताकि तुम उनके बराबर हो जाओ बस जब तक वह अल्लाह की राह में हिजरत न करें तो उनमें से किसी को दोस्त न बनाओ फिर अगर वह उससे भी मुँह मोड़ें तो उन्हें गिरफ़्तार करो और जहाँ पाओ उनको क़त्ल करो और उनमें से किसी को न अपना दोस्त बनाओ न मददगार” शायद उहद में मुसलामानों के नुकसान के बाद एक बार फिर मुनाफिकों को मौक़ा मिल गया था मुसलामानों को वापस फेर लें तो उन मक्का के मुनाफिकों पर हिजरत करने की शर्त लगी है अगर नहीं मानते तो काफिर हैं और उसी सजा के मुस्तहक हैं
“ 90 मगर जो लोग किसी ऐसी क़ौम से जा मिलें कि तुममें और उनमें एहद व पैमान हो चुका है या तुमसे जंग करने या अपनी क़ौम के साथ लड़ने से दिलतंग होकर तुम्हारे पास आए हों और अगर अल्लाह चाहता तो उनको तुमपर ग़लबा देता तो वह तुमसे ज़रूर लड़ पड़ते बस अगर वह तुमसे किनारा कशी करे और तुमसे न लड़े और तुम्हारे पास सुलाह का पैग़ाम दे तो तुम्हारे लिए उन लोगों पर आज़ार पहुँचाने की अल्लाह ने कोई सबील नहीं निकाली
91 अनक़रीब तुम कुछ ऐसे और लोगों को भी पाओगे जो चाहते हैं कि तुमसे भी अमन में रहें और अपनी क़ौम से भी अमन मे रहें जब कभी झगड़े की तरफ़ बुलाए गए तो उसमें औंधे मुँह के बल गिर पड़े बस अगर वह तुमसे न किनारा कशी करें और न तुम्हें सुलह का पैग़ाम दें और न लड़ाई से अपने हाथ रोकें बस उनको पकड़ों और जहाँ पाओ उनको क़त्ल करो और यही वह लोग हैं जिनपर हमने तुम्हें सरीही ग़लबा अता फ़रमाया
92 और किसी ईमानवाले को ये जायज़ नहीं कि किसी ईमान वाले को जान से मार डाले मगर धोखे से और जो किसी मोमिन को धोखे से मार डाले तो एक साहिबे ईमान गु़लाम का आज़ाद करना और मक़तूल के क़राबतदारों को खूंन बहा देना है मगर जब वह लोग माफ़ करें फिर अगर मक़तूल उन लोगों में से हो वह जो तुम्हारे दुश्मन हैं और ख़ुद क़ातिल मोमिन है तो एक मुसलमान ग़ुलाम का आज़ाद करना और अगर मक़तूल उन लोगों में का हो जिनसे तुम से एहद व पैमान हो चुका है तो वारिसे मक़तूल को ख़ून बहा देना और एक बन्दए मोमिन का आज़ाद करना है फि़र जो न कर पाये तो उसका कुफ़्फ़ारा अल्लाह की तरफ़ से लगातार दो महीने के रोज़े हैं और अल्लाह ख़ूब वाकिफ़कार हिकमत वाला है
93 और जो किसी मोमिन को जानबूझ के मार डाले उसकी सज़ा जहन्नम है और वह उसमें हमेशा रहेगा उसपर अल्लाह ने ग़ज़ब ढाया है और उसपर लानत की है और उसके लिए बड़ा सख़्त अज़ाब तैयार कर रखा है जो सलाम करे उसे लूटने क़त्ल करने का कोई जवाज़ नहीं !
“94 ऐ ईमान लाने वालों जब तुम अल्लाह की राह में सफ़र करो तो अच्छी तरह जाच कर लिया करो और जो तुम्हे सलाम करे तो तुम बे सोचे समझे न कह दिया करो कि तू ईमानदार नहीं है कि तुम दुनियावी आसाइश की तमन्ना रखते हो मगर इसी बहाने क़त्ल करके लूट लो और ये नहीं समझते कि तो अल्लाह के यहाँ बहुत से ग़नीमतें हैं पहले तुम ख़़ुद भी तो ऐसे ही थे फिर अल्लाह ने तुमपर एहसान किया ग़रज़ ख़ूब छानबीन कर लिया करो बेशक अल्लाह तुम्हारे हर काम से ख़बरदार है
95 बिना माजूरी के घर में बैठने वाले और अल्लाह की राह में अपने जान व माल से जिहाद करने वाले हरगिज़ बराबर नहीं हो सकते - अपने जान व माल से जिहाद करने वालों को घर बैठे रहने वालें पर अल्लाह ने दरजे के एतबार से बड़ी फ़ज़ीलत दी है अल्लाह ने सब से भलाई का वायदा कर लिया है मगर मुजाहिदीन को काएदीन पर अल्लाह ने बड़ी फ़ज़ीलत दी है
96 अपनी तरफ़ से बड़े बड़े दरजे और बखि़्शश और रहमत और अल्लाह तो बड़ा बख़्शने वाला मेहरबान है” हिजरत क्यों न की ?
“97 बेशक जिन लोगों की क़ब्जे़ रूह फ़रिश्ते ने उस वक़त की है कि अपनी जानों पर ज़ुल्म कर रहे थे और फ़रिश्ते कब्जे़ रूह के बाद पूछते हैं तुम कैसे तो वह कहते है कि हम तो रूए ज़मीन में बेकस थे तो फ़रिश्ते कहते हैं कि अल्लाह की ज़मीन में इतनी सी गुन्जाइश न थी कि तुम हिजरत करके चले जाते बस ऐसे लोगों का ठिकाना जहन्नुम है और वह बुरा ठिकाना है
98 मगर जो मर्द और औरतें और बच्चे इस क़दर बेबस हैं कि न तो काई तदबीर कर सकते हैं और उनको अपनी रिहाई की कोई राह दिखाई देती है
99 तो उम्मीद है कि अल्लाह ऐसे लोगों से दरगुज़रे करे और अल्लाह तो बड़ा माफ़ करने वाला और बख्शने वाला है
100 और जो अल्लाह की राह में हिजरत करेगा तो वह रूए ज़मीन में बा फ़राग़त बहुत से कुशादा मक़ाम पाएगा और जो अपने घर से जिलावतन होकर अल्लाह और उसके रसूल की तरफ़ निकल ख़ड़ा हुआ फिर उसे उस तक पहुँचने से पहले मौत आ जाए तो अल्लाह पर उसका सवाब लाजि़म हो गया और अल्लाह तो बड़ा बख़्श ने वाला मेहरबान है ही
“1 ऐ लोगों अपने पालने वाले से डरो जिसने तुम सबको एक वाहिद नफस से पैदा किया और उसकी जौजा बनायीं और उन से बहुत से मर्द और औरतें फैला दिये और उस अल्लाह से डरो जिस से तुम सवाल करते हो और अरहाम बेशक अल्लाह तुम पर रकीब है” मुनाफिकों तुम कहते हो कुरान काफी है और तुम कहते हो कुरान में कोई तब्दीली नहीं हुयी है – कुछ छूटा नहीं है तो इस आयत का मतलब बताओ – अरहाम और रकीब का ?
“2 और यतीमों को उनके माल दे दो और बुरी चीज़ को भली चीज़ से न बदलो और न उनके माल अपने मालों में मिलाकर खा जाओ क्योंकि ये बहुत बड़ा गुनाह है” जंग में उम्माह के कई मर्द शहीद हुए होंगे और वैसे भी दुनिया में कुछ लोग वक़्त के पहले मौत का शिकार हो कर बेवा यतीम छोड़ जाते हैं जिनकी देखभाल कुनबों के इलावा उम्माह की भी है और यह कोई नयी बात नहीं इस्लाम के पहले भी यह मुशाहिदा रहा होगा कि यतीमों की देखभाल करने के बहाने लोग उनका माल खा जाते होंगे और उनका बहतर माल ले कर अपना घटिया माल उनके लिए रख देते होंगे – कपड़े , जूते , बर्तन , जेवर वगेरा I
“3 और अगर तुमको अन्देशा हो कि तुम यतीम लड़कियों में इन्साफ न कर सकोगे तो और औरतों में अपनी हैसियत के मुताबिक दो दो और तीन तीन और चार चार निकाह कर लो I” अन्देशा हो कि इन्साफ न कर सकोगे तो एक ही पर इक्तेफ़ा करो या जो तुम्हारी मिलकियत में हो I ये तदबीर बेइन्साफ़ी न करने की बहुत क़रीने क़यास है I” क्या पूरा मतलब है इस आयत का ? “4 और औरतों को उनके महर ख़ुशी ख़ुशी दे डालो फिर अगर वह ख़ुशी ख़ुशी तुम्हें कुछ छोड़ दे तो शौक़ से खाओ पियो
“5 और अपने वह माल जिनपर अल्लाह ने तुम्हारी गुज़र क़रार दी है उन बेवकूफ़ों को न दे बैठो हाँ उसमें से उन्हें खिलाओ और उनको पहनाओ और उनसे अच्छी तरह बात करो” एक मसला यह भी है उन कम अक्ल यतीमों का जो खुद अपनी देखभाल नहीं कर सकते I
“ 6 और यतीमों को आजमाओ यहाँ तक के ब्याहने के क़ाबिल हों फिर उस वक़्त तुम उन्हे होशियार पाओ तो उनका माल उनके हवाले कर दो और ऐसा न करना कि इस ख़ौफ़ से कि कहीं ये बड़े हो जाएंगे फ़ुज़ूल ख़र्ची करके झटपट उनका माल चट कर जाओ और जो दौलतमन्द हो तो वह बचता रहे और जो मोहताज हो वह अलबत्ता दस्तूर के मुताबिक़ खा सकता है पस जब उनके माल उनके हवाले करने लगो तो लोगों को उनका गवाह बना लो और हिसाब लेने को अल्लाह काफ़ी ही है” यतीमों का सरपरस्त अगर दौलतमंद है तो यतीमों के माल खर्च करने से बचे और अगर तंगदस्त हो तो दस्तूर के मुताबिक खर्च कर ले
“ 7 माँ बाप और क़राबतदारों के तरके में कुछ हिस्सा ख़ास मर्दों का है और उसी तरह माँ बाप और क़राबतदारो के तरके में कुछ हिस्सा ख़ास औरतों का भी है ख़्वाह तरका कम हो या ज़्यादा हिस्सा मुक़र्रर किया हुआ है
8 और जब तक़सीम के वक़्त क़राबतदार और यतीम बच्चे और मोहताज लोग आ जाएं तो उन्हे भी कुछ उसमें से दे दो और उसे अच्छी तरह बात करो I” ऐसा होता है कि बटवारे का सुन कर और लोग भी आ जाते हैं तो उनसे भी शाइस्ता गुफ्तगू करना है और कुछ दे देना है I “ 9 और उन लोगों को डरना है कि अगर वह लोग ख़ुद अपने बाद नातवाँ बच्चे छोड़ जाते तो उन पर तरस आता बस उनको अल्लाह से डरना चाहिये और उनसे सीधी तरह बात करना चाहिए
“ 10 जो लोग यतीमों के माल नाहक़ चट कर जाया करते हैं वह अपने पेट में बस अंगारे भरते हैं और अनक़रीब जहन्नुम वासिल होंगे
11 अल्लाह तुम्हारी औलाद के हक़ में तुमसे वसीयत करता है कि लड़के का हिस्सा दो लड़कियों के बराबर है और अगर औलाद में सिर्फ लड़कियां ही हों दो या ज़्यादा तो उनका कुल तरके का दो तिहाई है और अगर एक लड़की हो तो उसका आधा है और मय्यत के बाप माँ हर एक का अगर मय्यत की कोई औलाद मौजूद हो तो तरके के माल में से छटा हिस्सा है और अगर मय्यत के कोई औलाद न हो और उसके सिर्फ माँ बाप ही वारिस हों तो माँ का एक तिहाई हिस्सा तय है और बाक़ी बाप का लेकिन अगर मय्यत के भाई भी मौजूद हों तो उस वक़्त माँ का हिस्सा छठा ही होगा यह सब मय्यत नें जिसके बारे में वसीयत की है या क़र्ज़ अदायगी के बाद I तुम्हारे माँ बाप हों या बेटे तुम तो यह नहीं जानते हों कि उसमें कौन तुम्हारी नफ़े में ज़्यादा क़रीब है -हिस्सा तो सिर्फ अल्लाह की तरफ़ से मुअय्यन होता है क्योंकि अल्लाह तो ज़रूर हर चीज़ को जानता और तदबीर वाला है
12 और जो कुछ तुम्हारी बीवियां छोड़ कर जाए बस अगर उनके कोई औलाद न हो तो तुम्हारा आधा है और अगर उनके कोई औलाद हो तो जो कुछ वह तरका छोड़े उसमें से बाज़ चीज़ों में चौथाई तुम्हारा है औरत ने जिसकी वसीयत की हो और क़र्ज़ के बाद अगर तुम्हारे कोई औलाद न हो तो तुम्हारे तरके में से तुम्हारी बीवियों का बाज़ चीज़ों में चैथाई है और अगर तुम्हारी कोई औलाद हो तो तुम्हारे तरके में से उनका ख़ास चीज़ों में आठवाँ हिस्सा है तुमने जिसके बारे में वसीयत की है उसकी तामील और क़र्ज़ के बाद और अगर कोई मर्द या औरत भाई या बहन को वारिस छोड़े तो उनमें से हर एक का ख़ास चीजों में छठा हिस्सा है और अगर उससे ज़्यादा हो तो सबके सब एक ख़ास तिहाई में शरीक़ रहेंगे और मय्यत ने जिसके बारे में वसीयत की है उसकी तामील और क़र्ज़ के बाद मगर हाँ वह वसीयत नुक़्सान पहुँचाने वाली न हो I ये वसीयत अल्लाह की तरफ़ से है और अल्लाह तो हर चीज़ का जानने वाला और बुर्दबार है
13 यह अल्लाह की हदें हैं और अल्लाह और रसूल की इताअत करे उसको अल्लाह आख़ेरत में ऐसे बाग़ों में पहुँचा देगा जिसके नीचे नहरें जारी होंगी और वह उनमें हमेशा रहेंगे और यही तो बड़ी कामयाबी है
14 और जिस ने अल्लाह व रसूल की नाफ़रमानी की और उसकी हदों से गुज़़र गया तो बस अल्लाह उसको जहन्नुम में दाखि़ल करेगा और वह उसमें हमेशा अपना किया भुगतता रहेगा और उसके लिए बड़ी रूसवाई का अज़ाब है” दो औरतों के बीच जिंसी ताल्लुक की सजा : “15 और तुम्हारी औरतों में से जो औरतें बदकारी करें तो उनकी बदकारी पर अपने लोगों में से चार गवाही लो और फिर अगर चारों गवाह उसकी तसदीक़ करें तो उनको घरों में बन्द रखो यहाँ तक कि मौत आ जाए या अल्लाह उनकी कोई राह निकाले” दो मर्दों के बीच जिंसी ताल्लुक की सजा :
“16 और तुम लोगों में से जिनसे बदकारी सरज़द हुयी हो उनको मारो पीटो फिर अगर वह दोनों तौबा करें और इस्लाह कर लें तो उनको छोड़ दो बेशक अल्लाह बड़ा तौबा कुबूल करने वाला मेहरबान है
17 मगर अल्लाह की बारगाह में तौबा तो सिर्फ उन्हीं लोगों की है जो नादानिस्ता बुरी हरकत कर बैठे फिर जल्दी से तौबा कर ले तो अल्लाह भी ऐसे लोगों की तौबा क़ुबूल कर लेता है और अल्लाह तो बड़ा जानने वाला हकीम है” मुस्लिम मुल्कों में और उनके इतिहास से यह मालूम पड़ता है कि ज़िम्मेदार लोगों के लड़कों और जवानों से ताल्लुकात रहते थे और कई मशहूर किस्से भी हैं इन ताल्लुकात के – मुनाफ़िक़ औरतों को सजा देने में बहुत तेज़ हैं और इसके बरखिलाफ बाइबिल में ईसा मसीह का कितना अच्छा किस्सा है जब उन्होंने कहा पहला पत्थर वह मारे जिसने कोई गुनाह न किया हो
“ 18 और तौबा उन लोगों के लिये नहीं है जो तो बुरे काम करते रहे यहाँ तक कि जब उनमें से किसी के सर पर मौत आ खड़ी हुयी तो कहने लगे अब मैंने तौबा की और उन लोगों के लिए नहीं है जो कुफ़्र ही की हालत में मर गये ऐसे ही लोगों के वास्ते हमने दर्दनाक अज़ाब तैयार कर रखा है” औरतों के हुकूक : लोग विरासत हड़पने के लिए किसी की वारिस औरत से ज़बरदस्ती निकाह कर लेते थे या किसी और से निकाह करने से रोक दिया करते थे “ 19 ऐ ईमान लाने वालों तुमको ये जायज़ नहीं कि औरतों के ज़बरदस्ती वारिस बन जाओ और न रोको हाँ जब वह खुल्लम खुल्ला कोई बदकारी करें और बीवियों के साथ अच्छा सुलूक करते रहो और अगर तुम किसी वजह से उन्हें नापसन्द करो अजब नहीं कि किसी चीज़ को तुम नापसन्द करते हो और अल्लाह तुम्हारे लिए उसमें बहुत बेहतरी कर दे “
20 और अगर तुम एक बीवी की जगह दूसरी बीवी तबदील करना चाहो तो अगरचे तुम बहुत सा माल दे चुके हो तो तुम उनमें से कुछ वापस न लो I क्या तुम बोहतान या सरीही जुर्म लगाकर वापस लोगे
21 कैसे लोगे जब एक दूसरे में जा चुके हो और वे तुम से पक्का क़रार ले चुकी हैं
22 और जिन औरतों से तुम्हारे बाप दादाओं से निकाह किया हो तुम उनसे निकाह न करो मगर जो हो चुका I यह बदकारी और अल्लाह की नाख़ुशी की बात ज़रूर थी और बहुत बुरा तरीक़ा था
23 हराम हैं तुम पर तुम्हारी माएं और तुम्हारी बेटियाँ नवासियाँ और तुम्हारी बहनें और तुम्हारी फुफियाँ और तुम्हारी ख़ालाएं और भतीजियाँ और भंजियाँ और तुम्हारी वह माएं जिन्होंने तुमको दूध पिलाया है और तुम्हारी रज़ाई बहनें और तुम्हारी बीवीयों की माँए और वह लड़कियां जो तुम्हारी गोद में परवरिश पा चुकी हो और उन औरतों से हैं जिनसे तुम हमबिस्तरी कर चुके हो हाँ अगर तुमने उन बीवियों से हमबिस्तरी न की तो अलबत्ता उन निकाह तुम पर कुछ गुनाह नहीं है और तुम्हारे सुलबी लड़को की बीवियाँ और दो बहनों को एक साथ मगर जो हो चुका बेशक अल्लाह बड़ा बख़्शने वाला मेहरबान है 24 और शौहरदार औरतें सिवाए उनके जो तुम्हारे कब्ज़े में हों I अल्लाह का तहरीरी हुक्म तुमपर है I और उन औरतों के सिवा तुम्हारे लिए जायज़ हैं बशर्ते इफ़्फ़त व पाकदामिनी की ग़रज़ से , बदकारी व जि़ना नहीं, बल्कि तुम अपने माल के बदले चाहो हाँ जिन औरतों से तुमने जिन्सी मिलाप किया हो तो उन्हें जो मुअय्यन किया है दे दो और मेहर के मुक़र्रर होने के बाद अगर आपस में राज़ी हो जाओ तो उसमें तुमपर कुछ गुनाह नहीं है बेशक अल्लाह वाकि़फ़ और मसलेहतों का पहचानने वाला है 25 और तुममें से जो शख़्स आज़ाद इफ़्फ़तदार औरतों से निकाह करने की माली हैसियत से क़ुदरत न रखता हो तो वह तुम्हारी उन मोमिना लौन्डियों से जो तुम्हारे कब्ज़े में हैं निकाह कर सकता है और अल्लाह तुम्हारे ईमान से ख़ूब वाकि़फ़ है तुममें एक दूसरे का हमजिन्स है बस उनके मालिकों की इजाज़त से लौन्डियों से निकाह करो और उनका मेहर हुस्ने सुलूक से दे दो मगर उन्हीं से निकाह करो जो इफ़्फ़त के साथ तुम्हारी पाबन्द रहें न तो खुले आम जि़ना करना चाहें और न चोरी छिपे से आशनाई फिर जब तुम्हारी पाबन्द हो चुकी उसके बाद कोई बदकारी करे तो जो सज़ा आज़ाद बीवियों को दी जाती है उसकी आधी लौन्डियों को दी जाएगी से निकाह कर भी सकता है तो वह शख़्स जिसको जि़ना में मुब्तिला हो जाने का ख़ौफ़ हो और सब्र करे तो तुम्हारे हक़ में ज़्यादा बेहतर है और अल्लाह बख़्शने वाला मेहरबान है
26 अल्लाह तो ये चाहता है कि एहकाम तुम लोगों से साफ़ साफ़ बयान कर दे और जो लोग तुमसे पहले गुज़र चुके हैं उनके तरीक़े पर चला दे और तुम्हारी तौबा कु़बूल करे और अल्लाह तो वाकि़फ़ और हिकमत वाला है
27 और अल्लाह तो चाहता है कि तुम्हारी तौबा क़ुबूल करे और जो लोग नफ़सियानी ख़्वाहिश के पीछे पड़े हैं वह ये चाहते हैं कि तुम लोग बहुत दूर भटक जाओ 28 और अल्लाह चाहता है कि तुमसे बार में तख़फ़ीफ़ कर दें क्योंकि आदमी तो बहुत कमज़ोर पैदा किया गया है
29 ए ईमानवालों आपस में एक दूसरे का माल नाहक़ न खा जाया करो लेकिन तुम लोगों की बाहमी रज़ामन्दी से तिजारत हो और अपने आप को हालाक मत करो अल्लाह तुम पर मेहरबान है
30 और जो जोरो ज़ुल्म से ऐसा करेगा तो हम बहुत जल्द उसको जहन्नुम की आग में झोंक देंगे यह अल्लाह के लिये आसान है” यतीमों पर माल की लालच में ज़ुल्म करने वालों के बाद वे लोग हैं जो माल की लालच में औरतों का हक मारते थे अब तीसरे वे लोग हैं जो जोर ज़बरदस्ती से या धोखे से दूसरों का माल खाते हैं यहाँ उनको तंबीह की जा रही है I “31 अगर तुम गुनाहे कबीरा से बचते रहे तो हम तुम्हारे गुनाहों से भी दरगुज़र करेगें और तुमको बहुत अच्छी इज़्ज़त की जगह पहुँचा देंगे
32 और अल्लाह ने जो तुममें से फजीलत एल पर दूसरे को दी है उसके पीछे न पड़ो I मर्दो को अपने किए का हिस्सा है और औरतों को अपने किए का हिस्सा और ये और बात है कि तुम अल्लाह से उसके फज़ल व करम की ख़्वाहिश करो अल्लाह तो हर चीज़े से वाकि़फ़ है
33 और माँ बाप और क़राबतदार जो तरका छोड़ जाए हमने हर एक का वारिस मुक़र्रर कर दिया है और जिन लोगों से तुमने मुस्तहकम एहद किया है उनका मुक़र्रर हिस्सा भी तुम दे दो बेशक अल्लाह तो हर चीज़ पर गवाह है
34 मर्दो का औरतों पर क़ाबू है क्योंकि अल्लाह ने बाज़ को बाज़ पर फ़ज़ीलत दी है औेर चूकी मर्दो ने औरतों पर अपना माल ख़र्च किया है बस नेक बख़्त बीवियाँ तो शौहरों की ताबेदारी करती हैं उनके पीठ पीछे जिस तरह अल्लाह ने हिफ़ाज़त की वह भी हिफ़ाज़त करती है और वह औरतें जिनके नाफरमान सरकश होने का तुम्हें अन्देशा हो तो पहले उन्हें समझाओ और तुम उनके साथ सोना छोड़ दो और मारो मगर इतना कि खू़न न निकले और कोई अज़ो न टूटे बस अगर वह तुम्हारी मुतीइ हो जाए तो तुम भी उनके नुक़सान की राह न ढूढो अल्लाह तो ज़रूर सबसे बरतर बुजु़र्ग है” मर्द औरत के रिश्ते का यह भी एक नाज़ुक पहलू है और शादी के कुछ दिनों के टकराव के बाद ज़्यादातर में आपसी समझ पैदा हो जाती है I
35 अगर तुम्हें मियाँ बीवी की पूरी नाइत्तेफ़ाक़ी का तरफै़न से अन्देशा हो तो एक सालिस मर्द के कुनबे में से एक और सालिस औरत के कुनबे में मुक़र्रर करो अगर ये दोनों सालिस दोनों में मेल करा देना चाहें तो अल्लाह उन दोनों के दरमियान उसका अच्छा बन्दोबस्त कर देगा अल्लाह तो बेशक वाकि़फ व ख़बरदार है
उम्माह कैसी हो , लोग कैसे हों ? “36 और अल्लाह ही की इबादत करो और किसी को उसका शरीक न बनाओ और माँ बाप और क़राबतदारों और यतीमों और मोहताजों और रिश्तेदारों पड़ोसियों और अजनबी पड़ोसियों और पहलू में बैठने वाले मुसाहिबों और पड़ोसियों और ज़र ख़रीद लौन्डी और गुलाम के साथ एहसान करो बेशक अल्लाह अकड़ के चलने वालों और शेख़ीबाज़ों को दोस्त नहीं रखता” और कौन लोग नापसंदीदा हैं ?
“37 ये वह लोग हैं जो ख़ुद तो बुख़्ल करते ही हैं और लोगों को भी बुख़्ल का हुक्म देते हैं और जो माल अल्लाह ने अपने फ़ज़ल व करम से उन्हें दिया है उसे छिपाते हैं और हमने तो कुफ़राने नेअमत करने वालों के वास्ते सख़्त जि़ल्लत का अज़ाब तैयार कर रखा है
38 और जो लोग महज़ लोगों को दिखाने के वास्ते अपने माल ख़र्च करते हैं और न अल्लाह ही पर ईमान रखते हैं और न रोजे़ आख़ेरत पर अल्लाह भी उनके साथ नहीं क्योंकि उनका साथी तो शैतान है और जिसका साथी शैतान हो तो क्या ही बुरा साथी है
39 अगर ये लोग अल्लाह और रोज़े आखि़रत पर ईमान लाते और जो कुछ अल्लाह ने उन्हें दिया है उसमें से राहे अल्लाह में ख़र्च करते तो उन पर क्या आफ़त आ जाती और अल्लाह तो उनसे ख़ूब वाकि़फ़ है
40 अल्लाह तो हरगिज़ ज़र्रा बराबर भी ज़ुल्म नहीं करता बल्कि अगर ज़र्रा बराबर भी किसी की कोई नेकी हो तो उसको दूना करता है और अपनी तरफ़ से बड़ा सवाब अता फ़रमाता है
41 भला उस वक़्त क्या हाल होगा जब हम हर गिरोह के गवाह तलब करेंगे और तुमको उन सब पर गवाह की हैसियत में तलब करेंगे
42 उस दिन जिन लोगों ने कुफ्र इख़्तेयार किया और रसूल की नाफ़रमानी की ये आरज़ू करेंगे कि काश उनके ऊपर से ज़मीन बराबर कर दी जाती और ये लोग अल्लाह से कोई बात उस दिन छुपा भी न सकेंगे” शराब, जनाबत और पाक होना:
43 ऐ ईमान लाने वालों तुम नशे की हालत में नमाज़ के क़रीब न जाओ ताकि तुम जो कुछ मुँह से कहो समझो भी तो और न जिनाबत की हालत में यहाँ तक कि ग़ुस्ल कर लो मगर राह गुज़र में हो बल्कि अगर तुम मरीज़ हो और पानी नुक़सान करे या सफ़र में हो तुममें से किसी का पैख़ाना निकल आए या औरतों से सोहबत की हो और तुमको पानी न मयस्सर हो तो पाक मिट्टी पर तैमूम कर लो और अपने मुँह और हाथों पर मिट्टी भरा हाथ फेरो तो बेशक अल्लाह माफ़ करने वाला है बख़्शने वाला है
44 क्या तुमने उन लोगों के हाल पर नज़र नहीं की जिन्हें किताबे अल्लाह का कुछ हिस्सा दिया गया था वह लोग गुमराही ख़रीदने लगे उनकी ऐन मुराद यह है कि तुम भी राहे रास्त से बहक जाओ
45 और अल्लाह तुम्हारे दुशमनों से ख़ूब वाकि़फ़ है और दोस्ती के लिए बस अल्लाह काफ़ी है और हिमायत के वास्ते भी अल्लाह ही काफ़ी है
46 यहूद से कुछ लोग ऐसे भी हैं जो बातों में उनके महल व मौक़े से हेर फेर डाल देते हैं और अपनी ज़बानों को मरोड़कर और दीन पर तानाज़नी की राह से तुमसे समेअना व असैना (हमने सुना और नाफ़रमानी की) और वसमअ गै़रा मुसमइन (तुम मेरी सुनो अल्लाह तुमको न सुनवाए) राअना (मेरा ख़्याल करो मेरे चरवाहे) कहा करते हैं और अगर वह इसके बदले समेअना व अताअना (हमने सुना और माना) और इसमाआ (मेरी सुनो) और (राअना) के एवज़ उनजुरना (हमपर निगाह रख) कहते तो उनके हक़ में कहीं बेहतर होता और बिल्कुल सीधी बात थी मगर उनपर तो उनके कुफ़्र की वजह से अल्लाह की फि़टकार है
47 बस उनमें से चन्द लोगों के सिवा और लोग ईमान ही न लाएंगे ऐ एहले किताब जो (किताब) हमने नाजि़ल की है और उस (किताब) की भी तस्दीक़ करती है जो तुम्हारे पास है उस पर इमान लाओ मगर क़ब्ल इसके कि हम कुछ लोगों के चेहरे बिगाड़कर उनके पुश्त की तरफ़ फेर दें या जिस तरह हमने असहाबे सबत (हफ़्ते वालों) पर फिटकार बरसायी वैसी ही फिटकार उनपर भी करें
और अल्लाह का हुक्म किया कराया हुआ काम समझो 48 अल्लाह उस जुर्म को तो अलबत्ता नहीं माफ़ करता कि उसके साथ शिर्क किया जाए हाँ उसके सिवा जो गुनाह हो जिसको चाहे माफ़ कर दे और जिसने अल्लाह का शरीक बनाया तो उसने बड़े गुनाह का तूफान बांधा” हर मजहब के ठेकेदार ऐसे ही मुक़द्दस होने का ढोंग रचते हैं आज यही हालत मुसलामानों में भी है :
“49 क्या तुमने उन लोगों के हाल पर नज़र नहीं की जो आप बड़े मुक़द्दस बनते हैं बल्कि अल्लाह जिसे चाहता है मुक़द्दस बनाता है और ज़ुल्म तो किसी पर धागे के बराबर हो ही गा नहीं
50 ज़रा देखो तो ये लोग अल्लाह पर कैसे कैसे झूठ तूफ़ान जोड़ते हैं और खुल्लम खुल्ला गुनाह के वास्ते तो यही काफ़ी है
51 क्या तुमने उन लोगों पर नज़र नहीं की जिन्हें किताबे अल्लाह का कुछ हिस्सा दिया गया था और वे जिब्त और ताकूत पर ईमान ले आये और जिन लोगों ने कुफ़्र इख़्तेयार किया है उनकी निस्बत कहने लगे कि ये तो इमान लाने वालों से ज़्यादा राहे रास्त पर हैं
52 यही वह लोग हैं जिनपर अल्लाह ने लानत की है और जिस पर अल्लाह ने लानत की है तुम उनका मददगार हरगिज़ किसी को न पाओगे
53 क्या दुनिया की मिलकियत में कुछ उनका भी हिस्सा है तो लोगों को तिनका भर भी न देंगे
54 यह अल्लाह ने जो अपने फ़ज़ल से लोगों को अता फ़रमाया है इसके रश्क पर जले जाते हैं ? हमने तो इबराहीम की औलाद को किताब और अक़्ल की बातें अता फ़रमायी हैं और उनको बहुत बड़ी सल्तनत भी दी 55 फिर कुछ लोग तो इस पर ईमान लाए और कुछ लोगों ने उससे इन्कार किया और इसकी सज़ा के लिए जहन्नुम की दहकती हुयी आग काफ़ी है
56 जिन लोगों ने हमारी आयतों से इन्कार किया उन्हें ज़रूर अनक़रीब जहन्नुम की आग में झोंक देंगे खालें जल जाएंगी तो हम उनके लिए दूसरी खालें देंगे ताकि वह अच्छी तरह अज़ाब का मज़ा चखें बेशक अल्लाह हरचीज़ पर ग़ालिब और हिकमत वाला है
57 और जो लोग ईमान लाए और अच्छे अच्छे काम किए हम उनको अनक़रीब ही ऐसे ऐसे बाग़ों में जा पहुँचाएंगे जिन के नीचे नहरें जारी होंगी और उनमें हमेशा रहेंगे वहां उनकी साफ़ सुथरी बीवियाँ होंगी और उन्हे घनी छाव में ले जाकर रखेंगे” अमानत अमानतदारों को लौटा दो :
“58 ऐ ईमान लाने वालों अल्लाह तुम्हें हुक्म देता है कि लोगों की अमानतें अमानत रखने वालों के हवाले कर दो और जब लोगों के बाहमी झगड़ों का फै़सला करने लगो तो इन्साफ़ से फै़सला करो इसकी क्या ही अच्छी नसीहत करता है इसमें तो शक नहीं कि अल्लाह सबकी सुनता है देखता है
59 ऐ ईमान लाने वालों अल्लाह की इताअत करो और रसूल की और जो तुममें से साहेबाने हुकूमत हों उनकी इताअत करो और अगर तुम किसी बात में झगड़ा करो बस अगर तुम अल्लाह और रोज़े आखि़रत पर इमान रखते हो तो इस अम्र में अल्लाह और रसूल की तरफ़ रूजू करो यही तुम्हारे हक़ में बेहतर है और अन्जाम की राह से बहुत अच्छा है “ यह कौन लोग हैं जो उम्माह की तशकील में रुकावटें डाल रहे हैं – शामिल भी हैं और मुखालिफ भी ?
“60 क्या तुमने उन लोगों पर नज़र नहीं की जो दावा तो यह करते हैं कि जो किताब तुम पर नाजि़ल की गयी और जो किताबें तुम से पहले नाजि़ल की गयी ईमान लाए और इरादा करते हैं कि तागूत को अपना हाकिम बनाएं हालांकि उनको हुक्म दिया गया कि उसकी बात न मानें और शैतान तो यह चाहता है कि उन्हें बहका के बहुत दूर ले जाए
61 और जब उनसे कहा जाता है कि अल्लाह ने जो किताब नाजि़ल की है उसकी तरफ़ और रसूल की तरफ़ रूजू करो तो तुम मुनाफि़क़ीन को देखते हो कि तुमसे किस तरह मुँह फेर लेते हैं
62 कैसे जब उनपर उनके करतूत की वजह से कोई मुसीबत पड़ती है तो फिर तुम्हारे पास अल्लाह की क़समें खाते हैं कि हमारा मतलब नेकी और मेल मिलाप के सिवा कुछ न था ये वह लोग हैं कि कुछ अल्लाह ही उनके दिल की हालत ख़ूब जानता है
63 बस तुम उनसे दरगुज़र करो और उनको नसीहत करो और उनसे उनके दिल में असर करने वाली बात कहो 64और हमने कोई रसूल नहीं भेजा मगर इस वास्ते कि अल्लाह के हुक्म से लोग उसकी इताअत करें और जब उन लोगों ने अपनी जानों पर जु़ल्म किया था अगर तुम्हारे पास चले आते और अल्लाह से माफ़ी माँगते और रसूल भी उनकी मग़फि़रत चाहते तो बेशक वह लोग अल्लाह को बड़ा तौबा क़ुबूल करने वाला मेहरबान पाते 65 बस तुम्हारे रब की क़सम ये लोग सच्चे मोमिन न होंगे जब तक कि अपने बाहमी झगड़ों में तुमको अपना हाकिम न बनाएं फिर जो कुछ तुम फै़सला करो उससे किसी तरह दिलतंग भी न हों बल्कि ख़ुशी ख़ुशी उसको मान लें
66 अगर उनपर ये हुक्म जारी कर देते कि तुम अपने आपको क़त्ल कर डालो या शहर बदर हो जाओ तो उनमें से चन्द आदमियों के सिवा ये लोग तो उसको न करते और अगर ये लोग इस बात पर अमल करते जिसकी उन्हें नसीहत की जाती है तो उनके हक़ में बहुत बेहतर होता और बहुत साबित क़दमी 67 और इस सूरत में हम भी अपनी तरफ़ से ज़रूर बड़ा अच्छा बदला देते और 68 हिदायत करते राहे रास्त की
69 और जिस ने अल्लाह और रसूल की इताअत की तो ऐसे लोग उन बन्दों के साथ होंगे जिन्हें अल्लाह ने अपनी नेअमतें दी हैं -अम्बिया और सिद्दीक़ीन और शोहदा और सालेहीन और ये लोग क्या ही अच्छे रफ़ीक़ हैं 70 ये अल्लाह का फ़ज़ल (व करम) है और अल्लाह तो काफी है सब जानने वाला” जिहाद और एहतियात : “71 ऐ ईमानवालों अपनी हिफ़ाज़त के अच्छी तरह देखभाल लो फिर चाहे दस्ता दस्ता निकलो या सबके सब इकट्ठे होकर निकल खड़े हो” मुनाफ़िक़ और जिहाद:
“72 और तुममें कोई ऐसा भी है जो पीछे रहेगा फिर अगर तुमपर कोई मुसीबत आ पड़ी तो कहने लगे अल्लाह ने हमपर बड़ा फ़ज़ल किया कि मैं उन के साथ मौजूद न हुआ
73 और अगर तुमपर अल्लाह ने फ़ज़ल किया तो इस तरह गोया तुममें उसमें कभी मोहब्बत ही न थी यॅू कहने लगा कि ऐ काश उनके साथ होता तो मैं भी बड़ी कामयाबी हासिल करता
74 बस उन्हें अल्लाह की राह में जेहाद करना चाहिए जो दुनिया की जि़न्दगी आख़ेरत के वास्ते दे बेच दे और जिसने अल्लाह की राह में जेहाद किया फिर शहीद हुआ या ग़ालिब आया तो हम उसको बड़ा अज्र अता फ़रमायेंगे
75 तुमको क्या हो गया है कि अल्लाह की राह में उन कमज़ोर और बेबस मर्दो और औरतों और बच्चों के वास्ते जेहाद नहीं करते जो अल्लाह से दुआएं मांग रहे हैं कि ऐ हमारे पालने वाले किसी तरह इस बस्ती से जिसके बाशिन्दे बड़े ज़ालिम हैं हमें निकाल और अपनी तरफ़ से किसी को हमारा सरपरस्त बना और अपनी तरफ से हमारा मददगार बना
76 ईमानवाले तो अल्लाह की राह में लड़ते हैं और कुफ़्फ़ार तागूत की राह में लड़ते हैं बस तुम शैतान के साथियों से लड़ो और शैतान का दाव तो बहुत ही बोदा है” जिहाद और कुछ ईमान के कमज़ोर लोग
77 क्या तुमने उन लोगों पर नज़र नहीं की जिनको हुक्म दिया गया था कि अपने हाथ रोके रहो और पाबन्दी से नमाज़ पढ़ो और ज़कात दिए जाओ मगर जब जिहाद का हुक्म दिया गया तो उनमें से कुछ लोग लोगों से इस तरह डरने लगे जैसे कोई अल्लाह से डरे बल्कि उससे कहीं ज़्यादा और कहने लगे अल्लाह तूने हमपर जेहाद क्यों वाजिब कर दिया हमको कुछ दिनों की और मोहलत क्यों न दी उनसे कह दो कि दुनिया की आसाइश बहुत थोड़ा सा है और जो तक्वा रखता है उसकी आख़ेरत उससे कहीं बेहतर है और वहां तो रेशा बराबर भी तुम लोगों पर जु़ल्म नहीं किया जाएगा 78 तुम चाहे जहाँ हो मौत तो तुमको ले डालेगी अगरचे तुम कैसे ही मज़बूत पक्के गुम्बदों में जा छुपो I और उनको अगर कोई भलाई पहुँचती है तो कहने लगते हैं कि ये अल्लाह की तरफ़ से है और अगर उनको कोई तकलीफ़ पहुँचती है तो कहने लगते हैं कि ये तुम्हारी बदौलत है तुम कह दो कि सब अल्लाह की तरफ़ से है बस उन लोगों को क्या हो गया है कि कोई बात समझने के करीब नहीं हैं
79 जब तुमको कोई तकलीफ़ पहुँचे तो अल्लाह की तरफ़ से है और जब तुमको कोई फ़ायदा पहुचे तो ख़ुद तुम्हारे नफस से है I और हमने तुमको लोगों के पास रसूल बनाकर भेजा है और अल्लाह ही गवाह काफ़ी है
80 जिसने रसूल की इताअत की तो उसने अल्लाह की इताअत की और जिसने रूगरदानी की तो हमने तुम को पासबान करके नहीं भेजा है “ कैसे हैं यह मुनाफ़िक़ :
81 वे कहते हैं कि हम फ़रमाबरदार हैं लेकिन जब तुम्हारे पास से बाहर निकले तो उनमें से कुछ लोग जो कुछ तुमसे कह चुके थे उसके खि़लाफ़ रातों को मशवरा करते हैं हालांकि जो करते हैं उसे अल्लाह लिखता जाता है उनसे अलग रहो अल्लाह पर भरोसा रखो और अल्लाह कारसाज़ी के लिए काफ़ी है
82 क्या ये लोग क़ुरान में भी ग़ौर नहीं करते कि अगर अल्लाह के सिवा किसी और की तरफ़ से होता तो ज़रूर उसमें बड़ा इख़्तेलाफ़ पाते
83 और जब उनके पास अमन या ख़ौफ़ की ख़बर आयी तो उसे फ़ौरन मशहूर कर देते हैं हालांकि अगर वह उसकी ख़बर को रसूल जो साहबाने अम्र तक पहुँचाते तो बेशक जो लोग उनमें से उसकी तहक़ीक़ करने वाले हैं उसको समझ लेते I और अगर तुमपर अल्लाह का फ़ज़ल और उसकी मेहरबानी न होती तो चन्द आदमियों के सिवा तुम सबके सब शैतान की पैरवी करने लगते
84 बस तुम अल्लाह की राह में जिहाद करो और तुम अपनी ज़ात के सिवा किसी और के ज़िम्मेदार नहीं हो और ईमान लाने वालों को जिहाद की तरग़ीब दो और अनक़रीब अल्लाह काफि़रों की ताक़त को रोक दे और अल्लाह की ताक़त सबसे ज़्यादा है और उसकी सज़ा बहुत सख़्त है
85 जो अच्छे काम की सिफ़ारिश करे तो उसको भी उस काम के सवाब से कुछ हिस्सा मिलेगा और जो बुरे काम की सिफ़ारिश करे तो उसको भी उसी काम की सज़ा का कुछ हिस्सा मिलेगा और अल्लाह तो हर चीज़ पर निगेहबान है” सलाम का जवाब बहतर सलाम:
86 और जब कोई सलाम करे तो तुम भी उसके जवाब में उससे बेहतर तरीक़े से सलाम करो या वही लफ़्ज़ जवाब में कह दो बेशक अल्लाह हर चीज़ का हिसाब करने वाला है
87 अल्लाह तो वही रब है जिसके सिवा कोई क़ाबिले परस्तिश नहीं वह तुमको क़यामत के दिन जिसमें ज़रा भी शक नहीं ज़रूर इकट्ठा करेगा और अल्लाह से बढ़कर बात में सच्चा कौन होगा मुनाफिकों के बारे में आज भी दो ग्रुप:
88 तुमको क्या हो गया है कि तुम मुनाफि़क़ों के बारे में दो फ़रीक़ हो गए हो हालांकि ख़ुद अल्लाह ने उनके करतूतों की बदौलत उनकी अक़्लों को उलट पुलट दिया है क्या तुम ये चाहते हो कि जिसको अल्लाह ने गुमराही में छोड़ दिया है तुम उसे राहे रास्त पर ले आओ हालांकि अल्लाह ने जिसको गुमराही में छोड़ दिया है उसके लिए तुममें से कोई रास्ता निकाल ही नहीं सकता” मक्का में ठहरे मुनाफ़िक़ :
“89 उन लोगों की ख़्वाहिश तो ये है कि जिस तरह वह काफि़र हो गए तुम भी काफि़र हो जाओ ताकि तुम उनके बराबर हो जाओ बस जब तक वह अल्लाह की राह में हिजरत न करें तो उनमें से किसी को दोस्त न बनाओ फिर अगर वह उससे भी मुँह मोड़ें तो उन्हें गिरफ़्तार करो और जहाँ पाओ उनको क़त्ल करो और उनमें से किसी को न अपना दोस्त बनाओ न मददगार” शायद उहद में मुसलामानों के नुकसान के बाद एक बार फिर मुनाफिकों को मौक़ा मिल गया था मुसलामानों को वापस फेर लें तो उन मक्का के मुनाफिकों पर हिजरत करने की शर्त लगी है अगर नहीं मानते तो काफिर हैं और उसी सजा के मुस्तहक हैं
“ 90 मगर जो लोग किसी ऐसी क़ौम से जा मिलें कि तुममें और उनमें एहद व पैमान हो चुका है या तुमसे जंग करने या अपनी क़ौम के साथ लड़ने से दिलतंग होकर तुम्हारे पास आए हों और अगर अल्लाह चाहता तो उनको तुमपर ग़लबा देता तो वह तुमसे ज़रूर लड़ पड़ते बस अगर वह तुमसे किनारा कशी करे और तुमसे न लड़े और तुम्हारे पास सुलाह का पैग़ाम दे तो तुम्हारे लिए उन लोगों पर आज़ार पहुँचाने की अल्लाह ने कोई सबील नहीं निकाली
91 अनक़रीब तुम कुछ ऐसे और लोगों को भी पाओगे जो चाहते हैं कि तुमसे भी अमन में रहें और अपनी क़ौम से भी अमन मे रहें जब कभी झगड़े की तरफ़ बुलाए गए तो उसमें औंधे मुँह के बल गिर पड़े बस अगर वह तुमसे न किनारा कशी करें और न तुम्हें सुलह का पैग़ाम दें और न लड़ाई से अपने हाथ रोकें बस उनको पकड़ों और जहाँ पाओ उनको क़त्ल करो और यही वह लोग हैं जिनपर हमने तुम्हें सरीही ग़लबा अता फ़रमाया
92 और किसी ईमानवाले को ये जायज़ नहीं कि किसी ईमान वाले को जान से मार डाले मगर धोखे से और जो किसी मोमिन को धोखे से मार डाले तो एक साहिबे ईमान गु़लाम का आज़ाद करना और मक़तूल के क़राबतदारों को खूंन बहा देना है मगर जब वह लोग माफ़ करें फिर अगर मक़तूल उन लोगों में से हो वह जो तुम्हारे दुश्मन हैं और ख़ुद क़ातिल मोमिन है तो एक मुसलमान ग़ुलाम का आज़ाद करना और अगर मक़तूल उन लोगों में का हो जिनसे तुम से एहद व पैमान हो चुका है तो वारिसे मक़तूल को ख़ून बहा देना और एक बन्दए मोमिन का आज़ाद करना है फि़र जो न कर पाये तो उसका कुफ़्फ़ारा अल्लाह की तरफ़ से लगातार दो महीने के रोज़े हैं और अल्लाह ख़ूब वाकिफ़कार हिकमत वाला है
93 और जो किसी मोमिन को जानबूझ के मार डाले उसकी सज़ा जहन्नम है और वह उसमें हमेशा रहेगा उसपर अल्लाह ने ग़ज़ब ढाया है और उसपर लानत की है और उसके लिए बड़ा सख़्त अज़ाब तैयार कर रखा है जो सलाम करे उसे लूटने क़त्ल करने का कोई जवाज़ नहीं !
“94 ऐ ईमान लाने वालों जब तुम अल्लाह की राह में सफ़र करो तो अच्छी तरह जाच कर लिया करो और जो तुम्हे सलाम करे तो तुम बे सोचे समझे न कह दिया करो कि तू ईमानदार नहीं है कि तुम दुनियावी आसाइश की तमन्ना रखते हो मगर इसी बहाने क़त्ल करके लूट लो और ये नहीं समझते कि तो अल्लाह के यहाँ बहुत से ग़नीमतें हैं पहले तुम ख़़ुद भी तो ऐसे ही थे फिर अल्लाह ने तुमपर एहसान किया ग़रज़ ख़ूब छानबीन कर लिया करो बेशक अल्लाह तुम्हारे हर काम से ख़बरदार है
95 बिना माजूरी के घर में बैठने वाले और अल्लाह की राह में अपने जान व माल से जिहाद करने वाले हरगिज़ बराबर नहीं हो सकते - अपने जान व माल से जिहाद करने वालों को घर बैठे रहने वालें पर अल्लाह ने दरजे के एतबार से बड़ी फ़ज़ीलत दी है अल्लाह ने सब से भलाई का वायदा कर लिया है मगर मुजाहिदीन को काएदीन पर अल्लाह ने बड़ी फ़ज़ीलत दी है
96 अपनी तरफ़ से बड़े बड़े दरजे और बखि़्शश और रहमत और अल्लाह तो बड़ा बख़्शने वाला मेहरबान है” हिजरत क्यों न की ?
“97 बेशक जिन लोगों की क़ब्जे़ रूह फ़रिश्ते ने उस वक़त की है कि अपनी जानों पर ज़ुल्म कर रहे थे और फ़रिश्ते कब्जे़ रूह के बाद पूछते हैं तुम कैसे तो वह कहते है कि हम तो रूए ज़मीन में बेकस थे तो फ़रिश्ते कहते हैं कि अल्लाह की ज़मीन में इतनी सी गुन्जाइश न थी कि तुम हिजरत करके चले जाते बस ऐसे लोगों का ठिकाना जहन्नुम है और वह बुरा ठिकाना है
98 मगर जो मर्द और औरतें और बच्चे इस क़दर बेबस हैं कि न तो काई तदबीर कर सकते हैं और उनको अपनी रिहाई की कोई राह दिखाई देती है
99 तो उम्मीद है कि अल्लाह ऐसे लोगों से दरगुज़रे करे और अल्लाह तो बड़ा माफ़ करने वाला और बख्शने वाला है
100 और जो अल्लाह की राह में हिजरत करेगा तो वह रूए ज़मीन में बा फ़राग़त बहुत से कुशादा मक़ाम पाएगा और जो अपने घर से जिलावतन होकर अल्लाह और उसके रसूल की तरफ़ निकल ख़ड़ा हुआ फिर उसे उस तक पहुँचने से पहले मौत आ जाए तो अल्लाह पर उसका सवाब लाजि़म हो गया और अल्लाह तो बड़ा बख़्श ने वाला मेहरबान है ही
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