मेरे
साथ 1400 वर्ष पूर्व मदीने का सफ़र कीजिये और सच्चे इस्लाम और मोमिनों को पहचानिए – 5
(88) 8 सूर: अनफ़ाल
“1 तुम से लोग अनफाल के बारे में पूछा करते हैं तुम कह दो कि अनफाल मख़सूस अल्लाह और रसूल के वास्ते है तो अल्लाह से डरो अपने बाहमी मामलात की असलाह करो और अगर तुम सच्चे हो तो अल्लाह की और उसके रसूल की इताअत करो
2 सच्चे ईमानदार तो बस वही लोग हैं कि जब अल्लाह का जि़क्र किया जाता है तो उनके दिल हिल जाते हैं और जब उनके सामने उसकी आयतें पढ़ी जाती हैं तो उनके इमान को और भी ज़्यादा कर देती हैं और वह लोग बस अपने रब ही पर भरोसा रखते हैं
3 नमाज़ को पाबन्दी से अदा करते हैं और जो हम ने उन्हें दिया हैं उसमें से ख़र्च करते हैं
4 यही तो सच्चे ईमानदार हैं उन्हीं के लिए उनके रब के यहाँ दरजे हैं और बक्शीश और इज़्ज़त और आबरू के साथ रोज़ी है
5 जिस तरह तुम्हारे रब ने तुम्हें बिल्कुल ठीक तुम्हारे घर से में निकाला था और मोमिनीन का एक गिरोह नाखुश था”
“1 तुम से लोग अनफाल के बारे में पूछा करते हैं तुम कह दो कि अनफाल मख़सूस अल्लाह और रसूल के वास्ते है तो अल्लाह से डरो अपने बाहमी मामलात की असलाह करो और अगर तुम सच्चे हो तो अल्लाह की और उसके रसूल की इताअत करो
2 सच्चे ईमानदार तो बस वही लोग हैं कि जब अल्लाह का जि़क्र किया जाता है तो उनके दिल हिल जाते हैं और जब उनके सामने उसकी आयतें पढ़ी जाती हैं तो उनके इमान को और भी ज़्यादा कर देती हैं और वह लोग बस अपने रब ही पर भरोसा रखते हैं
3 नमाज़ को पाबन्दी से अदा करते हैं और जो हम ने उन्हें दिया हैं उसमें से ख़र्च करते हैं
4 यही तो सच्चे ईमानदार हैं उन्हीं के लिए उनके रब के यहाँ दरजे हैं और बक्शीश और इज़्ज़त और आबरू के साथ रोज़ी है
5 जिस तरह तुम्हारे रब ने तुम्हें बिल्कुल ठीक तुम्हारे घर से में निकाला था और मोमिनीन का एक गिरोह नाखुश था”
स्पष्ट है कि उम्माह के आम मुसलमान पूरी तरह ईमान पर थे सिर्फ यह ख़ास बड़े लोग
थे जिनके मन में निफाक था और जब घर से निकलने को कहा गया तो यह नाखुश हो गए –
अल्लाह से और रसूल से I क्या दुनिया
में कहीं कभी किसी इन्किलाब में किसी ने ऐसा किया हो और फिर भी बचा रहे इज्ज़तदार
बना रहे और बाद में हड़प भी ले ?
“6 कि वह लोग हक़ के ज़ाहिर होने के बाद भी तुमसे सच्ची बात में झगड़तें थें और इस तरह गोया मौत के मुँह में ढकेले जा रहे हैं और उसे देख रहे हैं और
“6 कि वह लोग हक़ के ज़ाहिर होने के बाद भी तुमसे सच्ची बात में झगड़तें थें और इस तरह गोया मौत के मुँह में ढकेले जा रहे हैं और उसे देख रहे हैं और
7 जब अल्लाह तुमसे वायदा कर रहा था कि
दो जमाअतों में से एक तुम्हारे लिए ज़रूरी हैं और तुम ये चाहते थे कि कमज़ोर जमाअत
तुम्हारे हाथ लगे और अल्लाह ये चाहता था कि अपनी बातों से हक़ को साबित करें और
काफिरों की जड़ काट डाले
8 ताकि हक़ को साबित कर दे और बातिल का मिटियामेट कर दे अगर चे गुनाहगार नाखुश ही क्यों न हो
9 जब तुम अपने परवदिगार से फरियाद कर रहे थे उसने तुम्हारी सुन ली और जवाब दे दिया कि मैं तुम्हारी लगातार हज़ार फरिश्तों से मदद करूँगा
10 और अल्लाह ने सिर्फ तुम्हारी ख़ातिर के लिए की थी और तुम्हारे दिल मुतमइन हो जाय और मदद अल्लाह के सिवा और कहीं से नहीं होती बेशक अल्लाह ग़ालिब हिकमत वाला है
8 ताकि हक़ को साबित कर दे और बातिल का मिटियामेट कर दे अगर चे गुनाहगार नाखुश ही क्यों न हो
9 जब तुम अपने परवदिगार से फरियाद कर रहे थे उसने तुम्हारी सुन ली और जवाब दे दिया कि मैं तुम्हारी लगातार हज़ार फरिश्तों से मदद करूँगा
10 और अल्लाह ने सिर्फ तुम्हारी ख़ातिर के लिए की थी और तुम्हारे दिल मुतमइन हो जाय और मदद अल्लाह के सिवा और कहीं से नहीं होती बेशक अल्लाह ग़ालिब हिकमत वाला है
11 ये वह वक़्त था
जब अपनी तरफ से इत्मिनान देने के लिए तुम पर नींद को ग़ालिब कर रहा था और तुम पर
आसमान से पानी बरस रहा था ताकि उससे तुम्हें पाक कर दे और तुम से शैतान की गन्दगी
दूर कर दे और तुम्हारे दिल मज़बूत कर दे और तुम्हारे क़दम जमाए रहे
12 जब तुम्हारा रब फरिश्तों से फरमा रहा था कि मै यकीनन तुम्हारे साथ हूँ तुम ईमान लाने वालों को साबित क़दम रखो मै बहुत जल्द काफिरों के दिलों में खौफ डाल दूँगा तो उनकी गर्दनों पर मारो और उनकी पोर पोर को चटिया कर दो
13 ये इसलिए है कि उन लोगों ने अल्लाह और उसके रसूल की मुख़ालिफ की और जो शख़्स अल्लाह और उसके रसूल की मुख़ालफ़त करेगा तो अल्लाह बड़ा सख़्त अज़ाब करने वाला है
14 लो फिर सज़ा चखो और काफिरों के वास्ते जहन्नुम का अज़ाब ही है
15 ऐ ईमान लाने वालों जब तुमसे कुफ़्फ़ार से मैदाने जंग में मुक़ाबला हुआ तो उनकी तरफ पीठ न फेरना
16 उस शख़्स के सिवा जो लड़ाई के दांव पेच में या किसी जमाअत के पास मिलने के लिये पलटे जो शख़्स भी उस दिन पीठ फेरेगा वह यक़ीनी अल्लाह के ग़जब में आ गया और उसका ठिकाना जहन्नुम ही हैं और वह क्या बुरा ठिकाना है”
12 जब तुम्हारा रब फरिश्तों से फरमा रहा था कि मै यकीनन तुम्हारे साथ हूँ तुम ईमान लाने वालों को साबित क़दम रखो मै बहुत जल्द काफिरों के दिलों में खौफ डाल दूँगा तो उनकी गर्दनों पर मारो और उनकी पोर पोर को चटिया कर दो
13 ये इसलिए है कि उन लोगों ने अल्लाह और उसके रसूल की मुख़ालिफ की और जो शख़्स अल्लाह और उसके रसूल की मुख़ालफ़त करेगा तो अल्लाह बड़ा सख़्त अज़ाब करने वाला है
14 लो फिर सज़ा चखो और काफिरों के वास्ते जहन्नुम का अज़ाब ही है
15 ऐ ईमान लाने वालों जब तुमसे कुफ़्फ़ार से मैदाने जंग में मुक़ाबला हुआ तो उनकी तरफ पीठ न फेरना
16 उस शख़्स के सिवा जो लड़ाई के दांव पेच में या किसी जमाअत के पास मिलने के लिये पलटे जो शख़्स भी उस दिन पीठ फेरेगा वह यक़ीनी अल्लाह के ग़जब में आ गया और उसका ठिकाना जहन्नुम ही हैं और वह क्या बुरा ठिकाना है”
आगे उहद में हम
देखेंगे बड़े बड़े किस तरह फरार हो गए थे I
17 और उन को कुछ तुमने तो क़त्ल किया नही बल्कि उनको तो अल्लाह ने क़त्ल किया और जब तुमने तीर मारा तो कुछ तुमने नही मारा बल्कि ख़़ुद अल्लाह ने तीर मारा और ताकि मोमिनीन को भली तरह आजमा ले बेशक अल्लाह सुनता और जानता है
18 ये तो अल्लाह है जो काफिरों की चालों और दांव को कमज़ोर कर देने वाला है
19 अगर तुम ये चाहते थे कि फ़तेह हो तो फ़तेह भी तुम्हारे सामने आ मौजूद हुयी अब क्या गु़रूर और अगर तुम बाज़ रहो तो तुम्हारे वास्ते बेहतर है और अगर कहीं तुम पलट पड़े तो हम भी पलट पड़ेगें और तुम्हारी जमाअत अगरचे बहुत ज़्यादा भी हो हरगिज़ कुछ काम न आएगी और अल्लाह तो यक़ीनी मामिनीन के साथ है
20 ऐ ईमान लाने वालों अल्लाह और उसके रसूल की इताअत करो और उससे मुँह न फेरो अगर तुम सुन रहे हो”
17 और उन को कुछ तुमने तो क़त्ल किया नही बल्कि उनको तो अल्लाह ने क़त्ल किया और जब तुमने तीर मारा तो कुछ तुमने नही मारा बल्कि ख़़ुद अल्लाह ने तीर मारा और ताकि मोमिनीन को भली तरह आजमा ले बेशक अल्लाह सुनता और जानता है
18 ये तो अल्लाह है जो काफिरों की चालों और दांव को कमज़ोर कर देने वाला है
19 अगर तुम ये चाहते थे कि फ़तेह हो तो फ़तेह भी तुम्हारे सामने आ मौजूद हुयी अब क्या गु़रूर और अगर तुम बाज़ रहो तो तुम्हारे वास्ते बेहतर है और अगर कहीं तुम पलट पड़े तो हम भी पलट पड़ेगें और तुम्हारी जमाअत अगरचे बहुत ज़्यादा भी हो हरगिज़ कुछ काम न आएगी और अल्लाह तो यक़ीनी मामिनीन के साथ है
20 ऐ ईमान लाने वालों अल्लाह और उसके रसूल की इताअत करो और उससे मुँह न फेरो अगर तुम सुन रहे हो”
आगे उहद में मौक़ा
आयेगा जब रसूल पुकारते रहे बड़े बड़े भागते रहे I
21 और उन लोगों के ऐसे न हो जाओं जो कहते थे कि हम सुन रहे हैं हालाकि वह सुनते न थे”
21 और उन लोगों के ऐसे न हो जाओं जो कहते थे कि हम सुन रहे हैं हालाकि वह सुनते न थे”
फतह के इस मौके
पर इतनी ताकीद किस लिए ? यह आगे आने वाले हालात का पेश खेमा हैं और इस जंग में भी
जब फतह हासिल हुयी मुनाफिकों के जंग के तरीके कुछ देखने वालों को दिख रहे होंगे
I
“22 इसमें शक नहीं कि ज़मीन पर चलने वाले तमाम हैवानात से बदतर अल्लाह के नज़दीक वह बहरे गूँगे हैं जो कुछ नहीं समझते
23 और अगर अल्लाह उनमें नेकी देखता तो ज़रूर उनमें सुनने की क़ाबलियत अता करता मगर ये ऐसे हैं कि अगर उनमें सुनने की क़ाबिलयत भी देता तो मुँह फेर कर भागते।
24 ऐ ईमानदार जब तुम को अल्लाह और रसूल बुलाए तो सुनो यह तुम्हें जिंदगी देगा अल्लाह आदमी और उसके दिल के दरमियान इस तरह आ जाता है और ये भी समझ लो कि तुम सबके सब उसके सामने हाजि़र किये जाओगे
25 और उस फितने से डरते रहो जो ख़ास उन्हीं लोगों पर नही पड़ेगा जिन्होने तुम में से ज़ुल्म किया और यक़ीन मानों कि अल्लाह बड़ा सख़्त अज़ाब करने वाला है
26 याद करो जब तुम ज़मीन पर बहुत कम और बिल्कुल बेबस थे उससे सहमे जाते थे कि कहीं लोग तुमको उचक न ले जाए तो अल्लाह ने तुमको पनाह दी और ख़ास अपनी मदद से तुम्हारी ताईद की और तुम्हे पाक व पाकीज़ा चीज़े खाने को दी ताकि तुम शुक्र गुज़ारी करो
27 ऐ ईमान लाने वालों न तो अल्लाह और रसूल की ख़्यानत करो और न अपनी अमानतों में ख़्यानत करो हालाँकि समझते बूझते हो
28 और यक़ीन जानों कि तुम्हारे माल और तुम्हारी औलाद तुम्हारी आज़माइश की चीज़े हैं कि जो उनकी मोहब्बत में भी अल्लाह को न भूले और वह दीनदार है
और यक़ीनन अल्लाह के पास बड़ा इनाम है
“22 इसमें शक नहीं कि ज़मीन पर चलने वाले तमाम हैवानात से बदतर अल्लाह के नज़दीक वह बहरे गूँगे हैं जो कुछ नहीं समझते
23 और अगर अल्लाह उनमें नेकी देखता तो ज़रूर उनमें सुनने की क़ाबलियत अता करता मगर ये ऐसे हैं कि अगर उनमें सुनने की क़ाबिलयत भी देता तो मुँह फेर कर भागते।
24 ऐ ईमानदार जब तुम को अल्लाह और रसूल बुलाए तो सुनो यह तुम्हें जिंदगी देगा अल्लाह आदमी और उसके दिल के दरमियान इस तरह आ जाता है और ये भी समझ लो कि तुम सबके सब उसके सामने हाजि़र किये जाओगे
25 और उस फितने से डरते रहो जो ख़ास उन्हीं लोगों पर नही पड़ेगा जिन्होने तुम में से ज़ुल्म किया और यक़ीन मानों कि अल्लाह बड़ा सख़्त अज़ाब करने वाला है
26 याद करो जब तुम ज़मीन पर बहुत कम और बिल्कुल बेबस थे उससे सहमे जाते थे कि कहीं लोग तुमको उचक न ले जाए तो अल्लाह ने तुमको पनाह दी और ख़ास अपनी मदद से तुम्हारी ताईद की और तुम्हे पाक व पाकीज़ा चीज़े खाने को दी ताकि तुम शुक्र गुज़ारी करो
27 ऐ ईमान लाने वालों न तो अल्लाह और रसूल की ख़्यानत करो और न अपनी अमानतों में ख़्यानत करो हालाँकि समझते बूझते हो
28 और यक़ीन जानों कि तुम्हारे माल और तुम्हारी औलाद तुम्हारी आज़माइश की चीज़े हैं कि जो उनकी मोहब्बत में भी अल्लाह को न भूले और वह दीनदार है
और यक़ीनन अल्लाह के पास बड़ा इनाम है
29 है ऐ
ईमान लाने वालों अगर तुम अल्लाह से डरते रहोगे तो वह तुम्हारे वास्ते इम्तियाज़
पैदा करे देगा और तुम्हारी तरफ से तुम्हारे गुनाह का कफ़्फ़ारा क़रार देगा और
तुम्हें बख्श देगा और अल्लाह बड़ा साहब फज़ल (व करम ) है
30 और जब कुफ़्फ़ार तुम से मकर कर रहे थे ताकि तुमको क़ैद कर लें या तुमको मार डाले तुम्हें निकाल बाहर करे वह तो ये तद्बीर कर रहे थे और अल्लाह भी तद्बीर कर रहा था और अल्लाह तो सब तद्बीर करने वालों से बेहतर है 31और जब उनके सामने हमारी आयते पढ़ी जाती हैं तो बोल उठते हैं कि हमने सुना तो लेकिन अगर हम चाहें तो यक़ीनन ऐसा ही हम भी कह सकते हैं-तो बस अगलों के कि़स्से है
32 और जब उन्होंने कहा या अल्लाह अगर ये हक़ है और तेरे पास से आया है तो हम पर आसमान से पत्थर बरसा या हम पर कोई और दर्दनाक अज़ाब ही नाजि़ल फरमा
33 हालाँकि जब तक तुम उनके दरम्यिान मौजूद हो अल्लाह उन पर अज़ाब नहीं करेगा और अल्लाह ऐसा भी नही कि लोग तो उससे अपने गुनाहो की माफी माँग रहे हैं और अल्लाह उन पर नाजि़ल फरमाए”
30 और जब कुफ़्फ़ार तुम से मकर कर रहे थे ताकि तुमको क़ैद कर लें या तुमको मार डाले तुम्हें निकाल बाहर करे वह तो ये तद्बीर कर रहे थे और अल्लाह भी तद्बीर कर रहा था और अल्लाह तो सब तद्बीर करने वालों से बेहतर है 31और जब उनके सामने हमारी आयते पढ़ी जाती हैं तो बोल उठते हैं कि हमने सुना तो लेकिन अगर हम चाहें तो यक़ीनन ऐसा ही हम भी कह सकते हैं-तो बस अगलों के कि़स्से है
32 और जब उन्होंने कहा या अल्लाह अगर ये हक़ है और तेरे पास से आया है तो हम पर आसमान से पत्थर बरसा या हम पर कोई और दर्दनाक अज़ाब ही नाजि़ल फरमा
33 हालाँकि जब तक तुम उनके दरम्यिान मौजूद हो अल्लाह उन पर अज़ाब नहीं करेगा और अल्लाह ऐसा भी नही कि लोग तो उससे अपने गुनाहो की माफी माँग रहे हैं और अल्लाह उन पर नाजि़ल फरमाए”
इंसान हक़ को न तो अक्ल से जान सकता है और न चैलेंज कर
के – लोग बेहुरमती करते रहे हैं पाक चीज़ों
की या अल्लाह वालों को क़त्ल करते रहे हैं कि अगर उनमें कुछ है तो अल्लाह का अज़ाब
आना चाहिए पर यह तजुर्बा कामयाब नहीं हो सकता I हक़ सिर्फ उन पर ज़ाहिर होता है जो
नेकी के रास्ते पर चलते हैं- जो नेकी है वही हक़ है I
“ 34 और जब ये लोग लोगों को मस्जिदुल हराम से रोकते है तो फिर उनके लिए कौन सी बात बाक़ी है कि उन पर अज़ाब न नाजि़ल करे और ये लोग तो ख़ानाए काबा के मुतवल्ली भी नहीं इसके मुतवल्ली तो सिर्फ परहेज़गार लोग हैं मगर बहुत से लोग नहीं जानते
“ 34 और जब ये लोग लोगों को मस्जिदुल हराम से रोकते है तो फिर उनके लिए कौन सी बात बाक़ी है कि उन पर अज़ाब न नाजि़ल करे और ये लोग तो ख़ानाए काबा के मुतवल्ली भी नहीं इसके मुतवल्ली तो सिर्फ परहेज़गार लोग हैं मगर बहुत से लोग नहीं जानते
35 और ख़ानाए काबे के पास सीटियाँ तालिया बजाने के
सिवा उनकी नमाज ही क्या थी तो जो तुम कुफ्र किया
करते थे उसकी सज़ा में अज़ाब के मज़े चखो
36 कुफ्फार अपने माल महज़ इस वास्ते खर्च करते हैं कि लोगों को अल्लाह के रास्ते से रोकें फिर उसके बाद उनकी हसरत का बाइस होगा फिर आखि़र ये लोग शिकस्त खायेंगे और जिन लोगों ने कुफ्र एख़्तियार किया जहन्नुम की तरफ लाये जाएँगें
37 ताकि अल्लाह पाक को नापाक से जुदा कर दे और नापाक लोगों को एक दूसरे पर रखके ढेर बनाए फिर सब को जहन्नुम में झोंक दे यही लोग घाटा उठाने वाले हैं
38 काफिरों से कह दो कि अगर वह लोग बाज़ रहें तो उनके पिछले कुसूर माफ कर दिए जाए और अगर फिर कहीं पलटें तो यक़ीनन अगलों के तरीक़े गुज़र चुके जो, उनकी सज़ा हुयी वही इनकी भी होगी
39 काफि़रों से लड़े जाओ यहाँ तक कि कोई फसाद न रहे और अल्लाह की दीन ही दीन हो जाए फिर अगर ये लोग न बाज़ आए तो अल्लाह उनकी कारवाइयों को ख़ूब देखता है
40 और अगर सरताबी करें तो समझ लो कि अल्लाह यक़ीनी तुम्हारा मालिक है और वह क्या अच्छा मालिक है और क्या अच्छा मददगार है”
36 कुफ्फार अपने माल महज़ इस वास्ते खर्च करते हैं कि लोगों को अल्लाह के रास्ते से रोकें फिर उसके बाद उनकी हसरत का बाइस होगा फिर आखि़र ये लोग शिकस्त खायेंगे और जिन लोगों ने कुफ्र एख़्तियार किया जहन्नुम की तरफ लाये जाएँगें
37 ताकि अल्लाह पाक को नापाक से जुदा कर दे और नापाक लोगों को एक दूसरे पर रखके ढेर बनाए फिर सब को जहन्नुम में झोंक दे यही लोग घाटा उठाने वाले हैं
38 काफिरों से कह दो कि अगर वह लोग बाज़ रहें तो उनके पिछले कुसूर माफ कर दिए जाए और अगर फिर कहीं पलटें तो यक़ीनन अगलों के तरीक़े गुज़र चुके जो, उनकी सज़ा हुयी वही इनकी भी होगी
39 काफि़रों से लड़े जाओ यहाँ तक कि कोई फसाद न रहे और अल्लाह की दीन ही दीन हो जाए फिर अगर ये लोग न बाज़ आए तो अल्लाह उनकी कारवाइयों को ख़ूब देखता है
40 और अगर सरताबी करें तो समझ लो कि अल्लाह यक़ीनी तुम्हारा मालिक है और वह क्या अच्छा मालिक है और क्या अच्छा मददगार है”
यहाँ भी जंग का
मकसद काफिरों को ख़त्म करना नहीं था और न ऐसा किया गया – अगर वे लड़ते तो लड़ाई जारी
रहती वरना नहीं
“41 और जान लो कि जो कुछ तुम लूटो तो उनमें का पाचवां हिस्सा मख़सूस अल्लाह और रसूल और क़राबतदारों और यतीमों और मिस्कीनों और परदेसियों का है अगर तुम अल्लाह पर और उस पर ईमान ला चुके हो जो हमने ख़ास बन्दे पर फ़ैसले के दिन नाजि़ल की थी जिस दिन दो जमाअतें बाहम गुथ गयी थी और अल्लाह तो हर चीज़ पर क़ादिर है
42 जब तुम क़रीब नाके पर थे और वह बईद के नाके पर और सवार तुम से नशेब में थे और अगर तुम एक दूसरे से मुलाक़ात तय भी कर लेते हो तो और वक़्त पर गड़बड़ कर देते मगर अल्लाह वह पूरी कर दिखाए जो होना था ताकि जो शख़्स हलाक हो वह हुज्जत तमाम होने के बाद हलाक हो और जो जि़न्दा रहे वह हिदायत की हुज्जत तमाम होने के बाद जि़न्दा रहे और अल्लाह यक़ीनी सुनने वाला ख़बरदार है
43 जब अल्लाह ने तुम्हें ख़्वाब में उनको कम करके दिखलाया था और अगर उनको तुम्हें ज़्यादा करते दिखलाता तुम यक़ीनन हिम्मत हार देते और लड़ाई के बारे में झगड़ने लगते मगर अल्लाह ने बचाया इसमें तो शक ही नहीं कि वह दिलों के राज़ से वाकि़फ़ है”
“41 और जान लो कि जो कुछ तुम लूटो तो उनमें का पाचवां हिस्सा मख़सूस अल्लाह और रसूल और क़राबतदारों और यतीमों और मिस्कीनों और परदेसियों का है अगर तुम अल्लाह पर और उस पर ईमान ला चुके हो जो हमने ख़ास बन्दे पर फ़ैसले के दिन नाजि़ल की थी जिस दिन दो जमाअतें बाहम गुथ गयी थी और अल्लाह तो हर चीज़ पर क़ादिर है
42 जब तुम क़रीब नाके पर थे और वह बईद के नाके पर और सवार तुम से नशेब में थे और अगर तुम एक दूसरे से मुलाक़ात तय भी कर लेते हो तो और वक़्त पर गड़बड़ कर देते मगर अल्लाह वह पूरी कर दिखाए जो होना था ताकि जो शख़्स हलाक हो वह हुज्जत तमाम होने के बाद हलाक हो और जो जि़न्दा रहे वह हिदायत की हुज्जत तमाम होने के बाद जि़न्दा रहे और अल्लाह यक़ीनी सुनने वाला ख़बरदार है
43 जब अल्लाह ने तुम्हें ख़्वाब में उनको कम करके दिखलाया था और अगर उनको तुम्हें ज़्यादा करते दिखलाता तुम यक़ीनन हिम्मत हार देते और लड़ाई के बारे में झगड़ने लगते मगर अल्लाह ने बचाया इसमें तो शक ही नहीं कि वह दिलों के राज़ से वाकि़फ़ है”
अरब के वे लोग
इतनी हुज्जत करते थे और रसूल से इतनी ज्यादा उम्मीद करते थे शायद यह कि जब अल्लाह
के रसूल हैं तो क्यों इतनी मुश्किलें पड़ रही हैं क्यों नहीं बिना लड़ाई के फतह मिल
जाती और दुनिया में कहीं लोग ऐसा नहीं करते – सिकंदर और चंगेज़ खान को क्या तकलीफें और शिकस्त नुकसान नहीं मिले पर रसूल के हर
फैसले हर हुक्म पर फालतू बातें यह लोग करते रहे सिवाए ईमान पर कायम चंद लोगों के I
“44 उन्हें बहुत कम करके दिखलाया और उनकीआँखों में तुमको
थोड़ा कर दिया ताकि अल्लाह को जो कुछ करना मंज़ूर था वह पूरा हो जाए और कुल अम्र अल्लाह की तरफ लौटने हैं”
फतह की शर्त :
“45 ऐ इमानदारों जब तुम किसी फौज से मुठभेड़ करो तो अपने क़दम जमाए रहो और अल्लाह को बहुंत याद करते रहो ताकि तुम फलाह पाओ
46 और अल्लाह की और उसके रसूल की इताअत करो और आपस में झगड़ा न करो वरना तुम हिम्मत हारोगे और तकलीफों को झेल जाओ अल्लाह तो यक़ीनन सब्र करने वालों का साथी है
47 और उन लोगों के ऐसे न हो जाओ जो इतराते हुए और लोगों के दिखलाने के वास्ते अपने घरों से निकल खड़े हुए और लोगों को अल्लाह की राह से रोकते हैं और जो कुछ भी वह लोग करते हैं अल्लाह उस पर अहाता किए हुए है
48 और जब शैतान ने उनकी कारस्तानियों को उम्दा कर दिखाया और उनके कान में फूंक दिया कि लोगों में आज कोई ऐसा नहीं जो तुम पर ग़ालिब आ सके और मै तुम्हारा मददगार हूँ फिर जब दोनों लश्कर मुकाबिल हुए तो अपने उलटे पाव भाग निकला और कहने लगा कि मै तो तुम से अलग हूँ मै वह चीजें देख रहा हूँ जो तुम्हें नहीं सूझती मैं तो अल्लाह से डरता हूँ और अल्लाह बहुत सख़्त अज़ाब वाला है”
“45 ऐ इमानदारों जब तुम किसी फौज से मुठभेड़ करो तो अपने क़दम जमाए रहो और अल्लाह को बहुंत याद करते रहो ताकि तुम फलाह पाओ
46 और अल्लाह की और उसके रसूल की इताअत करो और आपस में झगड़ा न करो वरना तुम हिम्मत हारोगे और तकलीफों को झेल जाओ अल्लाह तो यक़ीनन सब्र करने वालों का साथी है
47 और उन लोगों के ऐसे न हो जाओ जो इतराते हुए और लोगों के दिखलाने के वास्ते अपने घरों से निकल खड़े हुए और लोगों को अल्लाह की राह से रोकते हैं और जो कुछ भी वह लोग करते हैं अल्लाह उस पर अहाता किए हुए है
48 और जब शैतान ने उनकी कारस्तानियों को उम्दा कर दिखाया और उनके कान में फूंक दिया कि लोगों में आज कोई ऐसा नहीं जो तुम पर ग़ालिब आ सके और मै तुम्हारा मददगार हूँ फिर जब दोनों लश्कर मुकाबिल हुए तो अपने उलटे पाव भाग निकला और कहने लगा कि मै तो तुम से अलग हूँ मै वह चीजें देख रहा हूँ जो तुम्हें नहीं सूझती मैं तो अल्लाह से डरता हूँ और अल्लाह बहुत सख़्त अज़ाब वाला है”
उम्माह में निफाक
की शुरुआत:
“49 जब मुनाफिक़ीन और जिन लोगों के दिल में मर्ज़ है कह रहे थे कि इन लोगों को उनके दीन ने धोके में डाल रखा है हालाकि जो शख़्स अल्लाह पर भरोसा करता है तो यक़ीनन बेशक अल्लाह ग़ालिब और हिकमत वाला है
50 और तुम देखते जब फ़रिश्ते काफि़रों की जान निकाल लेते थे और रूख़ और पुश्त पर कोड़े मारते थे और जहन्नुम के अज़ाब के मज़े चखो
51 ये सज़ा उसकी है जो तुम्हारे हाथों ने पहले किया कराया है और अल्लाह बन्दों पर हरगिज़ ज़ुल्म नहीं किया करता है
52 क़ौमे फिरआऊन और उनके लोगों की सी है जो उन से पहले थे और अल्लाह की आयतों से इन्कार करते थे तो अल्लाह ने भी उनके गुनाहों की वजह से उन्हें ले डाला बेशकअल्लाह ज़बरदस्त और बहुत सख़्त अज़ाब देने वाला है
53 ये सज़ा इस वजह से कि जब कोई नेअमत अल्लाह किसी क़ौम को देता है तो जब तक कि वह लोग ख़ुद अपनी हालत बदलें अल्लाह भी उसे नहीं बदलेगा और अल्लाह तो यक़ीनी सब कुछ सुनता जानता है
54 क़ौम फिरआऊन और उन लोगों की सी है जो उनसे पहले थे और अपने रब की आयतों को झुठलाते थे तो हमने भी उनके गुनाहों की वजह से उनको हलाक़ कर डाला और फिरआऊन की क़ौम को डुबा मारा और सब के सब ज़ालिम थे
55 इसमें शक नहीं कि अल्लाह के नज़दीक जानवरों में कुफ़्फ़ार सबसे बदतरीन जो ईमान नहीं लाते
56 जिन लोगों से तुम ने एहद व पैमान किया था फिर वह लोग अपने एहद को हर बार तोड़ डालते है और कोई डर नहीं
57 तो अगर वह लड़ाई में तुम्हारे हाथे चढ़ जाएँ तो सख्ती करो कि जो उनके पीछे हैं उनके दिलों में खौफ आये और वे याद रखें
“49 जब मुनाफिक़ीन और जिन लोगों के दिल में मर्ज़ है कह रहे थे कि इन लोगों को उनके दीन ने धोके में डाल रखा है हालाकि जो शख़्स अल्लाह पर भरोसा करता है तो यक़ीनन बेशक अल्लाह ग़ालिब और हिकमत वाला है
50 और तुम देखते जब फ़रिश्ते काफि़रों की जान निकाल लेते थे और रूख़ और पुश्त पर कोड़े मारते थे और जहन्नुम के अज़ाब के मज़े चखो
51 ये सज़ा उसकी है जो तुम्हारे हाथों ने पहले किया कराया है और अल्लाह बन्दों पर हरगिज़ ज़ुल्म नहीं किया करता है
52 क़ौमे फिरआऊन और उनके लोगों की सी है जो उन से पहले थे और अल्लाह की आयतों से इन्कार करते थे तो अल्लाह ने भी उनके गुनाहों की वजह से उन्हें ले डाला बेशकअल्लाह ज़बरदस्त और बहुत सख़्त अज़ाब देने वाला है
53 ये सज़ा इस वजह से कि जब कोई नेअमत अल्लाह किसी क़ौम को देता है तो जब तक कि वह लोग ख़ुद अपनी हालत बदलें अल्लाह भी उसे नहीं बदलेगा और अल्लाह तो यक़ीनी सब कुछ सुनता जानता है
54 क़ौम फिरआऊन और उन लोगों की सी है जो उनसे पहले थे और अपने रब की आयतों को झुठलाते थे तो हमने भी उनके गुनाहों की वजह से उनको हलाक़ कर डाला और फिरआऊन की क़ौम को डुबा मारा और सब के सब ज़ालिम थे
55 इसमें शक नहीं कि अल्लाह के नज़दीक जानवरों में कुफ़्फ़ार सबसे बदतरीन जो ईमान नहीं लाते
56 जिन लोगों से तुम ने एहद व पैमान किया था फिर वह लोग अपने एहद को हर बार तोड़ डालते है और कोई डर नहीं
57 तो अगर वह लड़ाई में तुम्हारे हाथे चढ़ जाएँ तो सख्ती करो कि जो उनके पीछे हैं उनके दिलों में खौफ आये और वे याद रखें
58 और अगर तुम्हें किसी क़ौम से वादा शिकनी का अंदेशा है हो तो तुम भी
बराबर उनका एहद उन्हीं की तरफ फैंक मारो अल्लाह
गद्दारों को दोस्त नहीं रखता
59 और कुफ़्फ़ार ये न ख़्याल करें कि वह आगे बढ़ निकले वह हरगिज़ आजिज़ नहीं कर सकते”
59 और कुफ़्फ़ार ये न ख़्याल करें कि वह आगे बढ़ निकले वह हरगिज़ आजिज़ नहीं कर सकते”
जंग की तय्यारी
साजो सामान:
“60 और जहाँ तक तुमसे हो सके अपने ज़ोर से और बॅधे हुए घोड़े से लड़ाई का सामान मुहय्या करो इससे अल्लाह के दुश्मन और अपने दुश्मन और उसके सिवा दूसरे लोगों पर भी अपनी धाक बिठा दोगे जिन्हें तुम नहीं जानते हो मगर अल्लाह तो उनको जानता है और अल्लाह की राह में तुम जो कुछ भी ख़र्च करोगें वह तुम पूरा पूरा भर पाओगें और तुम पर किसी तरह ज़ुल्म नहीं किया जाएगा”
“60 और जहाँ तक तुमसे हो सके अपने ज़ोर से और बॅधे हुए घोड़े से लड़ाई का सामान मुहय्या करो इससे अल्लाह के दुश्मन और अपने दुश्मन और उसके सिवा दूसरे लोगों पर भी अपनी धाक बिठा दोगे जिन्हें तुम नहीं जानते हो मगर अल्लाह तो उनको जानता है और अल्लाह की राह में तुम जो कुछ भी ख़र्च करोगें वह तुम पूरा पूरा भर पाओगें और तुम पर किसी तरह ज़ुल्म नहीं किया जाएगा”
सुलह और अमन
मुक़द्दम :
“61 और अगर दुश्मन सुलह की तरफ माएल हो तो तुम भी उसकी तरफ माएल हो और अल्लाह पर भरोसा रखो वह बेशक सुनता जानता है
62 और अगर वह लोग तुम्हें फरेब देना चाहे तो अल्लाह तुम्हारे वास्ते यक़ीनी काफी है-वही तो है जिसने अपनी ख़ास मदद और मोमिनीन से तुम्हारी ताईद की”
“61 और अगर दुश्मन सुलह की तरफ माएल हो तो तुम भी उसकी तरफ माएल हो और अल्लाह पर भरोसा रखो वह बेशक सुनता जानता है
62 और अगर वह लोग तुम्हें फरेब देना चाहे तो अल्लाह तुम्हारे वास्ते यक़ीनी काफी है-वही तो है जिसने अपनी ख़ास मदद और मोमिनीन से तुम्हारी ताईद की”
उम्माह में बाहमी
उल्फत यही मक़सद:
63 और उसी ने उन मुसलमानों के दिलों में बाहम ऐसी उलफ़त पैदा कर दी कि अगर तुम जो कुछ ज़मीन में है सब का सब खर्च कर डालते तो भी उनके दिलो में ऐसी उलफ़त पैदा न कर सकते मगर अल्लाह ही था जिसने बाहम उलफत पैदा की बेशक वह ज़बरदस्त हिक़मत वाला है
64 ऐ रसूल तुमको बस अल्लाह और जो मोमिनीन तुम्हारे ताबेए फरमान है काफी है
65 ऐ रसूल तुम मोमिनीन को जिहाद के वास्ते आमादा करो अगर तुम लोगों में के साबित क़दम रहने वाले बीस भी होगें तो वह दो सौ पर ग़ालिब आ जायेगे और अगर तुम लोगों में से साबित कदम रहने वालों सौ होगें तो हज़ार पर ग़ालिब आ जाएँगें इस सबब से कि ये लोग ना समझ हैं
66 अब अल्लाह ने तुम से तख़्फ़ीफ कर दी और देख लिया कि तुम में यक़ीनन कमज़ोरी है तो अगर तुम लोगों में से साबित क़दम रहने वाले सौ होगें तो दो सौ पर ग़ालिब रहेंगें और अगर तुम लोगों में से एक हज़ार होगें तो अल्लाह के हुक्म से दो हज़ार पर ग़ालिब रहेंगे और बर्दाश्त करने वालों का अल्लाह साथी है
67 कोई नबी जब कि रूए ज़मीन पर खून न बहाए उसके यहाँ कै़दियों का रहना मुनासिब नहीं तुम लोग तो दुनिया के साज़ो सामान के ख़्वाहा हो औॅर अल्लाह आखि़रत का ख्वाहा है और अल्लाह ज़बरदस्त हिकमत वाला है
68 और अगर अल्लाह की तरफ से पहले ही माफी का हुक्म न आ चुका होता तो तुमने जो फिदिया लिया था उसकी सज़ा में तुम पर बड़ा अज़ाब नाजि़ल होकर रहता तो
63 और उसी ने उन मुसलमानों के दिलों में बाहम ऐसी उलफ़त पैदा कर दी कि अगर तुम जो कुछ ज़मीन में है सब का सब खर्च कर डालते तो भी उनके दिलो में ऐसी उलफ़त पैदा न कर सकते मगर अल्लाह ही था जिसने बाहम उलफत पैदा की बेशक वह ज़बरदस्त हिक़मत वाला है
64 ऐ रसूल तुमको बस अल्लाह और जो मोमिनीन तुम्हारे ताबेए फरमान है काफी है
65 ऐ रसूल तुम मोमिनीन को जिहाद के वास्ते आमादा करो अगर तुम लोगों में के साबित क़दम रहने वाले बीस भी होगें तो वह दो सौ पर ग़ालिब आ जायेगे और अगर तुम लोगों में से साबित कदम रहने वालों सौ होगें तो हज़ार पर ग़ालिब आ जाएँगें इस सबब से कि ये लोग ना समझ हैं
66 अब अल्लाह ने तुम से तख़्फ़ीफ कर दी और देख लिया कि तुम में यक़ीनन कमज़ोरी है तो अगर तुम लोगों में से साबित क़दम रहने वाले सौ होगें तो दो सौ पर ग़ालिब रहेंगें और अगर तुम लोगों में से एक हज़ार होगें तो अल्लाह के हुक्म से दो हज़ार पर ग़ालिब रहेंगे और बर्दाश्त करने वालों का अल्लाह साथी है
67 कोई नबी जब कि रूए ज़मीन पर खून न बहाए उसके यहाँ कै़दियों का रहना मुनासिब नहीं तुम लोग तो दुनिया के साज़ो सामान के ख़्वाहा हो औॅर अल्लाह आखि़रत का ख्वाहा है और अल्लाह ज़बरदस्त हिकमत वाला है
68 और अगर अल्लाह की तरफ से पहले ही माफी का हुक्म न आ चुका होता तो तुमने जो फिदिया लिया था उसकी सज़ा में तुम पर बड़ा अज़ाब नाजि़ल होकर रहता तो
69 अब
तुमने जो माल ग़नीमत हासिल किया है उसे खाओ
हलाल तय्यब है और अल्लाह से डरते रहो बेशक अल्लाह बड़ा बख़्शने वाला
मेहरबान है
70 ऐ रसूल जो कै़दी तुम्हारे कब्जे़ में है उनसे कह दो कि अगर तुम्हारे दिलों में नेकी देखेगा तो जो तुम से छीन लिया गया है उससे कहीं बेहतर तुम्हें अता फरमाएगा और तुम्हें बख़्श भी देगा और अल्लाह तो बड़ा बख़्शने वाला मेहरबान है
71 और अगर ये लोग तुमसे फरेब करना चाहते है तो अल्लाह से पहले ही फरेब कर चुके हैं तो अल्लाह ने उन पर तुम्हें क़ाबू दे दिया और अल्लाह तो बड़ा वाकि़फकार हिकमत वाला है”
70 ऐ रसूल जो कै़दी तुम्हारे कब्जे़ में है उनसे कह दो कि अगर तुम्हारे दिलों में नेकी देखेगा तो जो तुम से छीन लिया गया है उससे कहीं बेहतर तुम्हें अता फरमाएगा और तुम्हें बख़्श भी देगा और अल्लाह तो बड़ा बख़्शने वाला मेहरबान है
71 और अगर ये लोग तुमसे फरेब करना चाहते है तो अल्लाह से पहले ही फरेब कर चुके हैं तो अल्लाह ने उन पर तुम्हें क़ाबू दे दिया और अल्लाह तो बड़ा वाकि़फकार हिकमत वाला है”
उम्माह के दो हिस्से
– महाजरीन और अंसार
“72 जिन लोगों ने ईमान क़़ुबूल किया और हिजरत की और अपने अपने जान माल से अल्लाह की राह में जिहाद किया और जिन लोगों ने जगह दी और उनकी मदद की यही लोग एक दूसरे के सरपरस्त दोस्त हैं और जिन लेागों ने ईमान क़ुबूल किया और हिजरत नहीं की तो तुम लोगों को उनकी सरपरस्ती से कुछ सरोकार नहीं-यहाँ तक कि वह हिजरत एख़्तियार करें और मगर दीनी अम्र में तुम से मदद के ख़्वाहा हो तो तुम पर मदद करना लाजि़म व वाजिब है मगर उन लोगों के मुक़ाबले में जिनमें और तुममें बाहम एहदो पैमान है और जो कुछ तुम करते हो अल्लाह देख रहा है
73 और जो लोग काफि़र हैं वह भी एक दूसरे के सरपरस्त हैं अगर तुम वायदा न करोगे तो रूए ज़मीन पर फितना बरपा हो जाएगा और बड़ा फ़साद होगा
74 और जिन लोगों ने ईमान क़ुबूल किया और हिजरत की और अल्लाह की राह में लड़े भिड़े और जिन लोगों ने मदद की यही लोग सच्चे ईमानदार हैं उन्हीं के वास्ते मग़फिरत और इज़्ज़त व आबरु वाली रोज़ी है
75 और जिन लोगों ने बाद ईमान क़ुबूल किया और हिजरत की और तुम्हारे साथ मिलकर जिहाद किया वह लोग भी तुम्हीं में से हैं और साहबाने क़राबत अल्लाह की किताब में बाहम एक दूसरे के ज़्यादा हक़दार हैं बेशक अल्लाह हर चीज़ से ख़ूब वाकि़फ हैं”
“72 जिन लोगों ने ईमान क़़ुबूल किया और हिजरत की और अपने अपने जान माल से अल्लाह की राह में जिहाद किया और जिन लोगों ने जगह दी और उनकी मदद की यही लोग एक दूसरे के सरपरस्त दोस्त हैं और जिन लेागों ने ईमान क़ुबूल किया और हिजरत नहीं की तो तुम लोगों को उनकी सरपरस्ती से कुछ सरोकार नहीं-यहाँ तक कि वह हिजरत एख़्तियार करें और मगर दीनी अम्र में तुम से मदद के ख़्वाहा हो तो तुम पर मदद करना लाजि़म व वाजिब है मगर उन लोगों के मुक़ाबले में जिनमें और तुममें बाहम एहदो पैमान है और जो कुछ तुम करते हो अल्लाह देख रहा है
73 और जो लोग काफि़र हैं वह भी एक दूसरे के सरपरस्त हैं अगर तुम वायदा न करोगे तो रूए ज़मीन पर फितना बरपा हो जाएगा और बड़ा फ़साद होगा
74 और जिन लोगों ने ईमान क़ुबूल किया और हिजरत की और अल्लाह की राह में लड़े भिड़े और जिन लोगों ने मदद की यही लोग सच्चे ईमानदार हैं उन्हीं के वास्ते मग़फिरत और इज़्ज़त व आबरु वाली रोज़ी है
75 और जिन लोगों ने बाद ईमान क़ुबूल किया और हिजरत की और तुम्हारे साथ मिलकर जिहाद किया वह लोग भी तुम्हीं में से हैं और साहबाने क़राबत अल्लाह की किताब में बाहम एक दूसरे के ज़्यादा हक़दार हैं बेशक अल्लाह हर चीज़ से ख़ूब वाकि़फ हैं”
उम्माह के दो
हिस्से थे – मक्का के महाजरीन और मदीने के अंसार और जंगे बदर में जब दोनों साथ मिल
कर दुश्मन से जंग की तो उनमें बाह्मी उल्फत पैदा हुयी इसके पहले अजनबीपन और दूरी
रही होगी I इस सूरे में जंग और सुलह के अहकाम हैं और उम्माह की आम समाजी ज़िन्दगी
के एहकाम नहीं हैं I जगह जगह पर अल्लाह के गेज़ पर उसकी रहमत ग़ालिब आती रही है
लेकिन आज के दौर में मुनाफ़िक़ और इस्लाम के दुश्मन गेज़ वाले एहकाम को इस्लाम कह कर
पेश करते हैं – मुनाफ़िक़ इंसानियत के दुश्मन काम करते हैं और इस्लाम के दुश्मन
इस्लाम , कुरान और रसूल के खिलाफ नफरत फैलाते हैं -
“39 काफि़रों से लड़े जाओ यहाँ तक कि कोई फसाद न
रहे और अल्लाह की दीन ही दीन हो जाए फिर अगर ये लोग न बाज़ आए
तो अल्लाह उनकी कारवाइयों को ख़ूब देखता
है”
जंग हुयी और
फिर जंग रुक गयी कुछ मक्के के काफिर क़ैद
हुए जिनमें से कुछ को फिदया ले कर छोड़ दिया गया इसके बाद –
“67 कोई नबी जब कि रूए ज़मीन पर खून न बहाए उसके
यहाँ कै़दियों का रहना मुनासिब नहीं तुम लोग तो दुनिया के साज़ो सामान के ख़्वाहा
हो औॅर अल्लाह आखि़रत का ख्वाहा है और
अल्लाह ज़बरदस्त हिकमत वाला है”
इस गैज़ के बाद भी
कोई खून नहीं बहाया गया और न कुरान में ऐसा ज़िक्र है कि किसी नबी ने ज़मीन को खून
से सुर्ख किया हो क्योंकि हर बार अल्लाह के गेज़ पर उसकी रहमत ग़लिब आती है I
यह सारे एहकाम
रसूल की ज़िन्दगी तक थे अब सिवाए दिफ़ा और
अमन कायम करने के जंग का कोई जवाज़ नहीं है और पूरी दुनिया में भी बस जंग का यही
जवाज़ है I
No comments:
Post a Comment