Wednesday, July 5, 2017

मेरे साथ 1400 वर्ष पूर्व मदीने का सफ़र कीजिये और सच्चे इस्लाम और मोमिनों को पहचानिए – 8



मेरे साथ 1400 वर्ष पूर्व मदीने का सफ़र कीजिये और सच्चे इस्लाम और मोमिनों को पहचानिए 8
(90) 33  सूरए अल अहज़ाब                                                              “1 ऐ नबी अल्लाह ही से डरते रहो और काफिरों और मुनाफिक़ों की बात न मानो इसमें शक नहीं कि अल्लाह  बड़ा वाकि़फकार हकीम है।
2 और तुम्हारे रब की तरफ से तुम्हारे पास जो वहीकी जाती है उसी की पैरवी करो तुम लोग जो कुछ कर रहे हो अल्लाह  उससे यक़ीनी अच्छा तरह आगाह है।                     सुबह से शाम तक नबी अपने असहाब से घिरे रहते थे और इनमें वे भी थे जो मुनाफ़िक़ थे और हक़ीक़तन काफिर थे ( अल्लाह के मुनकिर ) मुनाफ़िक़ दिल में रिसालत के मुनकिर थे पर ज़बान से इकरार करते थे आगे सूरह अल मुनाफिकून में उनका ज़िक्र आएगा   
“3 और अल्लाह  ही पर भरोसा रखो और अल्लाह  ही कारसाजी के लिए काफी है
4 अल्लाह ने किसी आदमी के सीने में दो दिल नहीं पैदा किये और न उसने तुम्हारी बीवियों को जिन से तुम जे़हार करते हो तुम्हारी माएँ बना दी और न उसने तुम्हारे लै पालकों को तुम्हारे बेटे बना दिये। ये तो फ़क़त तुम्हारी मुँह बोली बात  है और अल्लाह  तो सच्ची कहता है और सीधी राह दिखाता है।
5 लै पालकों का उनके बापों के नाम से पुकारा करो यही अल्लाह  के नज़दीक बहुत ठीक है हाँ अगर तुम लोग उनके असली बापों को न जानते हो तो तुम्हारे दीनी भाई और दोस्त हैं और हाँ इसमें भूल चूक जाओ तो अलबत्ता उसका तुम पर कोई इल्ज़ाम नहीं है मगर जब तुम दिल से जानबूझ कर करो  और अल्लाह  तो बड़ा बख्शने वाला मेहरबान है।
6 नबी तो मोमिनीन से खु़द उनकी जानों से भी बढ़कर हक़ रखते हैं  और उनकी बीवियाँ उनकी माएँ हैं और मोमिनीन व मुहाजिरीन में से क़राबतदार हैं। किताबें अल्लाह  की रूह से एक दूसरे के ज्यादा हक़दार हैं मगर तुम अपने दोस्तों के साथ सुलूक करना चाहो ये तो किताबे में लिखा हुआ है
7 और याद करो जब हमने और पैग़म्बरों से और ख़ास तुमसे और नूह और इबराहीम और मूसा और मरियम के बेटे ईसा से एहदो पैमाने लिया और उन लोगों से हमने सख़्त एहद लिया था
8 ताकि सच्चों से उनकी सच्चाई का हाल दरियाफ्त करें और काफिरों के वास्ते तो उसने दर्दनाक अज़ाब तैयार ही कर रखा है।                                                  9 ऐ ईमान लाने वालों  अल्लाह  की उन नेअमतों को याद करो जो उसने तुम पर नाजि़ल की हैं जब तुम पर लशकर आ पड़ा तो उन पर आँधी भेजी और ऐसा लश्कर भेजा जिसको तुमने देखा तक नहीं और तुम जो कुछ कर रहे थे अल्लाह  उसे खू़ब देख रहा था
10 जिस वक़्त वह लोग तुम पर तुम्हारे ऊपर से आ पड़े और तुम्हारे नीचे की तरफ से भी पिल गए और जिस वक़्त तुम्हारी आँखें ख़ैरा हो गयीं थी और कलेजे मुँह को आ गए थे और अल्लाह पर तरह-तरह के ख़्याल करने लगे थे।
11 यहाँ पर मोमिनों का इम्तिहान लिया गया था और ख़ूब अच्छी तरह झिंझोड़े गए थे।
12 और जिस वक़्त मुनाफेक़ीन और वह लोग जिनके दिलों में मरज़ था कहने लगे थे कि अल्लाह  ने और उसके रसूल ने जो हमसे वायदे किए थे वह बस बिल्कुल धोखे की टट्टी था।                                                                  वे कौन लोग थे जो मुनाफ़िक़ थे और जिनके दिल में मर्ज़ था जिन्होंने कहा अल्लाह और रसूल का वादा सिर्फ धोखा था ? ज़ाहिर है वे करीबी सहाबा ही तो थे !
“13 और अब उनमें का एक गिरोह कहने लगा था कि ऐ मदीने वालों अब  तुम्हारे कहीं ठिकाना नहीं तो पलट चलो और उनमें से कुछ लोग रसूल से इजाज़त माँगने लगे थे कि हमारे घर बिल्कुल ख़ाली पड़े हुए हैं - हालाँकि वह ख़ाली न थे  वह लोग तो बस भागना चाहते हैं
14 और अगर ऐसा ही लश्कर उन लोगों पर मदीने के एतराफ से आ पड़े और उन से फसाद करने की दरख़्वास्त की जाए तो ये लोग उसके लिए आ मौजूद हों
और अपने घरों में भी बहुत कम तवक़्कु़फ़ करेंगे                                               15 हालाँकि उन लोगों ने पहले ही अल्लाह  से एहद किया था कि हम दुश्मन के मुक़ाबले में पीठ न फेरेगें और अल्लाह  के एहद की पूछगछ तो होकर रहेगी
16 कह दो कि अगर तुम मौत और क़त्ल से भागे भी तो भागना तुम्हें हरगिज़ कुछ भी मुफ़ीद न होगा बस यही न चन्द रोज़ की मोहलत
17 कह दो कि अल्लाह बुराई का इरादा करे या भलाई का तो कौन रोक सकता है और ये लोग अल्लाह  के सिवा न तो किसी को अपना सरपरस्त पाएँगे और न मद्दगार
18 कह दो अल्लाह  उनको खू़ब जानता है जो लोग  रोकते हैं और जो अपने भाई बन्दों से कहते हैं कि हमारे पास चले भी आओ और लड़ाई के लिए बस एक ज़रा आओ
19 और चल दो और जब कोई ख़ौफ आ पड़ा तो देखते हो कि तुम्हारी तरफ देखते हैं उनकी आँखें इस तरह घूमती हैं जैसे किसी शख्स पर मौत की बेहोशी छा जाए फिर वह ख़ौफ जाता रहा और ईमान लाने वालों  की फतेह हुयी तो माल पर गिरते पड़ते फौरन तुम पर अपनी तेज़ ज़बानों से ताना कसने लगे ये लोग ईमान ही नहीं लाए तो अल्लाह  ने भी इनका किया कराया सब अकारत कर दिया और ये तो अल्लाह  के वास्ते एक आसान बात थी
20 ये लोग अभी यही समझ रहे हैं कि लश्कर अभी नहीं गए और अगर कहीं  लश्कर फिर आ पहुँचे तो ये लोग चाहेंगे कि काश वह जंगलों में गँवारों में जा बसते और तुम्हारे हालात दरयाफ़्त करते रहते और अगर उनको तुम लोगों में रहना पड़ता तो फ़क़त ज़रा ज़हूर लड़ते                                                  जिनके दिलों में निफाक था जंग में उनके क्या अंदाज़ थे यह यहाँ बयान किया गया है  
21 “तुम्हारे वास्ते तो खु़द रसूल अल्लाह का एक अच्छा नमूना था उस के वास्ते है जो अल्लाह  और रोजे़ आखे़रत की उम्मीद रखता हो और अल्लाह  की याद बाकसरत करता हो                                                                  22 और जब ईमान लाने वालों  ने लश्करों को देखा तो कहने लगे कि ये वही चीज़ तो है जिसका हम से अल्लाह  ने और उसके रसूल ने वायदा किया था और अल्लाह  ने और उसके रसूल ने बिल्कुल ठीक कहा था और उनका ईमान और उनकी इताअत और भी  ज्यादा हो गया
23 ईमान लाने वालों  में से कुछ लोग ऐसे भी हैं कि अल्लाह  से उन्होंने जो एहद किया था उसे पूरा कर दिखाया ग़रज़ उनमें से बाज़ वह हैं जो अपना वक़्त पूरा कर गए और उनमें से बाज़ मुन्तजि़र बैठे हैं और उन लोगों ने ज़रा भी नहीं बदली
24 ताकि अल्लह सच्चे को उनकी सच्चाई की जज़ाए ख़ैर दे और अगर चाहे तो मुनाफेक़ीन की सज़ा करे या अल्लाह  उनकी तौबा कु़बूल फरमाए इसमें शक नहीं कि अल्लाह  बड़ा बख्शने वाला मेहरबान है
25 और अल्लाह  ने क़ाफिरों को फेर दिया उनकी झुंझलाहट में और इन्हें कुछ फायदे भी न हुआ और अल्लाह  काफी है मोमिनीन को उनकी जंग में मददगार और अल्लाह  ज़बरदस्त ग़ालिब हैं
26 और एहले किताब में से जिन लोगों ने उन की मदद की थी अल्लाह  उनको उनके कि़लों से नीचे उतार लाया और उनके दिलों में ऐसा रोब बैठा दिया कि तुम उनके कुछ लोगों को क़त्ल किया और कुछ को क़ैद
27 तुम ही लोगों को उनकी ज़मीन और उनके घर और उनके माल और उस ज़मीन का अल्लाह  ने मालिक बना दिया जिसमें तुमने क़दम तक नहीं रखा था और अल्लाह  तो हर चीज़ पर क़ादिर है                                                   मानव इतिहास में बहुत खून खराबा हुआ है और ऐसा ही एक  वाकिया बनू क़ुरैज़ा का है जिसमें उनके करीब 1000 से ऊपर मर्द थे जो क़त्ल कर दिए गए और औरतें बच्चे असीर बना दिए गए और यह हुक्म यहूदियों के कानून के तहत किया गया बहरहाल क्या हालात थे कहना मुश्किल है आज की दुनिया में यह ज़ुल्म है और एक सवालिया निशान है I
“28 ऐ रसूल अपनी बीवियों से कह दो कि अगर तुम दुनियावी जि़न्दगी और उसकी आराइश व ज़ीनत की ख्वाहा हो तो आओ मैं तुम लोगों को कुछ साज़ो सामान दे दूँ और उनवाने शाइस्ता से रूख़सत कर दूँ
29और अगर तुम लोग अल्लाह  और उसके रसूल और आखे़रत के घर की ख्वाहा हो तो तुम लोगों में से नेकोकार औरतों के लिए अल्लाह  ने यक़ीनन् बड़ा अज्र मुहय्या कर रखा है
30 ऐ पैग़म्बर की बीबियों तुममें से जो कोई किसी सरीही ना शाइस्ता हरकत की का मुरतिब हुयी तो उसका अज़ाब भी दुगना बढ़ा दिया जाएगा और अल्लाह  के वास्ते आसान है
31 और तुममें से जो अल्लाह  और उसके रसूल की ताबेदारी अच्छे काम करेगी उसको हम उसका सवाब भी दोहरा अता करेगें और हमने उसके लिए इज़्ज़त की रोज़ी तैयार कर रखी है
32 ऐ नबी की बीवियों तुम और दूसरी औरतों की तरह नहीं हो  अगर तुम को परहेज़गारी मंजू़र रहे तो बात करने में नरम नरम बात न करो ताकि जिसके दिल में मर्ज़ है वह गलत ख्वाहिश करे बल्कि शायस्ता बात करो
33 अपने घरों में निचली बैठी रहो और अगले ज़माने जाहिलियत की तरह अपना बनाव सिंगार न दिखाती फिरो और पाबन्दी से नमाज़ पढ़ा करो और ज़कात दिया करो और अल्लाह  और उसके रसूल की इताअत करो ऐ अहले बैत अल्लाह  तो बस ये चाहता है कि तुमको बुराई से दूर रखे और जो पाक व पाकीज़ा रखने का हक़ है वैसा पाक व पाकीज़ा रखे
34 और तुम्हारे घरों में जो अल्लाह  की आयतें और हिकमत पढ़ी जाती हैं उनको पढ़ा करो कि बेशक अल्लाह बड़ा बारीक है वाकि़फकार है                                    किनके लिए  मगफिरत और अजरे अज़ीम है ?
35 मुसलमान मर्द और मुसलमान औरतें और ईमानदार मर्द और ईमानदार औरतें और फरमाबरदार मर्द और फरमाबरदार औरतें और रास्तबाज़ मर्द और रास्तबाज़ औरतें और सब्र करने वाले मर्द और सब्र करने वाली औरतें और फिरौतनी करने वाले मर्द और फिरौतनी करने वाली औरतें और खैरात करने वाले मर्द और खैरात  करने वाली औरतें और रोज़ादार मर्द और रोज़ादार औरतें और अपनी शर्मगाहों की हिफाज़त करने वाले मर्द और हिफाज़त करने वाली औरतें और अल्लाह  की बकसरत याद करने वाले मर्द और याद करने वाली औरतें बेशक इन सब लोगों के वास्ते अल्लाह  ने मग़फिरत और सवाब मुहैय्या कर रखा है
36 और न किसी ईमानदार मर्द को ये मुनासिब है और न किसी ईमानदार औरत को जब अल्लाह  और उसके रसूल किसी काम का हुक्म दें तो उनको अपने उस काम  अख़तेयार हो और जिस ने अल्लाह  और उसके रसूल की नाफरमानी की वह यक़ीनन खुल्लम खुल्ला गुमराही में मुब्तिला हो चुका
37 और जब तुम उस से कह रहे थे जिस पर अल्लाह  ने एहसान किया था और तुमने उस पर एहसान किया था कि अपनी बीबी को अपनी ज़ौजि़यत में रहने दे और अल्लाह  से डरो तो  खु़द तुम इस बात को अपने दिल में छिपाते थे जिसको  अल्लाह  ज़ाहिर करने वाला था और तुम लोगों से डरते थे हालांकि अल्लाह  इसका ज़्यादा हक़दार है कि तुम उस से डरो ग़रज़ जब ज़ैद अपनी हाजत पूरी कर चुका तो हमने उस औरत का निकाह तुमसे कर दिया ताकि आम मोमिनीन को अपने ले पालक लड़कों की बीवियों में जब वह अपना मतलब उन औरतों से पूरा कर चुकें किसी तरह की तंगी न रहे और अल्लाह  का हुक्म तो किया कराया हुआ  होता है                                                                             यह शादी का वाकेया भी ऐसा था जिस पर फितना खड़ा हुआ शायद इसी के बाद या पहले रसूल की बीवियों ने मुखालिफत की जिसके बाद उन्हें छोड़ने तक की बात हो गयी  
“38 जो हुक्म अल्लाह  ने पैग़म्बर पर फर्ज़ कर दिया उसे करने में कोई हर्ज नहीं जो लोग  पहले गुज़र चुके हैं उनके बारे में भी अल्लाह  का दस्तूर रहा है  और अल्लाह  का हुक्म तो पूरा हुआ होता ही है
39 वह लोग जो अल्लाह  के पैग़ामों को पहुँचाते थे और उससे डरते थे और अल्लाह  के सिवा किसी से नहीं डरते थे और हिसाब लेने के वास्ते तो अल्लाह  काफ़ी है
40 मोहम्मद तुम्हारे मर्दों में से किसी के बाप नहीं हैं  बल्कि अल्लाह के रसूल और नबियों की मोहर हैं और अल्लाह  तो हर चीज़ से खू़ब वाकि़फ है
41 ऐ ईमानवालों बाकसरत अल्लाह  की याद किया करो और
42 सुबह व शाम उसकी तसबीह करते रहो
43 वह वही तो है जो खु़द तुमपर दूरूद भेजता है और उसके फ़रिश्ते ताकि तुमको तारीकि़यों से निकालकर रौशनी में ले जाए और अल्लाह  ईमानवालों पर बड़ा मेहरबान है
44 जिस दिन उसकी बारगाह में हाजि़र होंगे सलाम और अल्लाह  ने तो उनके वास्ते बहुत अच्छा बदला तैयार रखा है
45 ऐ नबी हमने तुमको गवाह और खुशख़बरी देने वाला और डराने वाला बना कर भेजा है
46 और अल्लाह  की तरफ उसी के हुक्म से बुलाने वाला और रौशन चिराग़
47 मोमिनीन को खुशख़बरी दे दो कि उनके लिए अल्लाह  की तरफ से बहुत बड़ी  बख़्शिश है
48 और काफिरों और मुनाफिक़ों की इताअत न करना और उनकी नाराज़गी का ख़्याल छोड़ दो और अल्लाह  पर भरोसा रखो और कारसाज़ी में अल्लाह  काफ़ी है
49 ऐ ईमानवालों जब तुम मोमिना औरतों से निकाह करो उसके बाद उन्हें अपने हाथ लगाने से पहले ही तलाक़ दे दो तो फिर तुमको उनपर कोई हक़ नहीं कि  इद्दा पूरा कराओ उनको तो कुछ देकर उनवाने शाइस्ता से रूख़सत कर दो
50 ऐ नबी हमने तुम्हारे वास्ते तुम्हारी उन बीवियों को हलाल कर दिया है जिनको तुम मेहर दे चुके हो और उन लौंडियों को जो अल्लाह  ने तुमको अता की है और तुम्हारे चचा की बेटियाँ और तुम्हारी फूफियों की बेटियाँ और तुम्हारे मामू की बेटियाँ और तुम्हारी ख़ालाओं की बेटियाँ जो तुम्हारे साथ हिजरत करके आयी हैं हलाल कर दी और हर ईमानवाली औरत अगर वह अपने को नबी को दे दें और नबी भी उससे निकाह करना चाहते हों मगर ये हुक्म सिर्फ तुम्हारे वास्ते ख़ास है और मोमिनीन के लिए नहीं और हमने जो कुछ आम मोमिनीन पर उनकी बीवियों और उनकी लौंडियों के बारे में मुक़र्रर कर दिया है हम खू़ब जानते हैं और  ताकि तुमको कोई दिक़्क़त न हो और अल्लाह  तो बड़ा बख़शने वाला मेहरबान है
51 इनमें से जिसको चाहो अलग कर दो और जिसको चाहो अपने पास रखो और जिन औरतों को तुमने अलग कर दिया था अगर फिर तुम उनके ख्वाहा हो तो भी तुम पर कोई मज़ाएक़ा नहीं है ये ज़रूर इस क़ाबिल है कि तुम्हारी बीवियों की आँखें ठन्डी रहे और आर्जूदा ख़ातिर न हो और वो कुछ तुम उन्हें दे दो सबकी सब उस पर राज़ी रहें और जो कुछ तुम्हारे दिलों में है अल्लाह  उसको ख़ुब जानता है और अल्लाह  तो बड़ा वाकि़फकार बुर्दबार है
52  अब उन के बाद औरतें तुम्हारे वास्ते हलाल नहीं और न ये जायज़ है कि उनके बदले उनमें से किसी को छोड़कर और बीबियाँ कर लो अगर चे तुमको उनका हुस्न कैसा ही भला  मालूम हो मगर तुम्हारी लौंडियाँ और अल्लाह  तो हर चीज़ का निगरा है
53 ऐ ईमान लाने वालों  तुम लोग पैग़म्बर के घरों में न जाया करो मगर जब तुमको खाने के वास्ते इजाज़त दी जाए उसके पकने का इन्तेज़ार  न करो मगर जब तुमको बुलाया जाए तो  जाओ और फिर जब खा चुको तो  चले जाया करो और बातों में न लग जाया करो क्योंकि इससे पैग़म्बर को अज़ीयत होती है तो वह तुम्हारा लैहाज़ करते हैं और अल्लाह  तो ठीक से झेंपता नहीं और जब पैग़म्बर की बीवियों से कुछ माँगना हो तो पर्दे के बाहर से माँगा करो यही तुम्हारे दिलों और उनके दिलों के वास्ते बहुत सफाई की बात है और तुम्हारे वास्ते ये जायज़ नहीं कि रसूले अल्लाह  को अज़ीयत दो और न ये जायज़ है कि तुम उसके बाद कभी उनकी बीवियों से निकाह करो बेशक ये अल्लाह के नज़दीक बड़ा (गुनाह) है
54 चाहे किसी चीज़ को तुम ज़ाहिर करो या उसे छिपाओ अल्लाह  तो हर चीज़ से यक़ीनी खू़ब आगाह है
55 औरतों पर न अपने बाप दादाओं  में कुछ गुनाह है और न अपने बेटों के और न अपने भाईयों के और न अपने भतीजों के और अपने भांजों के और न अपनी औरतों के और न अपनी लौंडियों के सामने होने में कुछ गुनाह है  तुम लोग अल्लाह  से डरती रहो इसमें कोई शक ही नहीं की अल्लाह हर चीज़ से वाकि़फ़ है
56 इसमें भी शक नहीं कि अल्लाह  और उसके फरिश्ते पैग़म्बर  पर दुरूद भेजते हैं तो ऐ ईमान लाने वालों  तुम भी दुरूद भेजते रहो और बराबर सलाम करते रहो
57 बेशक जो लोग अल्लाह को और उसके रसूल को अज़ीयत देते हैं उन पर अल्लाह  ने दुनिया और आखे़रत  में लानत की है और उनके लिए रूसवाई का अज़ाब तैयार कर रखा है
58 और जो लोग ईमानदार मर्द और ईमानदार औरतों को बगै़र कुछ किए अज़ीयत देते हैं तो वह एक बोहतान और सरीह गुनाह का बोझ उठाते हैं
59 ऐ नबी अपनी बीवियों और अपनी लड़कियों और मोमिनीन की औरतों से कह दो कि  अपने पर अपनी चादरों का घूंघट  डाल लिया करें  ये उनकी पहचान के वास्ते बहुत मुनासिब है तो उन्हें कोई छेड़ेगा नहीं और अल्लाह  तो बड़ा बख़्शने वाला मेहरबान है
60 मुनाफेक़ीन और वह लोग जिनके दिलों में मर्ज़  है और जो लोग मदीने में बुरी ख़बरें उड़ाया करते हैं- अगर ये लोग बाज़ न आयेंगे तो हम तुम को  उन पर मुसल्लत कर देगें फिर वह तुम्हारे पड़ोस में चन्द रोज़ों के सिवा ठहरने  न पाएँगे
61 लानत के मारे जहाँ कहीं हत्थे चढ़े पकड़े गए और फिर बुरी तरह मार डाले गए
62 जो लोग पहले गुज़र गए उनके बारे में अल्लाह  की  आदत  रही और तुम अल्लाह  की आदत में तब्दीली  न पाओगे
63 लोग तुमसे क़यामत की घड़ी के बारे में पूछा करते हैं कह दो कि उसका इल्म तो बस अल्लाह  को है और तुम क्या जानो शायद क़यामत क़रीब ही हो
64 अल्लाह ने क़ाफिरों पर यक़ीनन लानत की है और उनके लिए जहन्नुम को तैयार कर रखा है
65 जिसमें वह हमेशा अबदल आबाद रहेंगे न किसी को अपना सरपरस्त पाएँगे न मद्दगार
66 जिस दिन उनके मुँह जहन्नुम की तरफ फेर दिए जाएँगें तो उस दिन अफ़सोसनाक लहजे़ में कहेंगे ऐ काश हमने अल्लाह  की इताअत की होती और रसूल का कहना माना होता
67 और कहेंगे कि परवरद्गिार हमने अपने सरदारों अपने बड़ों का कहना माना तो उन्हों ही ने हमें गुमराह कर दिया
68 परवरद्गिारा उन लोगों पर दोहरा अज़ाब नाजि़ल कर और उन पर बड़ी से बड़ी लानत कर
69 ऐ ईमानवालों  तुम लोग भी उनके से न हो जाना जिन्होंने मूसा को तकलीफ दी तो अल्लाह  ने उनकी तोहमतों से मूसा को बरी कर दिया और मूसा अल्लाह  के नज़दीक एक इज़्ज़त वाले थे
70 ऐ ईमानवालों अल्लाह  से डरते रहो और  दुरूस्त बात कहा करो
71 तो अल्लाह  तुम्हारी कारगुज़ारियों को दुरूस्त कर देगा और तुम्हारे गुनाह बख़्श देगा और जिस ने अल्लाह  और उसके रसूल की इताअत की वह बड़ा कामयाब हुआ  
72 बेशक हमने अपनी अमानत  को सारे आसमान और ज़मीन पहाड़ों के सामने पेश किया तो उन्होंने उसके  उठाने से इन्कार किया और उससे डर गए और आदमी ने उसे  उठा लिया बेशक इन्सान  बड़ा ज़ालिम  नादान है
73 इसका नतीजा यह हुआ कि अल्लाह  मुनाफिक़ मर्दों और मुनाफिक़ औरतों और मुशरिक मर्दों और मुशरिक औरतों को सज़ा देगा और ईमानदार मर्दों और ईमानदार औरतों की तौबा क़ुबूल फरमाएगा और अल्लाह  तो बड़ा बख़शने वाला मेहरबान है                                                                                 इस सूरे में उम्माह को रसूल का एहतराम करना, उनकी बीवियां उम्मुल मोमिनीन हैं और मोमिनीन को रसूल पर दुरूद भेजना चाहिए बताया गया है I रसूल ने जो शादी अपने मुंह बोले बेटे की बीवी से की थी उस पर इस्लाम दुश्मनों ने बहुत ज्यादा बवाल मचाया है और आज भी इन्टरनेट पर खूब खूब उछाला जाता जैसे कि कोई एक से ज्यादा शादी नहीं करता या किसी दूसरे की बीवी पर फ़रेफ्ता नहीं होता I                                                                      कुदरत ने मर्द औरत के बीच जिस्मानी रिश्ता बनाया है जिससे औलाद पैदा होती है और नस्ल आगे बढ़ती है और हर ऐसा जोड़ा हकीकत में शौहर बीवी है लेकिन इस पुरुष प्रधान  समाज में मर्द दूसरी औरत को बीवी का दर्जा देना नहीं चाहता – चाहे औरत नौकरानी हो, वेश्या हो, रखैल हो मातहत हो जो भी हो अगर उससे बच्चा पैदा हो तो बच्चे के माँ बाप कौन हुए ? ज़ाहिर है वही जिनके बीच जिस्मानी रिश्ता बना तो वे शौहर बीवी भी हुए और बच्चा न भी पैदा हो तब भी शौहर बीवी हुए I                                                                  अब जो इंसान बिना शादी किये जिस्मानी रिश्ते को हराम समझता है और औरत से शादी करता है तो वह औरत पर एहसान करता है उसे इज्ज़त और अपना नाम देता है समाज में मक़ाम देता है – रसूल ने यही किया I जो भी बादशाह हुए हैं उन्होंने ऐसा ही किया है I यह भी हकीकत है कि बादशाहों की अब क्या बात करें आम इंसानों में बिना शादी के अनेक रिश्ते कायम होते रहते हैं I मध्य वर्ग  में लोग एक शादी कर के ज़िन्दगी काट लेते हें पर उच्च और निम्न वर्ग में ज्यादा शादियाँ होती रहती हैं और इसका कारण सामाजिक आर्थिक है – उच्च वर्ग अपनी अमीरी के कारण और निम्न वर्ग अपनी फटेहाली के कारण सीमा उल्लंघन करता रहता है I बहुपत्नी विवाह के और भी सामाजिक आर्थिक कारण हैं I                               इस सूरे में दूसरा मामला बनू क़ुरैज़ा यहूदी कबीले को दी गयी सख्त सजा है जिसमें एहद शिकनी की सज़ा के तौर पर मर्दों को क़त्ल कर दिया गया और औरतों बच्चों को असीर बना दिया गया – शायद उस वक़्त उम्माह इतनी ग़ैर महफूज़ हो गयी थी कि इस्लाम के दुश्मन काफिरों को यहूदियों की दौलत और रसूख़ से ताक़त मिल गयी थी जिसकी कमर तोड़ने के लिए ऐसा सख्त क़दम उठाना पड़ा I अमेरिका के ज़रिये हिरोशिमा नागासाकी पर बमबारी, अफ़ग़ानिस्तान और इराक पर फौजी कार्यवाही, ड्रोन हमले , गोरों के ज़रिये रेड इंडियन क़बीलों को ख़त्म करना ऐसे हज़ारों  इंसानियत को शरमसार करने वाले वाकियात हैं I                    औरतों को हुक्म दिय गया है कि मुंह पर घूंघट डाल लिया करें शायद नबी की उस शादी के बाद मदीने की सड़कों गलियों पर फालतू खड़े होने वाले लोग औरतों पर तानाकशी करने लगे थे इसलिए यह एहतियात बरती गयी थी और उन लोगों को भी सख्त तंबीह दी गयी थी – कुरान में कहीं ऐसा हुक्म नहीं है की औरतें बिना न महरम मर्द को साथ लिए घर के बाहर न निकलें !                                         (91) 60  सूरए अल मुम्तहिनह
“1 ऐ ईमान लाने वालों मेरे और अपने दुशमनों को दोस्त न बनाओ तुम उनके पास दोस्ती का पैग़ाम भेजते हो और जो दीन हक़ तुम्हारे पास आया है उससे वह लोग इनकार करते हैं वह लोग रसूल को और तुमको इस बात पर निकालते हैं कि तुम अपने रब अल्लाह पर ईमान ले आए हो अगर तुम मेरी राह में जेहाद करने और मेरी ख़ुशनूदी की तमन्ना में निकलते हो तुम हो कि उनके पास छुप छुप के दोस्ती का पैग़ाम भेजते हो हालांकि तुम कुछ भी छुपा कर या बिल एलान करते हो मैं उससे ख़ूब वाकि़फ़ हूँ और तुममें से जो शख़्स ऐसा करे तो वह सीधी राह से यक़ीनन भटक गया
2 अगर ये लोग तुम पर क़ाबू पा जाएँ तो तुम्हारे दुश्मन हो जाएँ और ईज़ा के लिए तुम्हारी तरफ़ अपने हाथ भी बढ़ाएँगे और अपनी ज़बाने भी और चाहते हैं कि काश तुम भी काफ़िर हो जाओ
3 क़यामत के दिन न तुम्हारे रिश्ते नाते ही कुछ काम आएँगे न तुम्हारी औलाद  तो वही फ़ैसला कर देगा और जो कुछ भी तुम करते हो अल्लाह उसे देख रहा है
4 तुम्हारे वास्ते तो इबराहीम और उनके साथियों का अच्छा नमूना मौजूद है कि जब उन्होने अपनी क़ौम से कहा कि हम तुमसे और उन से जिन्हें तुम अल्लाह के सिवा पूजते हो बेज़ार हैं हम तो तुम्हारे  मुनकिर हैं और जब तक तुम यकता अल्लाह पर ईमान न लाओ हमारे तुम्हारे दरमियान खुल्लम खुल्ला अदावत व दुशमनी क़ायम हो गयी मगर इबराहीम ने अपने बाप से ये कहा कि मैं आपके लिए मग़फि़रत की दुआ ज़रूर करूँगा और अल्लाह के सामने तो मैं आपके वास्ते कुछ एख़्तेयार नहीं रखता ऐ हमारे पालने वाले  हमने तुझी पर भरोसा कर लिया है और तेरी ही तरफ़ हम रूजू करते हैं और तेरी तरफ़ हमें लौट कर जाना है                      5 ऐ हमारे पालने वाले तू हम लोगों को काफि़रों की आज़माइश न क़रार दे और रब तू हमें बख्श दे बेशक तू ग़ालिब हिकमत वाला है
6 उन लोगों के अफ़आल का तुम्हारे वास्ते जो अल्लाह और रोज़े आख़ेरत की उम्मीद रखता हो अच्छा नमूना है और जो मुँह मोड़े तो अल्लाह भी यक़ीनन बेपरवा सज़ावारे हम्द है
7 करीब है कि अल्लाह तुम्हारे और उनमें से तुम्हारे दुश्मनों के दरमियान दोस्ती पैदा कर दे और अल्लाह तो क़ादिर है और अल्लाह बड़ा बख्शने वाला मेहरबान है
8 जो लोग तुमसे तुम्हारे दीन के बारे में नहीं लड़े भिड़े और न तुम्हें घरों से निकाले उन लोगों के साथ एहसान करने और उनके साथ इन्साफ़ से पेश आने से अल्लाह तुम्हें मना नहीं करता बेशक अल्लाह इन्साफ़ करने वालों को दोस्त रखता है
9 अल्लाह तो बस उन लोगों के साथ दोस्ती करने से मना करता है जिन्होने तुमसे दीन के बारे में लड़ाई की और तुमको तुम्हारे घरों से निकाल बाहर किया, और तुम्हारे निकालने में मदद की और जो लोग ऐसों से दोस्ती करेंगे वह लोग ज़ालिम हैं
10 ऐ ईमान लाने वालों  जब तुम्हारे पास ईमानदार औरतें वतन छोड़ कर आएँ तो तुम उनको आज़मा लो, अल्लाह तो उनके ईमान से वाकिफ़ है ही, पस अगर तुम भी उनको ईमानदार समझो तो उन्ही काफि़रों के पास वापस न फेरो न ये औरतें उनके लिए हलाल हैं और न वह कुफ़्फ़ार उन औरतों के लिए हलाल हैं और उन कुफ्फ़ार ने जो कुछ ख़र्च किया हो उनको दे दो, और जब उनका महर उन्हें दे दिया करो तो इसका तुम पर कुछ गुनाह नहीं कि तुम उससे निकाह कर लो और काफ़िर औरतों की आबरू अपने कब्ज़े में न रखो और तुमने जो कुछ (उन पर) ख़र्च किया हो लो, और उन्होने भी जो कुछ ख़र्च किया हो तुम से माँग लें यही अल्लाह का हुक्म है जो तुम्हारे दरमियान सादिर करता है और अल्लाह वाकि़फ़कार हकीम है
11 और अगर तुम्हारी बीवियों में से कोई औरत तुम्हारे हाथ से निकल कर काफिरों के पास चली जाए और  और तुम  जिनकी औरतें चली गयीं हैं उनको इतना दे दो जितना उनका ख़र्च हुआ है और जिस अल्लाह पर तुम लोग ईमान लाए हो उससे डरते रहो
12 ऐ रसूल जब तुम्हारे पास ईमानदार औरतें तुमसे इस बात पर बैयत करने आएँ कि वह न किसी को अल्लाह का शरीक बनाएँगी और न चोरी करेंगी और न जे़ना करेंगी और न अपनी औलाद को मार डालेंगी और न अपने हाथ पाँव के सामने कोई बोहतान गढ़ के लाएँगी, और न किसी नेक काम में तुम्हारी नाफ़रमानी करेंगी तो तुम उनसे बैयत ले लो और अल्लाह से उनके मग़फि़रत की दुआ माँगो बेशक बड़ा अल्लाह बख़्षने वाला मेहरबान है
13 ऐ ईमान लाने वालों  जिन लोगों पर अल्लाह ने अपना ग़ज़ब ढाया उनसे दोस्ती न करो आख़ेरत से भी ये लोग न उम्मीद हैं जिस तरह काफि़र क़ब्र वालों की उम्मीद नहीं रखते”                                                                                              उम्माह में कुछ लोग काफिरों से दोस्ती रखना चाहते है उनसे भी जिन्होंने रसूल और महाजरीन को बेघर किया था और उनके खिलाफ जिहाद  करना भी मुतव्क्के था लेकिन आगे मुमकिन था अल्लाह दोस्ती करा दे पर अभी उनसे छुप छुप कर दोस्ती करना उम्माह की हिफाज़त को खतरे में डालना था – इसी की तालीम इस सूरे में दी गयी है I                                                                                             ईमान की तलवार से मियां बीवी के रिश्ते भी  कटने शुरू हो गए थे ऐसी ईमान वाली औरतें थीं जिनके शौहर काफिर थे और ऐसे ईमान वाले मर्द थे जिनकी बीवियां काफिर थीं तो अलगाव होना ही था I जो औरतें ईमान वालों के पास आयें उनके लिए यह शर्त थी “वह न किसी को अल्लाह का शरीक बनाएँगी और न चोरी करेंगी और न जे़ना करेंगी और न अपनी औलाद को मार डालेंगी और न अपने हाथ पाँव के सामने कोई बोहतान गढ़ के लाएँगी, और न किसी नेक काम में रसूल की नाफ़रमानी करेंगी                                                                                              जो काफिर शौहरों ने खर्च किया है उन्हें दे दिया जाए और जो मोमिन शौहरों ने खर्च किया है वह काफिरों से वसूल कर लिया जाए I                                                 हज़रत इब्राहीम और उनके साथियों का नमूना सामने था जिन्होंने ईमान की खातिर अपनों से बेजारी कर ली थी I                                                                             


मेरे साथ 1400 वर्ष पूर्व मदीने का सफ़र कीजिये और सच्चे इस्लाम और मोमिनों को पहचानिए

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